Showing posts with label class 12 home science notes. Show all posts

Class 12 Home Science Chapter 12 फैशन डिज़ाइन और व्यापार Fashion Design and Merchandising Notes In Hindi



 Class 12 Home Science Chapter 12 फैशन डिज़ाइन और व्यापार Fashion Design and Merchandising Notes In Hindi


📚 अध्याय = 12 📚

💠 फैशन डिज़ाइन और व्यापार 💠

❇️ फैशन :-

🔹 एक शैली या शैलियाँ हैं , जो किसी एक कालावधि में सबसे अधिक प्रचलन में रहती हैं ।

❇️ शैली :-

🔹 परिधान / सहायक सामग्री की विशेष दिखावट / विशिष्टता है । फैशन में शैली आती और चली जाती है , परंतु विशिष्ट शैलियाँ सदैव बनी रहती हैं ।

❇️ अस्थायी फ़ैशन :-

🔹 कम समय के लिए होते हैं और एक ही बार आकर चले जाते इतने प्रभावी नहीं होते है कि ग्राहकों को लंबे समय तक आकर्षित कर पाए उदाहरण : हॉट पैंटें , बैगी पैंटें और बेमेल बटन ।

❇️ चिरसम्मत ( क्लासिक ) शैली :-

🔹 कभी पूर्णतया अप्रचलित नहीं होती , लंबे समय तक लगभग स्वीकृत डिज़ाइने की सादगी की विशिष्ता है जो इन्हें आसानी से पुराना नहीं होने देती । उदाहरण : ब्लेज़र जैकेट , पोलोशर्ट्स , छोटी काली ड्रेस और चैनल सूट , 

❇️ फ़ैशन का विकास :-

🔶 प्राचीनकाल मध्यकाल :-


शैलियाँ एक साथ पूरी शताब्दी तक परिवर्तित नहीं होती थीं ।


🔶 नवजागरण काल :-


पश्चिमी सभ्यता ने विभिन्न संस्कृतियों , रीति रिवाज़ और पोशाकों की खोज हुई ।


फैशन परिवर्तन को बढ़ावा मिला नए कपड़ों और विचारों की उपलब्धता हुई ।


लोग नयी वस्तुओं को लालायित ।


🔶 फैशन का केंद्र फ्रास :-


प्रभुत्व 18 वीं शताब्दी के प्रारंभ में शुरू हुआ ।


लोग दो प्रमुख वर्गों से- अमीर और गरीब । 


18 वीं शताब्दी सम्राट लुईस चौदहवें के कोर्ट के सदस्य अपनी रुचि को प्राथमिकता देते ।


पेरिस को यूरोप की राजधानी बना दिया ।


शाही न्यायालय से समर्थन रेशम उद्योग का विकास हुआ ।


रेशमी वस्त्र , रिबन और लेस भेजते थे ।


सभी कपड़े हाथ से बनते और ग्राहक के अनुसार अर्थात् ग्राहक के नाप के अनुसार बनते ।


कुटुअर ‘ Couture : परिधान निर्माण की कला ।


पुरुष कूटुरियर ( Couturier ) महिला कूटुरियरे।


❇️ औद्योगिक क्रांति :-


वस्त्र निर्माण प्रौद्योगिक उन्नति ।


कम समय में अधिक वस्त्रों का निर्माण ।


कातने वाला यंत्र और करघों का आविष्कार ।


अमरीका वस्त्र उद्योग का विकास ।


मध्य वर्ग को जन्म।


🔶 1790 में बदलाव :-


सिलाई मशीन का आविष्कार ।


हस्तशिल्प को उद्योग में बदला ।


फैशन का लोकतंत्रीकरण ।


1859 में ‘ इसाक सिंगर ‘ ने पैरों से चलाने वाली सिलाई मशीन विकसित की जिसने हाथों को मुक्त किया । 


उपयोग :- युदध के समय सैनिकों की वर्दी सिलने के लिए ।


🔶 1849 में बदलाव :-


लेवी स्ट्रॉस ‘ ने टेंटों और मालडिब्बों के कवरों का उपयोग करके ज़्यादा चलने वाली पैंटें बनाई ।


जिनमें औज़ार रखने के लिए जेबें लगाई गई । 


ये ‘ डेनिम्स ‘ कहलाती थीं ।


मज़दूरों के लिए विशेष रूप से बनाई गई थी ।


एकमात्र परिधान जो पिछले 150 वर्षों से एक जैसा ।


🔶 1880 में बदलाव :-


महिलाओं ने स्कर्ट ब्लाउज़ पहनने शुरू किये ।


पहनने को तैयार कपड़ों के निर्माण ।


लंबाई और कमर आसानी से मैप के अनुकूल ठीक ।


रोज़गार से जुड़ी महिलाओं परिधानों को आपस में मिलाने से विविधता ।


🔶 19TH CENTURY में बदलाव :-


जनता को जेब के अनुकूल फ़ैशन मिलने लगा ।


मेलों और बाज़ार लगने लगे ।


यात्री व्यापारी बाज़ारों में कपड़े लाते ।


दोनों अकसर मोलभाव करते ।


विविध प्रकार के कपड़ों की माँग होने लगी ।


खुदरा दुकानें बाजरो में आने लगी ।


🔶 आज कल में बदलाव :-


अधिक संख्या में लोग शहरों में बस गए , उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़ी दुकानें , स्टोर श्रृंखला , Chain stores आ गए है ।


❇️ फ़ैशन चक्र :-

🔹 जिस तरीके से फ़ैशन बदलता है , उसे सामान्यतः फ़ैशन चक्र के रूप में जाना जाता है । वह समय या जीवनकाल , जिसमें एक फ़ैशन अस्तित्व में रहता है , प्रवेश से लेकर अप्रचलन तक पाँच स्तरों में गति करता है ।

🔶 शैली की प्रस्तुति :- डिज़ाइनर अपने शोध और रचनात्मक विचारों को परिधान में ढालते हैं और फिर जनसाधारण को नयी शैली उपलब्ध कराते हैं । डिज़ाइनों की रचना के लिए रूपरेखा , रंग , आकृति वस्त्र जैसे अवयवों तथा अन्य विवरण को एवं उनके एक – दूसरे के साथ संबंध को बदलना पड़ता है । 

🔶 लोकप्रियता में वृद्धि :- जब नया फ़ैशन बहुत से लोगों द्वारा खरीदा , पहना और देखा जाता है , तो इसकी लोकप्रियता बढ़नी शुरू होती है । 

🔶 लोकप्रियता की पराकाष्ठा :- जब कोई फ़ैशन लोकप्रियता की ऊँचाई पर होता है , तो उसकी माँग इतनी अधिक हो जाती है कि बहुत से निर्माता उसकी नकल करते हैं या विभिन्न मूल्य स्तरों पर उसके रूपांतरणों का उत्पादन करते हैं । 

🔶 लोकप्रियता में कमी होना :- अंततः उस फ़ैशन की प्रतियों का भारी संख्या में उत्पादन होने से फ़ैशन प्रिय व्यक्ति उस शैली से ऊब जाते हैं और कुछ नया देखना शुरू कर देते हैं । इस घटती लोकप्रियता वाली सामग्री को दुकानों पर कम कीमत पर बेच दिया जाता है ।

🔶 शैली का परित्याग अथवा अप्रचलन :- फ़ैशन चक्र के अंतिम पड़ाव में कुछ उपभोक्ता पहले से ही नए रंग – रूप में आ जाते हैं और इस प्रकार नया फ़ैशन चक्र प्रारंभ हो जाता है ।

❇️ फ़ैशन व्यापार :-

🔹 फ़ैशन व्यापार का अर्थ है बिक्री के प्रोत्साहन के लिए सही समय पर , सही स्थान पर और सही मूल्य पर आवश्यक योजना बनाना । यदि इन सभी स्थितियों की योजना बनाई जाए तो अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।

❇️ फैशन व्यापारी :-

🔹 व्यापारी वह व्यक्ति होता है , जो प्रेरणा को डिज़ाइन में परिवर्तित करने को सुसाध्य बनाता है , संकल्पना के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है और फ़ैशन उद्योग में उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं और माँगों के लिए उत्पादों के नियोजन , उत्पादन , संवर्धन और वितरण पर ध्यान देता है ।

❇️ फ़ैशन व्यापार को अच्छी तरह समझना :-

🔹 फ़ैशन व्यापार को अच्छी तरह समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि फ़ैशन की वस्तुओं के उत्पादन , क्रय , संवर्धन और विक्रय में व्यापारियों की भूमिका की परख की जाए । व्यापारियों की प्रत्येक पहलू पर फ़ैशन व्यापारियों की भूमिका की परख करें :-

🔶 विनिर्माण :- विनिर्माण में फ़ैशन व्यापारी किसी एक परिधान को बनाने में विभिन्न प्रकार के कपड़ों का उपयोग करते समय बहुत अधिक सावधानी बरतता है । वस्त्र की ऐतिहासिक और सामाजिक – सांस्कृतिक सूझ – बूझ होने पर डिज़ाइनर की कल्पनाशक्ति को वास्तविकता में बदलने हेतु मदद मिलती है । कपड़ों और परिधान निर्माण के ज्ञान का उपयोग करते हुए फ़ैशन व्यापारी डिज़ाइनर द्वारा तैयार किए गए परिधान को ले लेता है और इसके उत्पादन का श्रेष्ठ तरीका ढूँढ़ता है , साथ ही मूल्य और लक्षित बाज़ार जैसी बातों का भी ध्यान रखता है ।

🔶 क्रय :- फ़ैशन व्यापार का हिस्सा बन जाता है , जब एक व्यापारी फ़ैशन की सामग्री दुकानों में रखने के लिए खरीदता है । एक फ़ैशन व्यापारी को फ़ैशन की वस्तुओं के लिए लक्षित बाज़ार की जानकारी अवश्य होनी चाहिए और साथ ही उसे फ़ैशन प्रवृत्ति विश्लेषण और पूर्वानुमान लगाने में भी बहुत निपुण होना चाहिए । इससे अधिक सही ऑर्डर दिया जा सकता है । एक डिज़ाइनर के साथ मिलकर कार्य करने वाला फ़ैशन व्यापारी एक बार फिर वस्त्र निर्माण और वस्त्रों के विषय में डिज़ाइनर को अपनी विशेषज्ञता प्रदान कर सकेगा ।

🔶 संवर्धन :- जब फ़ैशन व्यापारी डिज़ाइनर के लिए काम करता है , तब उसकी पहली वरीयता यह होती है कि वह डिज़ाइनर के उत्पाद को उन दुकानों तक पहुँचाए जो उसे अधिक मात्रा में खरीदना पसंद कर सकते हैं । फ़ैशन व्यापारी को न केवल रचनात्मक मस्तिष्क और प्रबल व्यापारिक कौशलों में दृष्टि की आवश्यकता होती है , बल्कि उसके उत्पादन कौशल भी तेज़ होने चाहिए । फ़ैशन व्यापारी डिज़ाइनर द्वारा तैयार परिधानों को फ़ैशन प्रदर्शनों द्वारा बढ़ावा देता है , जहाँ रचनाएँ और उनके दृश्य प्रभाव संभावित ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए बढ़ा – चढ़ाकर प्रस्तुत किए जाते हैं । इसके अतिरिक्त फ़ैशन व्यापारी डिज़ाइनर के कपड़ों के लिए लक्षित बाज़ार ढूँढ़ते हैं , जैसे – बच्चों के कपड़ों की दुकानें , विभागीय दुकानें या छूट देने वाली दुकानें । 

🔶 विक्रय :- फ़ैशन व्यापार का अंतिम घटक विक्रय है । एक फ़ैशन व्यापारी जो एक डिज़ाइनर के साथ काम करता है , दुकानों को फ़ैशन की वस्तुएँ बेचने के लिए उत्तरदायी होता है और दुकानें वह माल ग्राहकों को बेचती हैं । इसके लिए भी व्यापारी को पूर्वानुमान और बाज़ार की प्रवृत्ति का ज्ञान होना चाहिए , जिससे वह वस्तुओं के उत्पादन की अनुशंसा कर सके | सृजनात्मकता महत्वपूर्ण होती है , जिससे व्यापारी यह सलाह अवश्य दे सके कि दुकान में वस्तुओं को कैसे प्रदर्शित किया जाए । जब फ़ैशन व्यापारी एक खुदरा दुकान के लिए काम करता है तो उसके उत्तरदायित्वों में वस्तुओं को खरीदना और दुकान में सजाना भी शामिल रहता है ।

❇️ व्यापार के स्तर :-

🔹 फ़ैशन उदयोग में व्यापार के तीन स्तर


खुदरा संगठन में व्यापारिक गतिविधियाँ


क्रय एजेंसी व्यापार में सामान


निर्यात उद्यम में व्यापारिक गतिविधियाँ


❇️ खुदरा संगठन में व्यापारिक गतिविधियाँ :-


फ़ैशन उद्योग के भीतर यह एक विशिष्ट प्रबंधन कार्य है । 


यह व्यवसाय फ़ैशन दुनिया की दुकानों को डिज़ाइनर के प्रदर्शन कक्ष से खुदरा दुकानों तक और फिर ग्राहकों के हाथों में पहुँचाता है । 


यह खुदरा संगठन के आंतरिक नियोजन द्वारा प्राप्त किया जाता है । 


यह सुनिश्चित करता है कि व्यापार में विक्रय के लिए उस मूल्य पर माल का पर्याप्त प्रावधान रहे , जिस मूल्य पर ग्राहक इच्छा पूर्वक लेने को तैयार है । 


लाभप्रद प्रचालन सुनिश्चित ।


❇️ क्रय एजेंसी व्यापार में सामान :-


यह एजेंसी वस्तु के क्रय के लिए परामर्श देती है । 


ग्राहकों के लिए सामान उपलब्ध कराने के कार्यालय का काम करती हैं । 


 क्रय एजेंटों का उत्तरदायित्व 


 विक्रेताओं की पहचान करना ।


 मूल्य का मोलभाव करना ।


बनते समय और लदान – पूर्व गुणवत्ता की जाँच करना ।


यह लागत और समय की पर्याप्त बचत करती हैं । 


उत्पादन प्रक्रिया , गुणवत्ता पर नियंत्रण रखना ।


क्रय एजेंसियों के माध्यम से खरीदना निर्यातकों के लिए लाभदायक ।


❇️ निर्यात उदयम में व्यापारिक गतिविधियाँ :-

🔹 निर्यात उद्यम में दो प्रकार के व्यापारी होते हैं

🔶 क्रय एजेंट :- 


खरीदारों और उत्पादकों के बीच मध्यस्थता का कार्य सुनिश्चित करना कि उत्पाद का विकास खरीदार की आवश्यकताओं के अनुसार हुआ है ।


स्रोत ढूँढ़ने , नमूना लेने और खरीदार से बातचीत करने की जिम्मेदारी ।


🔶 उत्पादक व्यापारी :- 


उत्पादन और खरीदार व्यापारियों के बीच मध्यस्थता का कार्य । उत्पादन को समयबद्धता और खरीदार की आवश्यकताओं के अनुसार कराने की जिम्मेदारी होती है ।


❇️ बाजार विभाजन :-

🔶 जनांकिकीय विभाजीकरण :- यह समूहन मुख्य रूप से जनसंख्या , आयु , जेंडर , व्यवसाय , शिक्षा और आय पर आधारित होता है ।  

🔶 भौगोलिक विभाजीकरण :- मुख्य रूप से नगरों , राज्यों और क्षेत्रों पर आधारित समूहन है । विभिन्न स्थानों की जलवायु परिवर्तनशील हो सकती है और यह व्यापार के विकल्पों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है , विशेष रूप से कपड़ों का चयन जलवायु पर निर्भर रहता है । 

🔶 मनोवृत्तिपरक विभाजीकरण :- यह समूहन सामाजिक गतिविधियों , अभिरुचियों , मनोविनोद संबंधी कार्यों , आवश्यकताओं और अपेक्षाओं पर आधारित है । समान जीवन शैलियों वाले लोग लक्षित बाज़ार समूह बना सकते हैं ।  

🔶 व्यवहारगत विभाजीकरण :- विशिष्ट उत्पादों या सेवाओं की राय पर आधारित समूहन है । कई बार उत्पादों और सेवाओं के उपयोग का मूल्यांकन किया जाता है । सेवा / उत्पादन में सुधार के लिए , मदद से उसे दूसरों से अलग बनाते हैं ।

❇️ फ़ैशन के खुदरा संगठन :-

🔹 संगठनात्मक ढाँचे में प्राधिकारियों की स्पष्ट समझ और पूरे किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिए उत्तरदायित्व शामिल हैं । संगठन प्रणाली विभिन्न प्रकार की व्यापार सामग्री , फुटकर फ़र्म के आकार और लक्षित ग्राहक अनुसार भिन्न होती है । 

🔶 छोटा एकल – इकाई स्टोर :- पड़ोस की दुकान की तरह होता है । ये मालिक और परिवार द्वारा चलाए जाने वाले स्टोर होते हैं ।

🔶 विभागीय स्टोर :- विभागीय स्टोर में पृथक भाग होते हैं जो विभागों के नाम से जाने जाते हैं , जैसे – कपड़े , खेल का सामान , यांत्रिक सप्लाई , स्वास्थ्य और सौंदर्य उत्पाद तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण । कुछ विभागीय स्टोर खाद्य उत्पाद भी बेचते हैं ।

🔶 स्टोर शृंखला :- ऐसी फुटकर दुकानें होती हैं , जिनका एक ही ब्रांड और केंद्रीय प्रबंधन होता है और सामान्यतः इनकी मानकीकृत व्यावसायिक विधियाँ और पद्धतियाँ होती हैं ।

❇️ प्रमुख विभाग :-

🔶 व्यापारिक प्रभाग :- क्रय , व्यापारिक नियोजन और ‘ नियंत्रण , विक्रय , फैशन समन्वय

🔶 विक्रय और संवर्धन प्रभाग :- विज्ञापन , दृश्य ‘ व्यापार विशेष घटनाएँ , प्रचार और जनसंपर्क .

🔶 वित्त और नियंत्रण प्रभाग :- जमा , खातादेय और सामान सूची नियंत्रण

🔶 प्रचालन प्रभाग :- सुविधाओं , भडांर / दकानों और व्यापार सामग्री के सुरक्षा की देखभाल

🔶 कार्मिक और शाखा स्टोर प्रभाग :- यदि स्टोर प्रचालन बहुत बड़े हैं तो यह प्रभाग अलग से कार्य कर सकता है ।

❇️ लक्षित बाज़ार :-

🔶 परिभाषा :- उपभोक्ता की वह श्रेणी , जिसे व्यापारी अपने उत्पाद बेचने के लिए लक्षित करता है । 

🔶 महत्त्व :- यह विक्रय विभाग को उन उपभोक्ताओं पर केंद्रित करने में सहयोग दगा , जिनके द्वारा सामान खरीदने की संभावना अधिक होगी और विपणन / विक्रय पर हुए व्यय का अधिकतम लाभ मिलेगा ।

🔶 प्रक्रिया :- बाजार विभाजन द्वारा किया जाता है । ऐसी नीति है जो बड़े बाज़ार को उपभोक्ताओं के ऐसे उपसमूहों में बाँटती है जिनकी आवश्यकताएँ और सामान की उपयोगिताएँ तथा बाजार में उपलब्ध सेवाएँ सर्व सामान्य होती हैं ।

Class 12 Home Science Chapter 11 वस्त्र एवं परिधान के लिए डिज़ाइन Design for Fabric and Apparel Notes In Hindi


 

Class 12 Home Science Chapter 11 वस्त्र एवं परिधान के लिए डिज़ाइन Design for Fabric and Apparel Notes In Hindi


📚 अध्याय = 11 📚

💠 वस्त्र एवं परिधान के लिए डिज़ाइन 💠

❇️ डिज़ाइन :-

🔹 यह उच्च फैशन पोशाकों और उससे जुड़ी वस्तुयों के लिए प्रयोग में लाया जाता है । डिज़ाइन मात्र सजावट नहीं है । एक मोहक वस्तु अच्छे से डिज़ाइन की हुई नहीं समझी जाती यदि वह उपयोग के लिए सहीं नहीं है । 

🔹 डिज़ाइन , उत्पादों ( product ) की कल्पना करने , योजना बनाने और कार्यान्वित करने की मानवीय सामर्थ्य है , जो मानव जाति को किसी वैयक्तिक अथवा सामूहिक उद्देशय को पूरा मे सहायता करती है ।

❇️ डिज़ाइन विश्लेषण :-

🔹 चाही गई वस्तु की रचना के लिए डिज़ाइन एक योजना के अनुसार व्यवस्था होती है । यह योजना के कार्यात्मक भाग से एक कदम आगे होती है और एक परिणाम देती है , जिससे सौंदर्यबोधक संतोष मिलता है । इसका अध्ययन दो पहलुओं में होता है संरचनात्मक तथा अनुप्रयुक्त ।

❇️ डिज़ाइन के प्रकार :-

🔶 संरचनात्मक डिज़ाइन :- वह है जो रूप पर निर्भर करता है , न कि ऊपरी सजावट पर । पोशाक मे , यह कपड़े की मूल कटाई या आकार से संबंध रखता है । 

🔶 अनुप्रयुक्त डिज़ाइन :- मुख्य डिज़ाइन का एक भाग होता है , जो मूल संरचना के ऊपर बनाया जाता है । वस्त्र की सज्जा मे रँगाई तथा छपाई , कसीदाकारी और सुई धागे का काम उसका रूप बदल देता है ।

❇️ डिज़ाइन मे मुख्य कारक :-

🔶 डिज़ाइन के तत्त्व :- रंग , बनावट , रेखा , आकृति अथवा रूप है । 

🔶 डिज़ाइन के सिद्धांत :- सामंजस्य , संतुलन , आवर्तन , अनुपात और महत्त्व ।

❇️ डिज़ाइन के तत्व रंग :-

🔹 रंग- उत्पाद की पहचान का श्रेय अधिकतर रंग को दिया जाता है । रंग मौसम , संस्कृति भावानाओं और फैशन का मुख्य अंग है । 

🔹 रंग सिद्धांत रंग को प्रकाश के किसी वस्तु के पृष्ठ से टकराकर परावर्तन होने के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है । किरणे दृष्टिपटल ( retina ) से टकराती है और आँख की तंत्रिकायों की कोशिकायों को उत्तेजित करती है । तंत्रिकाय मस्तिष्क को एक संदेश भेजती है , जो एक विशेष अनुभूति उत्पन्न करता है और हम रंग को अनुभव करते है ।

🔹 जो रंग मस्तिष्क द्वारा अवलोकित किया जाता है , वो प्रकाश स्त्रोत की एक विशिष्ट तरंग के संयोजन पर निर्भर करता है । किसी वस्तु का रंग देखने के किए यहू आवश्यक है कि वस्तु द्वारा प्रावर्तित प्रकाश को देखा जा सके । जब प्रकाश कि सभी किरणे परावर्तित होती है तो वस्तु सफेद दिखाई पड़ती है , जब कोई भी किरण परावर्तित नहीं होती तो वस्तु काली दिखाई पड़ती है ।

❇️ रंग का उल्लेखन :-

🔹 रंग को तीन रूपों में उल्लेखित किया जाता है – रंग ( ह्यू ) , मान तथा तीव्रता या क्रोमा ।

🔶 ह्यू रंग :- हुयू रंग का सामान्य नाम है । वर्णक्रम सात रंगों को दर्शाता है । मुनसेल रंग चक्र द्वारा रंगो को निम्न प्रकार से विभाजित किया गया है ।

🔶 रंग का मूल्य / मान :- ये रंग के हलकेप्न या गहरेपन को बताता है जिसे आभा ( tint ) या रंगत ( shade ) माना जाता है । सफेद रंग का मान अधिकतम तथा काले रंग का मान न्यूनतम होता है ।  ,

🔶 तीव्रता या कोमा :- रंग की चमक ( brightness ) या विशुद्धता होती है । जब किसी रंग को अन्य रंग के साथ मिलाते है विशेषकर रंग चक्र पर इसके विपरीत रंग के साथ तो रंग मे मंदता ( Dullness ) आ जाती है । 

❇️ ह्यू रंग द्वारा रंगों के प्रकार :-

🔶 प्राथमिक रंग :- ये रंग अन्य रंगो को मिलाने से नहीं बनते । ये रंग है- लाल , पीला और नीला । 

🔶 द्वीतीयक रंग :- ये प्राथमिक रंगो को मिलाकर बनाए जाते है । ये रंग है- नारंगी , हरा और बैंगनी ।

🔶 तृतीयक रंग :- ये रंग चक्र पर निकटवर्त प्राथमिक और एक द्वीतीयक रंग को मिलाकर बनाय जाते है । जैसे- लाल नारंगी , पीला – नारंगी , पीला – हरा , नीला – हरा , नीला- बैंगनी और लाल- बैंगनी । 

🔶 उदासीन रंग :- सफ़ेद , काला , धूसर ( grey ) , रजत ( silver ) और धात्विक ( metallic ) । इनको अवर्णक ( achromatic ) अर्थात बिना रंग के रंग कहा जाता है ।

❇️ रंग योजनाएँ :-

🔹 रंगों के संयोजन के लिए मार्गदर्शन के रूप में कुछ मूलभूत रंग योजनाएँ उपयोग में लाई जाती हैं । एक वर्ण योजना यह सुझाती है कि किन रंगों का संयोजन करना है , रंगों के मान और तीव्रताएँ और उपयोग में आने वाले प्रत्येक रंग की मात्रा का निर्धारण डिज़ाइनर अथवा उपभोक्ता करते हैं । रंग योजनाओं का अध्ययन वर्णचक्र के संदर्भ में भली – भाँति किया जाता है ।

🔹 वर्ण योजनाओं की चर्चा दो समूहों में की जा सकती है :- 

❇️ संबन्धित योजनाओं :-

🔹 संबन्धित योजनाओं मे कम से कम एक रंग सामान्य होता है । ये योजनाएँ है :-


एक वर्णी सुमे का अर्थ है कि सुमेल एक रंग पर आधारित है । इस अकेले रंग के मान और तीव्रता में विविधता लाई जा सकती है । 


अवर्णी सुमेल केवल उदासीन रंगों का उपयोग करता हैं , जैसे- काले और सफेद का संयोजन । 


विशिष्टतापूर्ण उदासीन एक रंग और एक उदासीन या एक आवार्णी रंग का उपयोग करता है ।


अनुरूप सुमेल का अर्थ उस वर्ण संयोजन से है , जिसे वर्णं चक्र के दो या तीन निकटवर्ती रंगों के उपयोग से प्राप्त किया जा सकता है ।


❇️ विषम योजनाएँ :-


पुरक सुमेल मे दो रंगों का उपयोग किया जाता है , जो वर्ण चक्र में एक – दूसरे के ठीक सामने होते हैं । 


दोहरा पूरक सुमेल दो पूरक युगलों से होता है , जो वक्र चक्र मैं पड़ोसी होते है । 


विभाजित पूरक सुमेल मे एक रंग , उसके पूरक रंग और पड़ोसी रंग का उपयोग कर तीन रंगों का संयोजन होता है । 


अनूरुप सुमेलु अनुरूप और पूरक योजनाओं का संयोजन है , इसमें पड़ोसी रंगों के समूह में प्रधानता के लिए पूरक का चयन किया जाता है । 


त्रणात्मक सुमेल वर्णचक पर एक – दूसरे से समान दूरी पर स्थित तीन रंगों का संयोजन होता है ।


❇️ बुनावट :-

🔹 बुनावट दिखने और छूने की एक संवेदी अनुभूति है जो वस्त्र की स्पर्शी तथा दृश्य गुणवत्ता को बताती है । 


यह कैसा दिखाई देता है :- चमकीला , मंद , घना आदि । 


उसकी प्रकृति कैसी है :- ढीला , लटका हुआ , कड़ा । 


छूने पर कैसा लगता है :- नरम , कड़क , रूखा , ऊबड़ खाबड़ , खुरदरा ।


❇️ बुनावट का निर्धारण :-

🔹 निम्नलिखित कारक सामग्री मे बुनावट का निर्धारण करते है :- 


रेशा 


धागे का संसाधन और धागे का प्रकार 


वस्त्र निर्माण तकनीक


वस्त्र सज्जा 


पृष्ठीय सजावट 


❇️ रेखा :- 

🔹 रेखा उस चिन्ह को कहते है , जो दो बिन्दुओं को जोड़ती है ।

❇️ रेखा के प्रकार  :-

🔹 मूल रूप से रेखा के दो प्रकार होते हैं :-

❇️ सरल रेखा :-

🔹 सरल रेखा एक दृढ़ अखंडित रेखा होती है । सरल रेखाएँ अपनी दिशा के अनुसार विभिन्न प्रभावों का सर्जन करती हैं । वे मनोवृत्ति का प्रदर्शन भी करती हैं । 

🔶 ऊर्ध्वाधर रेखाएँ :- ऊपर और नीचे गति पर बल देती हैं , ऊँचाई का महत्त्व बताती हैं और वह प्रभाव देती हैं जो तीव्र , सम्मानजनक और सुरक्षित होता है ।

🔶 क्षैतिज रेखाएँ :- एक ओर से दूसरी ओर गति बल देती हैं और चौड़ाई के भ्रम का सर्जन करती हैं , क्योंकि ये धरातली रेखा की पुनरावृत्ति करती हैं , ये एक स्थायी एवं सौम्य प्रभाव देती हैं । 

🔶 तिरछी अथवा विकर्ण रेखाएँ :- कोण की कोटि और दिशा पर निर्भर करते हुए चौड़ाई और ऊँचाई को बढ़ाती या घटाती हैं । ये एक सक्रिय , आश्चर्यजनक अथवा नाटकीय प्रभाव सर्जित कर सकती हैं । 

❇️ वक्र रेखाएँ :-

🔹 वक्र रेखाएँ किसी भी कोटि की गोलाई वाली रेखा होती है । वक्र रेखा एक सरल चाप अथवा एक मुक्त हस्त से खींचा गया वक्र हो सकता है । गोलाई की कोटि वक्र का निर्धारण करती है । अल्प कोटि की गोलाई सीमित वक्र कहलाती है । अधिक कोटि की गोलाई एक वृत्तीय वक्र देती है । 

❇️ आकृतियाँ या आकार :-

🔹 रेखायों को जोड़कर आकार बनाए जाते है आकृतियाँ द्विविमीय या त्रिविमीय हो सकती आकृतीयों के चार मूलभूत समूह होते है :-


प्राकृतिक आकृतियाँ जो प्रकृति अथवा मानव निर्मित वस्तुओं की नकल होती है ।  


फैशनेबल शैली 


ज्यामितीय आकृतियाँ


अमूर्त आकृतियाँ 


❇️ पैटर्न :- 

🔹 एक पैटर्न तब बनता है , जब आकृतियाँ एक साथ समूहित की जाती है । यह समूहन एक प्रकार की आकृतियों अथवा दो या अधिक प्रकार की आकृतियों के संयोजन को हो सकता है । 

❇️ डिज़ाइन के सिद्धांत :-

🔹 वे नियम हैं , जो संचालन करते हैं कि किस प्रकार श्रेष्ठतम तरीके से डिज़ाइन के तत्वों को परस्पर मिलाया जाए । प्रत्येक सिद्धांत एक पृथक अस्तित्व रखता है , उन्हें सफलतापूर्वक उपयोग एक प्रभावशाली उत्पाद का निर्माण करता है ।

🔹 हर परिधान को पहनने वाले को ध्यान में रखते हुए विशिष्ट रूप से डिजाइन किया जाता है । सिद्धांत डिजाइनिंग के लिए विशिष्ट दिशाएँ निर्धारित करते हैं । एक डिज़ाइनर को इन सिद्धांतों के बारे में कल्पना करनी होगी ।

❇️ अनुपात :-

🔹 अनुपात का अर्थ वस्तु के एक भाग का दूसरे भाग से संबंध होता है । एक अच्छा डिज़ाइन -विश्लेषण नहीं होने देता । तत्वों को इतनी कुशलतापूर्वक सम्मिश्रित किया जाता है कि जहाँ से एक समाप्त होता है और दूसरा प्रारंभ होता है , वह वास्तव में प्रकट नहीं होता । यह संबंध आमाप , रंग , आकृति , और बुनावट में सर्जित किया जा सकता है ।

❇️ अनुपात के प्रकार :-

🔶 रंग का अनुपात :- स्वर्णिम माध्य का उपयोग करते हुए , रंग का अनुपात उत्पन्न करने के लिए कमीज और पेंट के विभिन्न रंग पहने जा सकते हैं ।

🔶 बुनावट का अनुपात :- यह तब प्राप्त होता है , जब पोशाक बनाने वाली सामग्री की विभिन्न बुनावटें , पोशाक पहनने वाले व्यक्ति का साइज़ बढ़ा या घटा देती हैं । उदाहरण के लिए , एक दुबले और ठिगने व्यक्ति पर भारी तथा वृह्दाकार बुनावटें हावी होती प्रतीत होती हैं ।

🔶 आकृति तथा रूप का अनुपात :- एक पोशाक में कलाकृतियों अथवा छपाई का साइज़ और स्थिति पहनने वाले के साइज़ के अनुपात में होते हैं । शरीर की चौड़ाई , कमर या धड़ की लंबाई , टाँगों की लंबाई आदर्श शारीरिक आकृति से अलग हो सकती हैं । वस्त्र धारण रुचिकर ढंग से भद्दे शारीरिक अनुपात का एक उचित अनुपात में रूपांतरण करते हैं । 

❇️ औपचारिक सतुलन :-


परिधान का एक पक्ष दूसरे पक्ष की सटीक प्रति ।


काल्पनिक रेखा के दवारा दो समान भागों में विभाजित ।


कम महंगी और सबसे अधिक अपेक्षित प्रकार की डिजाइन । 


स्थिरता , गरिमा और औपचारिकता लेकिन नीरस ।


कम रचनात्मक , रंग बनावट का उपयोग । जैसे :- स्कर्ट , कार्डिगन , सूट


❇️ अनौपचारिक संतलन :- 


दोनों तरफ परिधान की संरचना अलग – अलग है ।


उत्साह प्रदान नाटकीय और ध्यान आकर्षित करता है । 


संतुलन बनाने के लिए अधिक रचनात्मकता । 


शरीर की अनियमितता छिपी ।


विशेष अवसर के कपड़े , अधिक महंगा


❇️ आवर्तिता :-

🔹 आवर्तिता का अर्थ है डिज़ाइन अथवा विवरण की लाइनों , रंगों अथवा अन्य तत्वों को दोहराकर पैटर्न का सर्जन करना , जिसके माध्यम से पदार्थ या वस्तु / पोशाक आँख को अच्छा लगे । आवर्तिता रेखाओं , आकृतियों , रंगों तथा बुनावटों का उपयोग कर इस प्रकार सर्जित की जा सकती है कि यह दृश्य – एकता दर्शाती है ।

❇️ सामंजस्यता :-

🔹 सामंजस्यता अथवा एकता तब उत्पन्न होती है , जब डिज़ाइन के सभी तत्व एक रोचक सामंजस्यपूर्ण प्रभाव के साथ एक – दूसरे के साथ आते हैं । यह विपणन योग्य ( जन स्वीकृति ) डिज़ाइनों के उत्पादन में एक महत्वपूर्ण कारक है ।

❇️ आकृति द्वारा सामंजस्यता :-

🔹 यह तब उत्पन्न होती है जब पोशाक के सभी भाग एक जैसी आकृति दर्शाते हैं । जब कॉलर , कफ़ तथा किनारे गोलाई लिए होते हैं , तब यदि जेबें वर्गाकार बना दी जाएँ , तो ये डिज़ाइन की निरंतरता में बाधक होंगी ।

Class 12 Home Science Chapter 10 बच्चों , युवाओं और वृद्धजनों के लिए सहायक सेवाओं , संस्थानों और कार्यक्रमों का प्रबंधन Notes In Hindi


 

Class 12 Home Science Chapter 10 बच्चों , युवाओं और वृद्धजनों के लिए सहायक सेवाओं , संस्थानों और कार्यक्रमों का प्रबंधन Notes In Hindi


📚 अध्याय = 10 📚

💠 बच्चों , युवाओं और वृद्धजनों के लिए सहायक सेवाओं , संस्थानों और कार्यक्रमों का प्रबंधन 💠

❇️ परिचय :-

🔹 किसी भी देश की समृद्धि उसके विभिन्न आयु वर्गों के नागरिको की खुशहाली और प्रगति पर निर्भर करती है । 

🔹 हर देश के कुछ लघु और कुछ दीर्घकालिक वित्तीय सामाजिक लक्ष्य होते हैं जिनकी पूर्ति के लिए सरकार सभी आयु वर्गों को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसी संस्थानों और सेवाओं का गठन करती है जो बच्चों , युवाओं , महिलाओं और वृद्धजनों के जीवन में सुधार के लिए प्रतिबद्ध होती है ।

❇️ महत्त्व :-

🔹 परिवार समाज की मूल इकाई होता है और इसका प्रमुख कार्य अपने सदस्यों की देखभाल करना और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना होता है । 

🔹 हर समुदाय कुछ ऐसी संरचनाओं जैसे कि विद्यालयों , अस्पतालों , विश्वविद्यालयों , मनोरंजन केंद्रों , प्रशिक्षण केंद्रों आदि का निर्माण करता है ।

🔹 जो सहायक सेवाएं प्रदान करते हैं और जिनका उपयोग परिवार के विभिन्न सदस्य अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर सकते हैं ।

🔹भारत में सहायक तथा विशिष्ट सेवाओं एवं संसाधनों की कमी के परिणाम भारत में निर्धानता का स्तर बहुत बढ़ गया । 

🔹 हर देश तथा राज्य की सरकार और वहाँ के समाज का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपने यहाँ के गरीब परिवारों में काम करने वाले नागरिकों के लिए विशेष प्रयासों एवं नीतियों द्वारा उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने का काम करें ।

🔹 ताकि सभी नागरिक अच्छा और स्वस्थ जीवन जिए और बच्चों तथा युवाओं को स्वस्थ परिवेश में विकास के अवसर प्राप्त हो सके । इसके अलावा कार्य करने वाले निजी क्षेत्र तथा गैर – सरकारी संगठनों को भी हर संभव सहायत प्रदान कर चाहिए ।

❇️ समाज के संवेदनशील समूह :-

🔹 बच्चे , युवा और वृद्धजन हमारे समाज के संवेदनशील समूह है ।

❇️ बच्चे संवेदनशील क्यों होते हैं ? 

🔹 बच्चे के सभी क्षेत्रों में उत्तम विकास के लिए यह जरूरी है कि बच्चे की भोजन , आवास , स्वास्थ्य देखभाल , प्रेम , पालन और प्रोत्साहन की आवश्यकताओं को समग्र रूप से पूरा किया जाए । ऐसा न होने कारण बच्चे के विकास पर स्थायी प्रभाव पड़ सकता है । इसी कारण से बच्चे संवेदनशील माने जाते हैं ।

❇️  भारत में किशोरों के लिए न्याय का प्राथमिक वैधानिक ढाँचा :-

🔹 भारत में किशोरों के लिए न्याय का प्राथमिक वैधानिक ढाँचा primary legal framework ) है ।

🔹 यह अधिनियम निम्न दो प्रकार के किशोरों से संबंधित है :-

🔶  वे जो कानून का उल्लंघन करते हैं :-

🔹 कई बार कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चों को बाल अपराधी ( Juvenile ) भी कहा जाता है ।

🔹 उन्हें पुलिस द्वारा इसलिए पकड़ा गया हो क्योंकि उन्होंने ऐसा कोई जुर्म किया हो जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार किया जाना जरूरी है ।

🔹 इस अधिनियम में बाल अपराध की रोकथाम तथा बाल अपराधियों के साथ उचित व्यवहार के लिए विशेष दिशा – निर्देश दिए गए हैं । 

🔶 वे जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता होती है :-

🔹 इस अधिनियम के तहत उन बच्चों की देखभाल और संरक्षण का प्रावधान भी है जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता या जिन्हें बंधुआ मजदूरी या कि कारखाने इत्यादि में गैर कानूनी रूप से रखकर काम करवाया जाता है ।

❇️ देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान :-

🔹 जिनका कोई घर निश्चित स्थान अथवा आश्रय नहीं है अथवा जिनके पास निर्वहन का कोई साधन नहीं है । 

🔹 इनमें छोड़े हुए बच्च सड़क पर पलने वाले बच्चे घर छोड़कर भाग जाने वाले बच्चे और गुमशुदा बच्चे शामिल है ।

🔹 जो किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रहते हैं जो बच्चे की देखभाल के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है या , जहाँ बच्चे के मारे जाने उनके साथ दुर्व्यवहार होने या फिर व्यक्ति द्वारा उसके प्रति लापरवाही बरतने की संभावना होती है । 

🔹जिन बच्चो को मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग , बीमार अथवा किसी लंबी या ठीक न होने वाली बीमारी हो और जिनके पास उनकी देखभाल या सहायता के लिए कोई न हों ।

🔹 जिन्हें यौन दुर्व्यवहार या अनैतिक कामो के लिए दंडित किया जाता है ।

🔹 जो नशीली दवाओं की लत या उनके अवैध व्यापार के लिए संवेदनशील होते है ।

🔹 जो सशस्त्र विद्रोह नागरिक विद्रोह या प्राकृतिक आपदा के शिकार होते हैं ।

❇️ संस्थागत कार्यक्रम और बच्चों के लिए पहल :-

🔹 निम्नलिखित कुछ ऐसे ही प्रयासों / कार्यक्रमों का विवरण दिया गया है जिन्हें सरकार अथवा गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाय जा रहा है

❇️ समेकित बाल विकास सेवाएँ :-

विश्व का सबसे बड़ा प्रारंभिक बाल्यावस्था कार्यक्रम है । 

🔶 समेकित बाल विकास सेवाएँ के मुख्य उद्देश्य :-

🔹 इस योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है :-


समेकित तरीके से 0-6 वर्ष तक के बच्चों , किशोरियों गर्भवती तथा धात्री माताओं के स्वास्थ्य , पोषण , टीकाकरण तथा प्रारंभिक शिक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना है


गर्भवती तथा धात्री माताओं के लिए स्वास्थ्य , पोषण , स्वच्छता तथा उचित टीकाकरण संबंधी शिक्षा / जानकारी देना ।


3-6 वर्ष तक की आयु के बच्चों को अनौपचारिक विद्यालय पूर्व शिक्षा देना ।


छह वर्ष से कम आय के सभी बच्चों तथा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पूरक भोजन वृद्धि की निगरानी तथा मूलभूत स्वास्थ्य एवं देखरेख संबंधी सेवाएँ उपलब्ध कराना ।


इन सेवाओं के अंतर्गत 0-6 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए टीकाकरण और विटामिन ए पूरकों को प्रदान करता है ।


ये सेवाएँ सभी आँगनबाड़ी देखरेख केंद्र पर समेकित तरीके से दी जाती हैं ।


❇️ एस.ओ.एस. बाल गाँव :-

🔹 एस.ओ.एस. एक स्वतंत्र गैर सरकारी सामाजिक संगठन है जिसने अनाथ और छोड़े हुए बच्चों की लंबे समय तक देखरेख के लिए परिवार मॉडल पर आधारित अभिगम ( family approach ) को शुरुआत की है ।

🔶 उद्देश्य :-


ऐसे बच्चों को परिवार आधारित दीर्घावधि की देखरेख प्रदान करना है जो किन्हीं कारणों से अपने जैविक परिवारों के साथ नहीं रहते हैं ।


🔶 कार्यविधि तथा लाभ :-


प्रत्येक एस.ओ.एस. घर में एक ‘ माँ होती है जो 10-15 बच्चों की देखभाल करती है ।


यहाँ सभी बच्चे एक परिवार की तरह रहते हैं , जिसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि बच्चे एक बार फिर संबंधों और प्रेम का अनुभव करते हैं ।


ऐसे घरों में बच्चे एक पारिवारिक परिवेश में पलते हैं और एक वयस्क बनने तक उनको व्यक्तिगत रूप से सहायता की जाती है ।


कई एस.ओ.एस. परिवार एक साथ रहते है ताकि एक सहायक ग्राम परिवेश ( supportive village environment ) बनाया जा सकें ।


नोट :- भारत में पहला एस.ओ.एस. गाँव 1964 में स्थापित किया गया था ।


❇️ बाल गृह :-

🔹 यह 3-18 वर्ष के बच्चों के लिए होते है जिन्हें विभिन्न कारणों से राज्य की देखरेख ( custody ) में रखा जाता हैं ।

❇️ बाल गृह के प्रकार :-

🔹 बच्चों के लिए निम्न तीन प्रकार के बाल गृह स्थापित किए जाते हैं :-

🔶 प्रेक्षण गृह :- प्रेक्षण गृहों में मुख्य रूप से गुमशुदा या कहीं से छुड़ाए गए बच्चों को अस्थायी रूप से अशेत उनके माता पिता का पता लगाए जाने तक और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी एकत्रित किए जाने तक रखा जाता है ।

🔶 विशेष गृह :- विशेष गृह वह स्थान होते है जहाँ कानून का उल्लंघन करने वाले 18 वर्ष से कम आयु के किशोर को हिरासती देख रेख में रखा जाता है ।

🔶 किशोर / बाल गृह :- किशोर / बाल गृहों में अधिकतर उन बच्चों को रखा जाता है जिनके परिवार का कोई अता – पता नहीं होता या फिर उन बच्चों को जिनके माता पिता / अभिभावक मर चुके होते है ।

यहाँ ऐसे बच्चों को भी रखा जाता है जिनके माता अभिभावक उन्हें अपने पास / साथ नहीं रखना चाहते हैं ।

❇️ गोद लेना / दत्तक गृहण :-


पहले के समय में परिवार में से ही बच्चा गोद ले लिया जाता था ।


लेकिन बदलते समय के साथ परिवार के बाहर से बच्चा गोद लेने की प्रथा को संस्थागत और विधिक ( institutionalized and legalized ) बना दिया गया है ।


कई गैर सरकारी संगठन ( एन . जी.ओ. ) भी बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया के लिए आवश्यक वितरण प्रणाली प्रदान करते हैं । –


बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर एक केंद्रीय संस्था तथा केंद्रीय दत्तक गृहण संसाधन संस्था ( सी.ए.आर.ए. ) का गठन किया है ।


जो बच्चों के कल्याण और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए गोद लेने संबंधी सभी दिशा निर्देश निर्धारित करती है ।


❇️ यूवा क्यों संवेदनशील हैं?


राष्ट्रीय युवा नीति , 2014 में 15-29 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति को युवा कहा गया हैं ।


इस नीति में 13-19 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति को किशोर किशोरी ( Adolescents ) कहा गया हैं ।


युवावस्था को निम्न कारणों से संवेदनशील अवधि माना जाता :-


🔶 तीव्र शारीरिक परिवर्तन :- 


किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन बहुत तेजी से होते हैं । अक्सर किशोर इन परिवर्तनों के लिए तैयार नहीं होते इसलिए वह घबरा जाते हैं ।


इसी कारण वह परेशानी और निराशा का अनुभव करते हैं ।


उनके लिए यह समय काफी कठिन होता है क्योंकि इन परिवर्तनों का अपने व्यक्तित्व के साथ समायोजन करने में उन्हें काफी समय लगता है ।


🔶 संवेगात्मक परिवर्तन :-


संवेगात्मक परिवर्तनों के कारण भी किशोर संवेगात्मक रूप से अस्थिर व उत्तेजित महसूस करते हैं ।


इस अवस्था में किशोरों के संवेग बहुत तीव्र और अनियंत्रित होने के कारण उन्हें सर्वगात्मक परिस्थितियों में संभालना कठिन हो जाता है ।


मानसिक अस्थिरता के कारण किशोर तनाव का अनुभव करते हैं ।


🔶 लैंगिक परिवर्तन :-


किशोरावस्था में लैगिक परिवर्तनों के कारण किशारों के जीवन में बड़ी तेजी से परिवर्तन होते हैं ।


लैगिक विकास को प्राप्त करने वाली किशोरियाँ झिझक महसूस करती हैं वहीं देर से परिपक्व होने वाले किशोर चिंतित हो उठते हैं कि उनकी सामान्य किशोरों की तरह दाढ़ी मूछ आएगी या नहीं ?


🔶 सामाजिक परिवर्तन :-


हालांकि किशोर दिखने में किसी वयस्क के समान प्रतीत होते हैं परंतु उनकी मानसिक स्थिति बच्चों की तरह ही होती है ।


कभी तो उनके साथ बड़ों की तरह व्यवहार किया जाता है तो कभी बच्चों की ही तरह समझा जाता है ।


उन्हें बड़ों की तरह जिम्मेदारियाँ तो दी जाती हैं परन्तु यदि वह किसी अधिकार की मांग करते हैं तो उन्हें अभी तुम बच्चे हो ‘ कहकर मना कर दिया जाता है ।


किशोरियों पर भी कई प्रकार के सामाजिक बंधन लगा दिये जाते हैं । जैसे- स्कर्ट की जगह सूट पहनने के लिए कहा जाता है व लड़कों की अपेक्षा घर लौटने का समय निर्धारित कर दिया जाता है ।


🔶 साथियों द्वारा स्वीकृति :-


किशोरों के लिए उसके साथियों की स्वीकृति बहुत महत्वपूर्ण होती है ।


वे अपने मित्र समूह के नियमों के अनुरूप कार्य करना चाहते हैं ताकि मित्रों में उनकी प्रतिष्ठा ( status ) बनी रहे ।


वहीं यदि मित्रों व माता पिता के विचारों में मतभेद हो तो ऐसे में किशोर के लिए दोनों तरफ सामजस्य बनाना काफी कठिन हो जाता है । जिसके कारण किशोर अक्सर तनावग्रस्त रहने लगते हैं । 


🔶 भविष्य की चिंता :-


किशोरावस्था में किशोर अपने भविष्य के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं ।


पढ़ाई का उन पर दबाव रहता है ताकि वे अच्छे अंक प्राप्त कर सकें व आगे उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय प्रवेश पा सके ।


इससे वह बहुत चिन्तित रहते हैं कि वह अपनी आँशाओं को पूरा कर पायेंगे या नहीं , इसलिए वह तनाव की स्थिति में रहते है ।


🔶 विषमलिंगियों के प्रति आकर्षण :-


किशोरों के लिए विषमलिंगियों के प्रति आकर्षण व उनको स्वीकृति प्राप्त करना एक चिता का विषय रहता है ।


वह अपने व्यक्तित्व के बारे में चिन्तित रहते है कि क्या वह विषमलिंगीय मित्रों में लोकप्रिय हो पाएंगे की नहीं , इसी कारण वह हमेशा तनाव व चिंता रहते हैं ।


❇️ राष्ट्रीय सेवा योजना – NSS :-

🔹 राष्ट्रीय सेवा योजना का मुख्य उद्देश्य विद्यालय स्तर के विद्यार्थियों को समाज मे वा और राष्ट्रीय विकास से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल करना तथा उनकी सहभागिता बढ़ाना होत है ।

❇️ योजना के अंतर्गत किये गए कार्य :-

🔹 इस योजना के अंतर्गत आमतौर पर निम्न कार्य किए जाते है :-


सड़कों के निर्माण और मरम्मत कार्य ।


विद्यालय की इमारत की सफाई एवं रखरखाव । 


गाँव में तालाबो / ताल आदि का निर्माण ।


वृक्षारोपण , गड्डे खोदना इत्यादि तालाबों से खरपतवारों को निकालना ।


स्वास्थ्य और सफाई संबंधित क्रियाकलाप ।


परिवार कल्याण संबंधी कार्यक्रम बाल – देखरेखसंबंधी कार्यक्रम सामूहिक टीकाकरण कार्यक्रम ।


शिल्प , सिलाई , बुनाई प्रशिक्षण कार्यक्रम ।


व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम ।


❇️ राष्ट्रीय सेवा स्वयंसेवक योजना :-

🔹 इस योजना के अंतर्गत नेहरू युवा केंद्र के माध्यम से ऐसे विद्यार्थियों को पूर्णकालिक रूप से एक या दो वर्ष की अल्पावधि के लिए राष्ट्रीय विकास के कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर प्रदान किया जाता है , जो अपनी पहली डिग्री प्राप्त कर चुके हो । 

🔹 इस योजना के अंतर्गत विद्यार्थियों को प्रौढ़ क्लबों की स्थापना कार्य शिविरों के आयोजन , युवा नेतृत्व के प्रशिक्षण कार्यक्रमों , व्यावसायिक प्रशिक्षण , ग्रामीण खेलकूद और वो को बढ़ावा देने के कार्यक्रमों में शामिल किया जाता हैं ।

🔶 योजना का उद्देश्य :-

🔹 इस योजना के माध्यम से नेहरू युवक केंद्रों का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के -विद्यार्थी युवकों को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में योगदान देने में सक्षम बनाना है ।

🔹 विभिन्न कार्यकलापों के द्वारा राष्ट्रीय रूप से मान्य उद्देश्य जैसे कि आत्मनिर्भरता , धर्म निरपेक्षता , सामाजिकता , प्रजातंत्र राष्ट्रीय एकता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना है । ,

🔹 औपचारिक शिक्षा , समाज सेवा शिविर , युवाओं के लिए खेलों का आयोजन , सास्कृतिक और मनोरंजन के कार्यक्रम व्यावसायिक प्रशिक्षण , युवा नेतृत्व प्रशिक्षण शिविर तथा युवाक्लबों को प्रोत्साहन देना और उनकी स्थापना करना ।

🔹 इसके अतिरिक्त उनमें गणितीय कौशल विकसित करने , उनकी कार्य क्षमता को बेहतर बनाने और उन्हें उनके विकास की संभावनाओं के बारे में जानकार बनाने का प्रयास भी किया जाता है ।

❇️ साहसिक कार्यों को प्रोत्साहन :-

🔹 युवा क्लब और स्वयंसेवी संगठन पर्वतारोहण , दुर्गम रास्तों पर पैदल यात्रा , आँकड़ों के सगृहण के लिए पड़ताल यात्रा , पहाड़ों की वनस्पतियों और जंतुओं वनों , मरुस्थलों और सागरों के अध्ययन , नौकायन , तटीय जलयात्रा , रफ्ट प्रदर्शनियाँ , तैरने और साइकिल चलाने जैसे साहसिक कार्यों के प्रोत्साहन के लिए सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता का उपयोग करके इन गतिविधियों का आयोजन करते हैं ।

🔹 इन कार्यकलापों / गतिविधियों का उद्देश्य युवाओं में साहस , जोखिम सहयोगात्मक रूप से दल में काम करने पढ़ने की लेने क्षमता और 3 , चुनौती पूर्ण स्थितियों के लिए सहन शीलता विकसित करने को प्रोत्साहन देना होता है । 

🔹 सरकार कार्यकलापों को सुक्ष सुरक्षित बनाने के लिए संस्थानों की स्थापना और विकास के लिए हर संभव सहायता प्रदान करती है ।

❇️ राष्ट्रमंडल युवा कार्यक्रम :-

🔹 भारत पिछले कई वर्षों से राष्ट्रमंडल युवा कार्यक्रमों में भागीदारी कर रहा है । इस भागीदारी का मुख्य उद्देश्य भारतीय युवाओं को देश को विकास प्रक्रियाओं में भागीदारी करने और राष्ट्रमंडल देशों में सहयोग और समझ को बढ़ाने के लिए मंच प्रदान करना है ।

🔹 इस कार्यक्रम के तहत भारत , जाम्बिया और गुआना में अध्ययन के लिए तीन क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए गए हैं । एशिया पैसीफिक क्षेत्रीय केंद्र , चंडीगढ़ , भारत है ।

❇️ राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन :-

🔹 सरकार अनेक स्वयंसेवी संस्था , वित्तीय सहायता प्रदान करती है ताकि वह ऐसे भ्रमण कार्यक्रम तैयार एवं क्रियान्वित करें जिसमें किसी एक प्रदेश में रहन वाल युवाआ को दूसरे ऐसे प्रदेशों के दौरे पर भेजा जाए जो सांस्कृतिक रूप से काफी भिन्न हों ।

🔹 इन भ्रमण कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य युवाओं में दूसरे प्रदेशों में स्थिति देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों , विभिन्न क्षेत्रों और परिवेशों के लोगों द्वारा झेली जाने वाली कठिनाइयों , देश के अन्य भागों के सामाजिक रीति रिवाजों आदि को अच्छी समझ विकसित करना होता है । 

❇️ वृद्धजन क्यों संवेदनशील है ? 


भारत में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों को वरिष्ठ नागरिक माना जाता है ।


चिकित्सा के क्षेत्र में हुई तरक्की के चलते दुनिया समेत भारत में भी वृद्धजनों की जनसंख्या में लगातार वृद्ध हो रही है ।


मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में भारत में वृद्धजनों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का लगभग 9 प्रतिशत थी ।


❇️ भारत में वृद्धजनों को जनसंख्या की विशिष्ट विशेषताएँ :-

🔹 भारत में वृद्धजनों को जनसंख्या की विशिष्ट विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-


देश में वृद्धजनों की कुल जनसंख्या का लगभग 80 प्रतिशत भाग ग्रामीण क्षेत्रों में रहता हैं , जिससे सेवाओं का वितरण और आया नौतीपूर्ण हो जाता है ।


वृद्ध जनसंख्या में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक है ।


80 वर्ष से अधिक आयु के अति वृद्ध व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि हो रही है ।


वरिष्ठ नागरिकों की कुल जनसंख्या का लगभग 30 प्रतिशत भाग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहा है ।


वृद्धजनों को निम्न कारणों सरोकार से संवेदनशील समूह की श्रेणी में रखा जाता हैं ।


आयु बढ़ने के अनुरूप वृद्धजन कम शारीरिक शक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी के कारण रोगों के प्रति अधिक संवेदना आयु बढ़ने के कारण विभिन्न प्रकार की बीमारियों के अतिरिक्त कई प्रकार की अक्षमताएँ भी होने लगती है ।

Class 12 Home Science Chapter 9 विशेष शिक्षा और सहायक सेवाएँ Special Education and Support Services Notes In Hindi


 

Class 12 Home Science Chapter 9 विशेष शिक्षा और सहायक सेवाएँ Special Education and Support Services Notes In Hindi


📚 अध्याय = 9 📚

💠 विशेष शिक्षा और सहायक सेवाएँ 💠

❇️ विशेष शिक्षा :-

🔹 विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए , शक्षिक प्रावधानों से है अर्थात् उन बच्चों के लिए जिनमें एक या एक से अधिक अपंगताएँ होती हैं और जिनकी भिन्न आवश्यकताएँ होती हैं । ये विशेष शक्षिक आवश्यकताएँ ( एस . ई . एन ) कहलाती हैं ।

🔹 इस प्रकार विशेष शिक्षा का अर्थ सभी व्यवस्थाओं जैसे – कक्षा , घर , सड़क और जहाँ कहीं भी बच्चे जा सकते हैं , वहाँ ऐसे बच्चों के लिए विशेष रूप से रचित निर्देशों से है ।

❇️ विशेष शिक्षक :-

🔹 जो शिक्षक / अध्यापक विशेष शिक्षा प्रदान करते हैं , वे विशेष शिक्षक कहलाते हैं । जो व्यक्ति विशेष शिक्षक बनने का निर्णय करता है , उसकी जीविका विशेष शिक्षा में जीविका ‘ मानी जाती है ।

❇️ भूमिका :-

🔹 कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हें चलने खेलने बोलने , देखने और सुनने में , समाज में लोगों से बातचीत करने अथवा किसी ऐसे कार्य को करने में अस्वाभाविक रूप से कठिनाई होती है जिन कार्यों को करना आप सामान् मानते हैं ।

🔹 इष्तम रूप से संसार का अनुभव करने के लिए उन्हें अधिक प्रयास करना पड़ता है और इनके आस – पास के लोगों को उनके इस प्रयास में उन्हें सक्षम बनाना होता है । 

🔹 विशेष शिक्षा विधियां विकलांग बच्चों को उतना ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती हैं जितना वे अपनी पूरी क्षमता हासिल करते हैं । अधिकांश बच्चे सामान कक्षाओं में आसानी से पढ़ सकते हैं तथापि , कुछ बच्चे जिन्हें अपनी अपंगता के स्वरूप के कारण गंभीर कठिनाइयाँ हैं सिर्फ़ उन्हीं के लिए बनाई गयी कक्षाओं में पढ़ें तो उन्हें लाभ होता ।

❇️ बच्चों की विशेष शिक्षा आवश्यकताएँ ( एस . ई . एन . ) :-


विशेष शिक्षा की कुछ कार्यविधियों द्वारा पूरी की जाती हैं । 


अपंग विद्यार्थियों के लिए पृथक अथवा विशिष्ट शिक्षा नहीं है । 


ऐसा उपागम है जो सीखना सुगम बनाता है ।


विभिन्न क्रियाकलापों में उनकी भागीदारी को संभव बनाता है । 


जिनमें वे अपनी अक्षमता के कारण भाग नहीं ले पाते थे ।


❇️ विद्यालयतंत्र अपंग बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त न होने के प्राथमिक कारण :-


सामान् शिक्षा के शिक्षकों को विशेष विधियों से दिशानिर्देशित नहीं किया जाता ।


समावेशी कक्षा में , सभी शिक्षकों को विशेष शिक्षा आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए । उदाहरण : यदि बच्चे में बौद्धिक अक्षमता हो , तो शिक्षक को पाठ रोचक बनाना , छोटी इकाइयों में बाँटाना और बच्चे धीमी गति पढ़ाना हो । 


सभी शिक्षक तो कुछ कौशल अर्जित कर सकते हैं लेकिन विशेष शिक्षक इन विधियों में विशिष्ट प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं ।


❇️ विशेष विद्यालय / कार्यक्रम :-

🔹 केवल विशिष्ट अपंग बच्चों को शिक्षा प्रदान करते है , जैसे- बौद्धिक दोष , प्रमस्तिष्क घात ( सेरीब्रलपाल्सी ) अथवा दृष्टिदोष वाले बच्चों विशेष शिक्षकों की की आवश्यकता उन विशिष् अपंगताओं वाले बच्चों के लिए कार्य करने में प्रशिक्षित हों ।

❇️ समावेशी शिक्षा विद्यालय कार्यक्रम :-

🔹 परिसर में ही विशेष शिक्षा आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए भी कार्यक्रम चलाया जाता है । सभी बच्चे एक साथ सीखते हैं भले ही वे प्रत्येक से भिन्न हो ।

❇️ एकीकृत विद्यालय / कार्यक्रम :-


विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थी नियमित कक्षाओं में पढ़ते हैं । 


विशेष शिक्षक नियमित शिक्षकों के साथ काम समन्वय करते हैं । 


स्कूल प्रणाली कठोर है , बहुत कम बच्चे सामना कर पाते हैं । 


विद्यालय के संसाधन कक्ष में विद्यार्थिय को अतिरिक्त शिक्षा सहायता प्रदान करते हैं ।


❇️ समावेशी शिक्षा :-

🔶 परिभाषा :- जब विशेष शिक्षा आवश्यकता वाले बच्चे / विद्यार्थी सामान् कक्षाओं में अपने साथियों के साथ पढ़ते हैं तो यह व्यवस्था ” समावेशी शिक्षा ” कहलाती है । 

🔶 दर्शन :- इस उपागम को निर्देशित करने वाला दर्शन यह है कि विविध आवश्यकताओं ( शक्षिक , शारीरिक , सामाजिक और भावनात्मक ) वाले विद्यार्थियों को एक साथ ऐसी आयु उपयक्त कक्षाओं / समहों में रखा जाए , जिससे बच्चे अपनी अधिगम क्षमताओं को इष्तम रूप से प्राप्त कर सकें । 

🔶 सिद्धांत :- वे जिस विद्यालय अथवा कार्यक्रम के भाग होते हैं , अपनी पाठ्यचर्या शिक्षण विधियों और भौतिक संरचना में उपयुक् समायोजन और रूपांतरण करते हैं जिससे उनकी शिक्षा सुगम हो सके । 

🔶 विशेष शिक्षक की भूमिका :- ऐसी व्यवस्था में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को ही नहीं पढ़ाते हैं , बल्कि सामान कक्षा के शिक्षकों को भी शिक्षा संबंधी ( निर्देशात्मक ) सहायता प्रदान करते हैं । 

🔶 लाभ :- सभी छात्रों को लाभ देता है , सभी के लिए एक शिक्षा है । 

🔶 लागत :- परिसर के भीतर , आवश्यकतावाले बच्चों के लिए सुविधा है । इसलिए यह महंगा है । 

🔶 लचीलापन :- यह बहुत लचीला है ।

❇️ सहायता सेवाएँ :-

🔹 विशेष और समावेशी शिक्षा के प्रभावी होने के लिए सहायता सेवाएँ भी उपलब्ध होनी चाहिए । ये विद्यालय के अंदर अथवा समुदाय में स्थित हो सकती हैं  


विशेष शिक्षा की आवश्यकता वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए संसाधन सामग्री ।


विद्यार्थियों के लिए परिवहन सेवा ।


वाक् चिकित्सा ।


शारीरिक और व्यावसायिक चिकित्सा ।


बच्चों , माता – पिता और शिक्षकों के लिए परामर्श सेवा ।


चिकित्सा सेवाएँ ।


नोट :- ( 2 ) से ( 6 ) में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए मानव पारिस्थिति की और परिवार विज्ञान , के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में उच् शैक्षिक योग्ताएँ एवं प्रशिक्षण ।


❇️ अपंगता :-

🔹 विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्लू . एच . ओ . ) के अनुसार “ अपंगता ” , एक समावेशी शब्द है जिसमें दोष , सीमित् क्रियाकलाप और भागीदारी में कठिनाई शामिल हैं । कुछ बच्चे शारीरिक , संवेदी अथवा मानसिक दोषों के साथ जन्म लेते हैं , कछ दोष विकसित हो जाते हैं जो उनके दैनिक कार्यों को करने की उनकी कम कर देते हैं । शैक्षिक संदर्भ में इन्हें , ” अपंग ” , बच्चे कहते हैं । 

❇️ अपंगताओं का वर्गीकरण :-


बौद्धिक क्षति ( सीमित बौद्धिक कार्य और अनुकूलनात्मक कौशल ) , 


दृष्टि दोष ( इसमें कम दृष्टि और पूर्ण अंधता शामिल हैं ) , 


श्रवण दोष ( इसमें आंशिक श्रवण हानि और बहरापन शामिल हैं ) , 


प्रमस्तिष्कघात ( सेरीब्रलपाल्सी ) मस्तिष्क की के कारण चलने – फिरने , उठने बैठने , बोलने और हाथ से काम करने में कठिनाई , 


स्वलीनता , ( ऐसी अपंगता जो संप्रेषण / बोलचाल सामाजिक अंतःक्रिया मेलजोल और खेल व्यवहार को प्रभावित करती है ) , 


चलने फिरने संबंधी अपंगता ( हड्डियों , जोड़ों और पेशियों में क्षति के कारण चलने – फिरने में कठिनाई ) , 


अधिगम अक्षमता ( पढ़ने , लिखने और गणित में कठिनाइयाँ )


❇️ अपंगताओं के कारण :-

🔹 क्षतियों के कारणों पर विस्तृत चर्चा इस अध्याय के दायरे से बाहर है । संक्षिप्त रूप से बाहर है । संक्षिप्त रूप से इन कारणों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है 


जन्म से पहले प्रभावित करने वाले आनुवांशिक और गैर – आनुवांशिक दोनों कारक।


ऐसे कारक जो बच्चे को जन्म के समय और उसके तत्काल बाद प्रभावित करते हैं ।


ऐसे कारक जो विकास की अवधि के दौरान बच्चे पर असर करते हैं । 


❇️ विशेष शिक्षा विधियाँ :-

🔹 विशेष शिक्षा की कुछ विशिष्ट विधियाँ और प्रक्रियाएँ होती हैं जो विशेष शिक्षक के लिए विशेष शिक्षा की आवश्यकता वाले बच्चों को क्रमबद्ध तरीके से पढ़ना/सिखाती हैं । 


पहले , विद्यार्थी के स्तर का विकास और अधिगम के विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यांकन किया जाता है । उदाहरण के लिए संज्ञानात्मक विकास , ( उदाहरण – गणित की अवधारणाएँ ) भाषा विकास अथवा सामाजिक कौशल के क्षेत्रों में विकास । 


मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक विद्यार्थी के लिए एक शिक्षा कार्यक्रम ( आई . ई . पी . ) विकसित किया जाता है जिसका उपयोग विद्यार्थी के व्यवहार करने में मार्गदर्शन के लिए किया जाता है ।


आई . ई . पी का नियमित मूल्यांकन किया जाता है जिससे यह निर्धारण किया जा सके कि अधिगम और विकास के लक्ष्य पूरे हुए हैं या नहीं और विद्यार्थी ने कितनी प्रगति की है । 


पूरे क्रम में सहायक सेवाओं ( जैसे – वाचिकित्सा उपचार परामर्श सेवा ) तक पहुँच और उनका प्रयोग सुगम बनाया जाता है जिससे विशेष शिक्षा के विद्यार्थी पर वांछित प्रभाव पड़ सके । 


❇️ ज्ञान और कौशल :-

🔶 संवेदनशीलता विकसित करना :- यदि किसी अधिक वज़न वाले व्यक्ति को दूसरों द्वारा सैदव मोटा कहकर बुलाया जाए तो यह कथन असंवेदनशीलता की श्रेणी में आता है , क्योंकि इससे उस व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचती है । यह उसे अनुचित तरीके से बुलाना है । विशेष शिक्षकों से अपंग बच्चों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने की उम्मीद की जाती है । वे ऐसे शब्दों और भाषा का प्रयोग करके यह काम कर सकते हैं जैसे सबसे पहले बच्चों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करें और उनके साथ इस धारणा के साथ काम करें कि वे बच्चे भी अन्य सभी बच्चों की भाँति सीख सकते हैं और विकास कर सकते हैं । उनमें तथा उनके अभिभावकों में उम्मीद जगा सकें । अपंग बच्चे के प्रति असम्मान अथवा महज़ दया और सहानुभूति का भाव , उनके प्रति असंवेदनशीलता और सम्मान की कमी को दर्शाते हैं ।

🔶 विकलांगता के बारे में जानकारी :- चूँकि विशेष शिक्षक , विशेष शिक्षा आवश्यकता वाले बच्चों के साथ काम पर ध्यान देते हैं , अत : उन्हें विभिन्न प्रकार की अपंगताओं की प्रकृति , इन अपंगताओं वाले बच्चों की विकासात्मक विशेषताओं और उससे संबंधित ऐसी कठिनाइयों अथवा विसंगतियों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए , जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है । 

🔶 शिक्षण कौशल :- विशेष शिक्षक के लिए विद्यार्थियों को पढ़ाने की कला और विज्ञान को जानने की आवश्यकता होती है , जिसे शिक्षा शास्त्र कहते हैं । इसका अर्थ है किसी विशेष विषय ।

🔶 अंतर वैयक्तिक कौशल :- जो व्यक्ति बातचीत करने में अच्छे होते हैं , वे विशेष शिक्षक के रूप में प्रभावी हो सकते हैं । तथापि , प्रशिक्षण से आप संप्रेषण / बातचीत के कौशल विकसित कर सकते हैं , क्योंकि इनकी बच्चों के साथ व्यक्तिगत रूप से अथवा समूह में काम करने के लिए आवश्यकता होती है । अकसर बच्चों के माता – पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को मार्गदर्शन और परामर्श सेवा की आवश्यकता होती है , जिसके लिए अंतर वैयक्तिक कौशल काफ़ी उपयोगी होते हैं ।

❇️ विशेष शिक्षा में जीविका के लिए तैयार करना :-


इग्नू ‘ समावेशन समर्थित प्रारंभिक बाल्यावस्था विशेष शिक्षा ‘ सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम , न्यूनतम शैक्षिक योग्यता कक्षा X पास ।


अपंगता अध्यनों में स्नातकोत्तर डिग्री ।


बाल विकास , मानव विकास , मनोविज्ञान अथवा सामाजिक कार्य जैसे क्षेत्रों में स्नातकोत्तर डिग्री आर सी . आई . द्वारा मान्यता प्राप्त किसी सर्टिफिकेट , डिप्लोमा अथवा डिग्री पाठ्यक्रम ।


किसी भी क्षेत्र में स्नातक डिग्री लेने के बाद विशेष शिक्षा में स्नातक डिग्री अभ्यार्थी को विशेष समावेशी विद्यालय में शिक्षक ।


गृह – विज्ञान संकायों के अंतर्गत बाल्यावस्था अपंगता से संबंधित पाठ्यक्रम करते हैं ।


❇️ कार्यक्षेत्र :-


‘ पी . डब्ल्यू . डी अधिनियम 1995 ( एस . एस . ए . ) में निःशक्त बच्चों समेत सभी के लिए आठ वर्ष की शिक्षा का प्रावधान है । प्रशिक्षण भारतीय पुर्नवास परिषद् ( आर . सी . आई . ) द्वारा नियंत्रित होता है ।


निजी उद्यम चलाने मार्गदर्शन , परामर्श सेवा


विशेष शिक्षकों और प्रशिक्षकगैर सरकारी संगठन , सर्व शिक्षा अभियान ( एस . एस . ए )


विशेष विद्यालयों में विशेष शिक्षा कार्यक्रमों के अध्यक्ष / प्रबंधक


शिक्षण , अनुसंधान , कार्यक्रमों की योजना बनाने और अपना निजी संगठन स्थापित


प्रारंभिक बाल्यावस्था विशेष शिक्षक कक्षा X के बाद

Class 12 Home Science Chapter 8 मार्गदर्शन और परामर्श Guidance and Counselling Notes In Hindi



 Class 12 Home Science Chapter 8 मार्गदर्शन और परामर्श Guidance and Counselling Notes In Hindi


📚 अध्याय = 8 📚

💠 मार्गदर्शन और परामर्श 💠

❇️ मार्गदर्शन :-

🔹 मार्गदर्शन या निर्देशन शब्द का अर्थ सहायता करने से ले जाता है शिक्षा के क्षेत्र में इस अवधारणा का महत्वपूर्ण स्थान है बाल पोषण की परिभाषा मानव क्रियाओं में शैक्षिक , व्यवसायिक , मनोरंजन संबंधी , तैयार करने , प्रवेश करने और प्रगति करने में व्यक्ति की सहायता करने की प्रक्रिया के रूप में की जा सकती है विभिन्न मनोविज्ञान ने मार्गदर्शन की विभिन्न परिभाषा दी हैं मार्गदर्शन को व्यक्ति को उसके जीवन के लिए तैयार करने और समाज में उसके स्थान के लिए तालमेल करने में या सहायता देने के रूप में परिभाषित किया जाता है ।

❇️ केफेयर के अनुसार मार्गदर्शन :-

🔹 मार्गदर्शन वह स्थिति है जहां से व्यक्ति शैक्षणिक तथा व्यवसाय उपलब्धियों के लिए विभाजीत होते हैं ।

❇️ माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952 के अनुसार मार्गदर्शन :-

🔹 लड़कों तथा लड़कियों को सहायता प्रदान करने की एक ऐसी कला है जो उन्हें अपने और उस संसार , जहां उन्हें रचना और काम करना है , से संबंधित तत्व के पूर्ण प्रकाश में अपने भविष्य के लिए बुद्धिता पूर्वक योजना बनाने की योग्यता प्रदान करती है ।

❇️ परामर्श :-

🔹 परामर्श परस्पर बातचीत ( अंत : क्रिया ) द्वारा सीखने की प्रक्रिया है जिसमें परामर्शदाता ( कभी – कभी जिसे चिकित्सक भी कहते हैं ) परामर्श लेने वालों को ( चाहे वह व्यक्ति , परिवार , समूह अथवा संस्थान हो ) कठिनाइयों का कारण समझने और मुद्दों को सुलझाकर निर्णय पर पहुँचने में उनकी सहायता करते हैं । परामर्श में समग्र सोच होती है जो सामाजिक , सांस्कृतिक , आर्थिक और भावनात्मक मुद्दों को संबोधित करती है ।

❇️ मार्गदर्शन और परामर्श विशेषज्ञों के लिए कुछ नीति -परक सिद्धांतों :-

🔹 व्यक्ति और उसकी सांस्कृतिक भिन्नताओं तथा मानव अनुभवों की विविधताओं के प्रति सम्मान और सावधानी से काम करें ।

🔹 कभी भी कोई ऐसा कदम न उठाये जिससे परामर्श लेने वाले को किसी तरह का कोई नुकसान हो ।

🔹 परामर्श लेने वाले व्यक्ति द्वारा परामर्शदाता पर किए गए भरोसे का सम्मान करें और उसके मुद्दो के बारे में दूसरों से बातें न करें ।

🔹 परामर्श लेने वाले व्यक्ति को आत्मज्ञान ( बोध ) बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें ।

🔹 संकट की स्थितियों से प्रभावी रूप से निपटने के लिए परामर्श लेने वाले व्यक्ति के विकल्पों को तलाशने और उनमें वृद्धि करने में सहायता करें ।

🔹 उनकी क्षमता के दायरे में उनसे व्यवहार करें और ऐसे मामलों में जिनमें अधिक गहन उपचार की आवश्यकता हो , परामर्श के लिए ऐसे विशेषज्ञों के प्रशिक्षित हों । 

🔹 कठिन परिस्थितियों से घिरे व्यक्तियों के लिए उपलब्ध सभी सेवाओं का जानकार होना चाहिए जिससे आगे संदर्भ के लिए यदि आवश्यक हो तो उचित मार्गदर्शन किया जा सके ।

❇️ परामर्श सेवा के स्तर :- 

🔹 दैनिक जीवन में आपने देखा होगा कि परामर्श सेवा शब्द का उपयोग अनौपचारिक रूप से किसी भी प्रकार की जानकारी चाहने वाली बातचीत के लिए किया जाता है , जिसमें रोज़गार के लिए किसी व्यक्ति का मूल्यांकन भी शामिल है । 

❇️ परामर्श सेवा के विभिन्न स्तर :-


अनौपचारिक परामर्श सेवा


गैर विशेषज्ञ परामर्श सेवा


व्यावसायिक परामर्श सेवा 


❇️ अनौपचारिक परामर्श सेवा :-

🔹 यह परामर्श सामान्यत : ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया जाता है जिससे मिलकर बात की जा सकती है और जो बातों को समझ सकता है , भले ही वह व्यावसायिक रूप से योग्यता प्राप्त न हो । सहानुभूति रखने वाला यह व्यक्ति चाचा / मामा , चाची / मामी , मित्र अथवा सहकर्मी हो सकता है ।

❇️ गैर – विशेषज्ञ परामर्श सेवा :-

🔹 यह अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों जैसे – शिक्षकों , डॉक्टरों , वकीलों , धर्मगुरुओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सहायता है जो अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान भी करना चाहते हैं । वे लोगों की इन समस्याओं से निपटने के लिए वैकल्पिक तरीके प्रदान करने का प्रयास करते हैं जिनका सामना उन्हें अपने दैनिक कार्यों के दौरान करना पड़ता है । 

❇️ व्यावसायिक परामर्श सेवा :-

🔹 व्यावसायिक परामर्शदाता वे होते हैं जिन्होंने परामर्श में विशेष प्रशिक्षण लिया हो और जिनके पास आवश्यक योग्यता हो । ये परामर्शदाता व्यक्ति की सामाजिक , भावनात्मक और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान करते हैं । परामर्श की प्रक्रिया में व्यावसायिक परामर्शदाता विभिन्न तकनीकों का प्रयोग कर सकते हैं । 

❇️ परामर्शदाता की विशेषताएँ :-


मानवीय समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता


समानुभूति 


व्यक्तिगत भिन्नताओं के लिए सम्मान 


निर्णयात्मक न होना 


गोपनीयता बनाए रखना


आसानी से संपर्क करने योग्य 


दृढ़ लेकिन मित्रवत् 


रुचिकर व्यक्तित्व 


मूल्यों और संबंधों को समझने वाला


❇️ जीविका के अवसर :-

🔶 जीविका परामर्शदाता :- कुछ परामर्शदाता व्यावसायिक और जीविका संबंधी परामर्श के लिए सभी आयुवर्ग के लोगों के साथ काम करते हैं । 

🔶 विद्यालय परामर्शदाता :- विद्यालय में भी बच्चों को सामंजस्य संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं । बच्चे को शैक्षिक उपलब्धि , साथियों अथवा माता – पिता से कोई समस्या हो सकती है । जो परामर्शदाता ऐसी कठिनाइयों को दूर करते हैं , विद्यालयी परामर्शदाता कहलाते हैं ।

🔶 परिवार परामर्शदाता :- यह ऐसे विशेषज्ञ होते हैं जो माता – पिता , बच्चों तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ काम करते हैं । यह उन विशिष्ट मुद्दों का समाधान करते हैं जो परिवार के सदस्यों अथवा पीढ़ियों के बीच विवादों के कारण होते हैं । ये परिवार के किसी सदस्य की व्यवहारगत समस्याओं का भी समाधान करते हैं । 

🔶 वैवाहिक परामर्शदाता :- ये विवाह संबंधी विभिन्न मुद्दों या समस्याओं , वैवाहिक और विवाहपूर्व मुद्दों के लिए परामर्श अथवा निकट संबंधों के लिए व्यक्तिगत संगतता / अनुरूपता तथा दंपतियों के लिए परामर्श का काम करते हैं । 

🔶 जीवनकौशल प्रशिक्षक :- आज – कल अनेक व्यक्तियों को अपने दैनिक जीवन में घर अथवा कार्यस्थल पर तनाव के कारण परामर्श की आवश्यकता हो सकती है । उदाहरण के लिए एक सुस्थापित युवक / युवती अपनी क्षमताओं को इष्टतम स्तर तक लाने के लिए अधिक सक्रिय होना चाह सकता है । 

🔶 बच्चों के मार्गदर्शन के परामर्शदाता :- कुछ परामर्शदाता बच्चों के साथ कार्य करते हैं और बच्चों के मार्गदर्शन के परामर्शदाता कहलाते ।

❇️ विद्यार्थियों द्वारा बताई गयीं प्रमुख समस्याएँ :-


अपेक्षाओं और निष्पादन के बीच अंतराल ।


जीविका और व्यावसायों के बारे में जानकारी का अभाव ।


भविष्य के बारे में चिंता ।


एकाग्रता का अभाव ।


विपरीत जेंडर के सदस्यों से मित्रता करने अथवा उनके साथ व्यवहार करने में असमर्थता ।


यौन व्यवहारों के बारे में जानकारी का अभाव ।


अपनी शक्तियों और कमियों के बारे में जानकारी न होना ।


अपनी रुचियों और क्षमताओं के बारे में जानकारी न होना ।


संसाधनों का अभाव ।


अधिगम की प्रभावी कार्यनीतियों के बारे में जानकारी का अभाव ।


पिछली गलतियों के लिए स्वयं को माफ़ न कर पाने की असमर्थता ।


🔹 ये सभी जानकारियाँ मार्गदर्शन और परामर्श के क्षेत्र में व्यावसायिकों की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं ।

Class 12 Home Science Chapter 7 प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा Early Childhood Care and Education Notes In Hindi



 Class 12 Home Science Chapter 7 प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा Early Childhood Care and Education Notes In Hindi


📚 अध्याय = 7 📚

💠 प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा 💠

❇️ प्रारम्भिक बाल्यावस्था :-

🔹 जन्म से लेकर 8 वर्ष तक की अवधि को ” प्रारंभिक बाल्यावस्था ” कहते हैं इस अवस्था में मस्तिष्क के विकास के साथ साथ शारीरिक वृद्धि भी तेजी से होती है । 

🔹 इस अवस्था में बच्चे पर्यावरण और अपने आसपास के लोगों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं यह अवस्था दो भागों में विभाजित है ।

❇️ प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा की मूलभूत संकल्पनाएँ :-

🔹 प्रारम्भिक बाल्यावस्था , जीवन की जन्म से लेकर आठ वर्ष तक की आयु की अवस्था है , जिसे दो भागों मे जन्म से 3 वर्ष तक तथा 3 से 8 तक विभाजित किया गया है । 

🔹 शैशवावस्था जन्म से लेकर एक वर्ष / दो वर्ष की आयु तक की अवधि है । जिसमे बच्चा अपनी सब जरूरतों के लिए व्यस्कों पर निर्भर करता है । 

🔹 दिवस देखभाल केंद्र ( डे केयर ) ओर शिशु केंद्र सामान्यत पूरे दिन के कार्यक्रम होते है । इन कार्यक्रमों में शिक्षक और सहायकों को बहुत छोटे बच्चे की देखभाल , उनकी सुरक्षा , उनके खाने – पीने , शोचलयों आदतों , भाषा विकास , सामाजिक जरूरत समझने और सिखाने के लिए प्रीशिक्षित होना चाहिए ।

🔹 दो से तीन वर्ष के बच्चों को कभी – कभी ” टोड्लर ” कहा जाता है । इस शब्द को बच्चों के फुदक कर चलने के रूप मे समझा जाता है । 

🔹 विद्यालय पूर्व बच्चा नाम इसलिए दिया गया है , क्योंकि वह बच्चा अब किसी ऐसे परिवेश में रहने के लिए तैयार होता है जो परिवार से बाहर का होता है । छोटे बच्चे के लिए कुछ विद्यालय अक्सर मॉटेसरी स्कूल कहलाते है ।

🔹 मौंटेसरी स्कूल ऐसे विद्यालय है जो प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा के उन सिद्धांतों पर आधारित है जो शिक्षाविद मारिया मोंटेसरी द्वारा बनाई गई । 

🔹 विकास मनोवैज्ञानिक पियाजे ने अपना जीवन यह समझने और समझाने में गुज़ार दिया कि छोटे बच्चे के दुनिया को समझने के तरीके भिन्न होते है ।

❇️ उद्देशय :-


प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के मौलिक सिद्धांत  ।


बच्चों की आरंभिक देखभाल ।


बच्चे कैसे खेलते और सीखते है ।


जीविका के लिए आवश्यक जानकारी और कौशलों को समझना ।


❇️ प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का महत्व :-

🔹 नन्हें शिशु बहुत छोटी उम्र से ही सीखना शुरू कर देते है । छोटे बच्चे को अपने परिवार के सदस्यों से लगाव होने लगता है ।

🔹 अपने परिवार के सदस्यों और नियमित मिलने वाले लोगों को पहचानने लगता है । बच्चा परिचित और अपरिचित के बीच अंतर करने लगता है ।

🔹 8-12 माह का बच्चा अपरिचित लोगों के प्रति भय को दर्शाता है । बच्चा अपनी माँ से अत्यधिक लगाव रखता है । 

🔹 एक वर्ष तक बच्चा माँ या देखभाल करने वाले से चिपका रहता है । 

🔹 जल्दी ही यह व्यवहार छूट जाता है और यह समझ विकसित हो जाती है कि माँ दूसरे कमरे मे जाने पर लुप्त नहीं होगी और उसकी अनुपस्थिति में भी सुरक्षा का बोध विकसित हो जाता है ।

❇️ ई.सी. सी . ई . के मार्गदर्शी सिद्धांत :-


सीखने का आधार खेल हो ।


शिक्षा का आधार कला हो ।


बच्चों की विशिष्ट सोच – विशेषताओ को मान्यता देना ।


विशेषज्ञता की बजाय अनुभव को प्रमखुता ।


दैनिक नित्यचर्या में अच्छी जानकारी और चुनौतियों का अनुभव ।


औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार की परस्पर बातचीत ।


पाठविषयक और सांस्कृतिक स्रोतों का मेल ।


स्थानीय सामग्रियों , कला और ज्ञान का उपयोग ।


विकासात्मक रूप से उपयुक्त तरीके , लचीलापन तथा अनेकता ।


स्वास्थ्य , कल्याण और स्वस्थ आदतें ।


❇️ ECCE के अध्ययन का महत्व :-


यह वह समय है जब बच्चा अपने आस पास के पर्यावरण को जानना शुरु करता है , नई चीजे सीखता है और अपने आस – पास के संसार को खोजना चाहता है ।


बच्चों के समग्र विकास को जानना जैसे सामाजिक , भावनात्मक , संज्ञानात्मक , शारीरिक आवश्यकता ।


प्राथमिक स्कूल में प्रवेश से पहले ECCE बच्चों को विभिन्न क्रियाओं के द्वारा सीखने के लिए अनुभव कराता है ताकि उनहे प्राथमिक स्कूल में बैठना और सीखना आ जाए ।


बच्चे की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए उनेह सही माहोल दिआ जाए बिना किसी बोझ के ।


बच्चे साथियों के साथ बहुत जल्दी सीखते हैं , इसलिए इस वजह से व अन्य कारणों से इस उम्र के बच्चों के लिए स्कूली पूर्व शिक्षा का अनुभव जरुरी हो जाता है ।


❇️ विधालय पूर्व ( Preschool education ) :-

🔹 विधालय पूर्व ( Preschool education ) एक ऐसा कार्यक्रम है जो बाल केन्द्रित ( child centered ) और अनोपचारिक ( informal ) होता है तथा बच्चे को सीखने का अनूकूल परिवेश ( environment ) प्रदान करता है , जो घर मे सीखने के अच्छे परिवेश के लाभों का पूरक होता है । 

🔹 ऐसी स्थितियों में जहाँ घर के परिवेश मे कोई कमी हो , वहाँ विद्यालय पूर्व केंद्र बच्चे की घर के बाहर वृद्धि और विकास में सहायता करने में मुख्य भूमिका निभाते है । प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा और देखभाल एक ऐसी गतिविधि है जो विभिन्न स्थितियों में बाल्यावस्था को लाभ पहुंचाने के साथ इन मूलभूत कामों में माता – पिता और समाज की सहायता करके परिवारों का लाभ पहुंचाती है ।

❇️ विधालय पूर्व के मूल उद्देशय :-

🔹  इसके मूल उद्देशय निम्न है ;


बच्चे का समग्र विकास जिससे वह अपनी क्षमता पहचान सके ।


विद्यालय की तैयारी ।


महिलायों और बच्चों के लिए सहायक सेवाएँ प्रदान करना ।


❇️ जीविका के लिए तैयारी :-

🔹 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की दुनिया और संबंधों को समझने के विशिष्ट तरीके होते है , उनकी विकासात्मक जरूरतें भिन्न होती है । अतः बच्चों के लिए काम करने वाले वयस्क का प्रारम्भिक बाल विकास और देखभाल के क्षेत्र मे सुशिक्षित होना आवश्यक है । 

🔹 शिक्षक और देखभाल करने वाले पर उन बच्चों की देखभाल का दायित्व जो उनकी संतान नहीं होते है । साथ ही शिक्षक जिस संस्थान में काम करते है उसकी और समाज की ज़िम्मेदारी उन पर होती है । 

🔹प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा व्यावसायिक को बच्चों , उनके कल्याण , जरूरतों ओर चुनोतियों की जानकारी और ज्ञान होना चाहिए जिससे वे उनकी वृद्धि और विकास के अवसर प्रदान कर सकें । 

🔹 विधालय पूर्व बच्चों की शारीरिक देखभाल जैसे – सफाई , खान – पान , शोच आदि की निगरानी करने की कम आवश्यकता होती है , क्योंकि बच्चा बोलने , मल और मूत्र विसर्जन और स्वयं के खाने – पीने की क्षमता विकसित कर लेता है ।

🔹 शिक्षक को बच्चों को नयी चीजों को सीखने , प्रकृतिक घटनायों का अनुभव करने और अनेक प्रकार के अनुभवों के दिलचस्प अवसर प्रदान करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए । इस समय उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति और खोज बीन करने की प्रवृति को बढ़ावा दिया जाता है ।

❇️ कुछ कौशल जो प्रारम्भिक बाल्यावस्था के व्यवसायी मे होने चाहिए , वे इस प्रकार है :-


बच्चों और उनके विकास मे रुचि ।


छोटे बच्चों की आवश्यकताओं और क्षमताओं के बारे में जानकारी ।


बच्चों से बातचीत करने की क्षमता और प्रेरणा ।


रचनात्मक और रोचक गतिविधियों के लिए कोशल ।


कहानी सुनाने , खोज बीन करने जैसे कार्यों के लिए उत्साह ।


बच्चों की शंकाओ के उत्तर देने की इच्छा और रुचि ।


लंबे समय तक शारीरिक गतिविधियों और सक्रियता के लिए तत्पर रहना ।


❇️ कार्यक्षेत्र :-


सरकारी और गैरसरकारी बच्चों के लिए अभियान मे ।


उधमी के रूप में अपना बाल देखभाल केंद्र ।


नर्सरी स्कूल के शिक्षक ।


शिशुकेन्द्र मे देखभालकर्ता ।


दिवस देखभाल केंद्र ।


समेकित बाल विकास सेवाएँ ।

Class 12 Home Science Chapter 6 खाद्य गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा Food Quality and Food Safety Notes In Hindi


 

Class 12 Home Science Chapter 6 खाद्य गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा Food Quality and Food Safety Notes In Hindi


📚 अध्याय = 6 📚

💠 खाद्य गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा 💠

❇️ खाद्य गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा को पढ़ने की आवश्यकता क्यों?

🔹 वर्ष 2005 में दस्त जैसे रोगों से 18 लाख लोगों की मृत्यु हुई । भारत में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने सितंबर 2010 में बताया कि 5 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों में प्रतिवर्ष गंभीर दस्त के 30 करोड़ से अधिक मामले सामने आए है । 

🔹 इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि खाद्य सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है साथ ही खाद्य पदार्थों के अच्छी गुणवत्ता के होने की बहुत आवश्यकता है खाद्य पदार्थों से होने वाले रोग ना केवल मृत्यु के लिए उत्तरदाई हैं बल्कि इनसे व्यापार और पर्यटन को भी क्षति पहुंचती है इस कारण धनार्जन में हानि , बेरोजगारी और मुकदमेबाजी बढ़ती है । आर्थिक विकास में रुकावट आती है और इन कारणों से पूरे विश्व में खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता के महत्व में वृद्धि हुई है ।

❇️ बड़े पैमाने पर खाद्य उत्पादन और संसाधन के कारक :-


उपभोक्ता की बेहतर क्रय क्षमता


प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि


उपभोक्ता की बढ़ती मांग


प्रौद्योगिकी और संसाधन में प्रगति


❇️ खाद्य सुरक्षा का महत्व :-


संसाधित खाद्य पदार्थों का बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं बढ़ता हुआ बाजार ।


जीवनशैली और खानपान की आदतों के तेजी से बदलने के कारण ।


घर से बाहर खाना खाने की बढ़ती हुई आदते ।


अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने के लिए प्रभावी खाद्य मानकों व नियंत्रण कारी प्रणालियों की आवश्यकता ।


मसालों और तिलहन एवं वर्धक मिश्रण की बढ़ती हुई मांग ।


वायुमंडल मृदा और जल के प्रदूषण कीटनाशकों के उपयोग से कृषि उत्पाद में इनका संदूषण ।


अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए आवश्यक समझौतों की स्वीकार्यता ।


अधिक दूरी का परिवहन एवं अधिक समय का भंडारण ।


खाद्य जनित सूक्ष्म जैविक रोगों के मामलों में वृद्धि ।


✴️ खाद्य सुरक्षा एवं गुणवत्ता से जुड़ी मूलभूत संकल्पनाऐं ✴️

❇️ खाद्य सुरक्षा :- 

🔹 खाद्य सुरक्षा का अर्थ यह सुनिश्चित करना है । कि यह खाद्य पदार्थ उपभोक्ता के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं है ।

❇️ आविषालुता / आविषता :-

🔹 इस का अर्थ है कोई पदार्थ किस सीमा तक किसी जीव को हानि पहुंचा सकता है इसकी मात्रा को आविषता या आविषालुता कहते हैं । यह खतरा तब पैदा हो सकता है जब उस खाद्य पदार्थ को बताए गए तरीके और मात्रा में प्रयोग ना किया जाए । यह संकट भौतिक रसायनिक अथवा जैविक हो सकता है ।

❇️ खाद्य पदार्थों से संबंधित भौतिक संकट :-

🔹 कोई भी ऐसा पदार्थ जो सामान्यत उस खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता और भौतिक प्रकृति का होता है । खाद्य पदार्थ के साथ गृहण करने से रोग उत्पन्न कर सकता है या आघात पहुंचा सकता है जैसे कि लकड़ी , पत्थर , कीट के अंश , बाल , जुट , सिगरेट के टुकड़े , कील , बटन , पँख , आभूषण आदि ।

❇️ खाद्य पदार्थों से संबंधित रसायनिक संकट :-

🔹 रासायनिक संकट में रसायनिक अथवा हानिकारक पदार्थ होते हैं जो खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं अथवा खाद्य पदार्थों में जाने या अनजाने मिला दिए जाते हैं इस वर्ग में कीटनाशक , रसायन , कृषि अवशेष , विषैली धातुएं , परिरक्षक , खाद्य रंग और अन्य मिलावटी पदार्थ सम्मिलित हैं ।

❇️ खाद्य पदार्थों से संबंधित जैविक एवं सूक्ष्म जैविक संकट :-

🔹 जैविक संकट में विभिन्न जीवधारी शामिल हैं । जैविक संकट में दिखाई देने वाले जीव एवं सूक्ष्म जीव सम्मिलित हैं । जीव धारियों में कृमि , घुन , मक्खी , मच्छर , तिल्ली , कीड़े आदि आते हैं । 

🔹 सूक्ष्म जीव जो खाद्य से संबंधित होते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं । खाद्य जनित रोगाणु कहलाते है सूक्ष्म जीवी रोगाणुओं से दो प्रकार के खाद्य जनित रोग उत्पन्न होते हैं :-

🔹 सूक्ष्म जीव में सम्मिलित है । फंगस , विषाणु एवं यीस्ट जीवाणु , प्रोटोजोआ ।

❇️ संक्रमण :-

🔹 खाद्य संक्रमण रोगाणु जीवों के शरीर में प्रवेश से उत्पन्न होता है , जो वहां पहुँच कर संख्या में बढ़ते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं । साल्मोनेला इसका एक आदर्श उदाहरण है । कच्चा दूध और अंडे भी इसके स्रोत हैं । गर्म करने पर साल्मोनेला नष्ट हो जाता है । अपर्याप्त पाकक्रिया से कुछ जीव जीवित बचे रहते हैं । अक्सर साल्मोनेला पारसंदूषन से फैलते हैं ।

❇️ खाद्य विषाक्तता :-

🔹 खाद्य पदार्थ से रोगाणों के नष्ट हो जाने पर भी कुछ जीवाणु जीवित रहते हैं । ये तभी आविष उत्पन्न करते हैं जब खाद्य पदार्थ अधिक गर्म या अधिक ठंडे नहीं रहते ।

🔹 खाद्य पदार्थों में आविष गंध , दिखावट अथवा स्वाद से नहीं पहचाने जा सकते हैं ऐसे पदार्थ सुगंध और रूप में ठीक लगते हैं जरूरी नहीं कि सुरक्षित ही हों । स्टाफीलोकोकस ऑरियस इसी का उदाहरण है । 

🔹 विभिन्न परजीवी भी रोग का कारण हो सकते हैं । जैसे सूअर के मांस में फीता कृमि द्वारा संक्रमण । इसी प्रकार के जीव वायु धूल और जल में पाए जाते हैं यह 50 % स्वस्थ व्यक्तियों के नासिका मार्ग , गले और त्वचा तथा बालों में पाए जाते हैं । खाद्य पदार्थ में पीड़क एवं कीतकीट भी पाए जा सकते हैं ।

❇️ खाद्य विषाक्तता फैलाने वाले कुछ जीवो के उदाहरण :-

🔹 उदाहरण हैं :- नोरोवायरस , रोटावायरस , हेपेटाइटस E जिनका लगभग 70 प्रतिशत मामलों में योगदान रहता है । नए रोगाणु उत्पन्न होते रहेंगे और इसलिए उन्हें पहचानने , नियंत्रित करने और खाद्य पदार्थों में उनकी उपस्थिति पता लगाने के लिए विधियों को विकसित करने की आवश्यकता है । 

🔹 खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में संदूषण और अपमिश्रण जैसे शब्दों को समझना महत्वपूर्ण है ।

❇️ संदूषण :- 

🔹 संसाधन अथवा भंडारण के समय / पहले / बाद में खाद्य पदार्थ में हानिकारक , अखाद्य अथवा आपत्तिजनक बाहरी पदार्थों जैसे- रसायन , सूक्ष्मजीव , तनुकारी पदार्थों की उपस्थिति संदूषण कहलाती है । 

❇️ खाद्य अपमिश्रण :-

🔹 वह प्रक्रिया है जिसमें भोजन की गुणवत्ता या तो खराब गुणवत्ता वाली सामग्री के अतिरिक्त या मूल्यवान घटक के निष्कर्षण से कम हो जाती है । इसमें खाद्य पदार्थों के विकास भंडारण , प्रसंस्करण , परिवहन और वितरण की अवधि के दौरान न केवल पदार्थों का जानबूझकर जोड़ या प्रतिस्थापन शामिल है बल्कि जैविक और रासायनिक संदूषण भी शामिल है , जो खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता में गिरावट के लिए भी ज़िम्मेदार है । मिलावट वे पदार्थ हैं जिनका उपयोग मानव उपभोग के लिए खाद्य उत्पादों को असुरक्षित बनाने के लिए किया जाता है ।

❇️ खाद्य गुणवतत्ता :-

🔹 खाद्य गुणवत्ता उन गुणों की ओर संकेत है जो उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों के गुणों को प्रभावित करती है । इसमें नकारात्मक गुण भी शामिल हैं , जैसे- सड़ना , संदूषण , अपमिश्रण , खाद्य सुरक्षा खतरे और साथ ही सकारात्मक गुण भी शामिल हैं , जैसे- रंग , सुगंध , बनावट । 

🔹 यह एक परिपूर्ण संकल्पना है जो पोषक विशेषताओं , संवेदनशील गुणों ( रंग , बनावट , आकार , रूप / स्वाद , सुरुचि , गंध ) सामाजिक सोच विचार और सुरक्षा जैसे कारकों को जोड़ती है । सुरक्षा , गुणवत्ता का प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण गुण है । 

❇️ खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण :-

🔹 पूरे विश्व में विभिन्न सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने खाद्य मानक तय किए हैं जो यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि खाद्य पदार्थ सुरक्षित हैं और अच्छी गुणवत्ता के हैं । निर्माता / सप्लायरों से इन मानकों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है । 

🔹 अत : सभी खाद्य सेवा उपलब्ध कराने वालों ( वे सभी सेवाएँ जो पूर्व तैयारी और पकाना / संसाधन , पैक करने और सेवा देने हेतु शामिल हैं ) को चाहिए कि वे बेहतर निर्माण विधियों को अपनाएँ और खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करें । ध्यान में रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें हैं :-


कच्चे माल और जल की गुणवत्ता ।


परिसर , कर्मचारियों , उपकरणों , खाद्य निर्माण और भंडारण क्षेत्रों की स्वच्छता ।


उपयुक्त ताप पर खाद्य का भंडारण ।


खाद्य स्वास्थ्य विज्ञान ।


बेहतर सेवा के तरीके ।


❇️ खाद्य मानक :- 

🔹 खाद्य पदार्थों से संबंधित प्रत्येक पहलू में एक जैसी गुणवत्ता , स्वच्छता और खाद्य स्तर को सुनिश्चित करने के लिए चार स्तरों पर खाद्यान्न मानकों और नियंत्रण प्रणालियों की आवश्यकता होती है :-

🔶 कंपनी खाद्य मानक :- यह कंपनी द्वारा अपने स्वयं के उपयोग के लिए बनाए जाते हैं सामान्यतय ये राष्ट्रीय मानकों की नकल होते हैं ।

🔶 भारतीय खाद्य मानक :- यह राष्ट्रीय मानक सरकार द्वारा बनाए जाते हैं ।

🔶 क्षेत्रीय खाद्य मानक :- समान भौगोलिक जलवायु इत्यादि वाले क्षेत्रीय समूहों के कानूनी मानकीकरण संगठन होते हैं ।

🔶 अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानक :- अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन ( ISO ) कोडेक्स अलीमेंटोरियस कमिशन ( CAC ) अंतर्राष्ट्रीय मानक प्रकाशित करते है ।

❇️ भारत में खाद्य मानक नियमन :-

🔹 भारत में खाद्य मानक नियमन 1954 में पीएफए के रूप में शुरू हुआ । इसका नाम खाद्य अपमिश्रण अधिनियम 1954 था । यह अधिनियम आवश्यकतानुसार कई बार संशोधित हो चुका है । भारत में बड़े पैमाने पर बनने वाले अथवा आयात किए और भारत में बेचे जाने वाले सभी उत्पादों को इस अधिनियम के अनुसार वर्णित सभी आवश्यकताएं पूरी करनी पड़ती हैं ।

🔹 PFA के अतिरिक्त अन्य आदेश या अधिनियम भी हैं जो विशिष्ट खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करते हैं : –


फल और सब्जी उत्पाद आदेश 


माँस खाद्य उत्पादन आदेश 


वनस्पति तेल उत्पाद आदेश


❇️ स्वैच्छिक उत्पादन प्रमाणीकरण :-

🔹 बीआईएस अर्थात भारतीय मानक ब्यूरो एवं एगमार्क विभिन्न उपभोक्ता सामग्री के मानकीकरण से संबंधित है । बीआईएस संसाधित खाद्य पदार्थों के लिए ISI के नाम से जानी जाने वाली स्वैच्छिक प्रमाणीकरण योजना चलाता है । 

🔹 8 मार्च कच्चे और संसाधित कृषि उत्पादों की प्रमाणीकरण के लिए लागू एक सच्चीं की योजना है । एगमार्क कच्चे और संसाधित कृषि उत्पादों की प्रमाणीकरण के लिए लागू एक स्वैच्छिक योजना है ।

❇️ खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2006 ( FSSAI ) :-

🔹 खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता नियमन के सभी नियमों का एकीकरण करके खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 बनाया गया । इस अधिनियम का उद्देश्य खाद्य से संबंधित नियमों को समेकित करना है । 

🔹 खाद्य के लिए विज्ञान आधारित मानक निर्धारित करने और उनके निर्माण , भंडारण , वितरण , विक्रय और आयत के नियमन के लिए की गई थी ताकि मानव उपयोग के लिए सुरक्षित और पौष्टिक खाद्य की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके । 

🔹 अधिनियम में निर्माण परिसर और उसके चारों और स्वास्थ्य जनक परिस्थितियां बनाए रखने , वैज्ञानिक तरीके से मानव स्वास्थ्य के खतरों के कारकों का आकलन और प्रबंधन का प्रावधान है ।

❇️ खाद्य सुरक्षा के अंतर्राष्ट्रीय मानक एवं समझौते :-

🔹 बहुत से अंतरराष्ट्रीय संस्थान और समझौते हैं जिन्होंने खाद्य सुरक्षा गुणवत्ता और बचाव को बढ वाशोध और व्यापार को सुसाध्य करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । प्रमुख भूमिका निभाने वाले मुख्य संस्थान हैं :-


कोडेक्स अलीमेंटोरियस कमिशन ( CAC )


अंतर्राष्ट्रीय मानक संस्थान ( ISO )


विश्व व्यापार संगठन ( World Trade Organization )


❇️ कोडेक्स अलीमेंटोरियस कमिशन ( Codex Alimentarius Commission :-

🔹 1961 में इसकी स्थापना हुई । 166 सदस्य देश और एक सदस्य संगठन यूरोपियन समुदाय बना । भारत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से इसका सदस्य है । सीएसई खाद्य मांगों से संबंधित विकास कार्यों के लिए एकमात्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संदर्भ केंद्र है जिसका अर्थ खाद्य नियमावली है और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाए गए खाद्य मानकों का एक संग्रह है । देश अपने राष्ट्रीय मानकों के विकास के लिए कोडेक्स मानकों उपयोग करते हैं ।

❇️ NATIONAL CODEX CONTACT POINT = NCCP :-

🔹 ” कोडेक्स इंडिया ” भारत के लिए राष्ट्रीय कोडेक्स संपर्क केंद्र ( एन . सी . सी . ) है । यह भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ( डी . जी . एच . एस . ) में स्थित है । यह राष्ट्रीय कोडेक्स समिति के सहयोग से भारत में कोडेक्स गतिविधियों को समन्वित और प्रोत्साहित करता है । 

❇️ अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन ( International standardization Organization ) :-

🔹 ISO , राष्ट्रीय मानक संस्थाओं का विश्वव्यापी गैर सरकारी संगठन है । आईएसओ का मिशन वस्तु के अंतरराष्ट्रीय विनिमय को सु बनाने और बुद्धिजीवी वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी और आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्रों में सहयोग विकसित करने के दृष्टिकोण से विश्व में मानकीकरण और संबंधित गतिविधियों के विकास को प्रोत्साहन देना है । आईएसओ द्वारा किया गया कार्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों में परिणित हो जाता है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के रूप में प्रकाशित होते हैं ।

🔹 ISO  9000 गुणवत्ता आवश्यकताओं का एक ऐसा ही अंतर्राष्ट्रीय संकेत चिह है ।

❇️ विश्व व्यापार संगठन- ( World Trade Organization ) :-

🔹स्थापना :- विश्व व्यापार संगठन की स्थापना वर्ष 1955 में की गई थी ।

🔹 स्थित :- Geneva, Switzerland

❇️ विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य :-

🔹 WTO का मुख्य उद्देश्य :-


व्यापार के समझौतों को लागू करके ।


व्यापार के झगड़ों को निपटाकर ।


देशों की व्यापार नीति के मुद्दों में सहायता सहजता पूर्वक स्वतंत्रता पूर्वक ।


निष्कपटता पूर्वक और पूर्वानुमान के साथ व्यापार को चलाने में सहायता करना है ।


WTO में वस्तुएं , सेवाएं और बौद्धिक सम्पदा शामिल है ।


❇️ प्रभावी खाद्य नियंत्रण प्रणाली के आवश्यक तत्व :-

🔶 खाद्य निरीक्षण :-

🔹 निरीक्षण द्वारा उत्पाद की मानक के साथ समरूपता स्थापित करना ।

🔹 यह सुनिश्चित करना कि सभी खाद्य पदार्थों का उत्पादन , हस्तन , संसाधन , भंडारण और वितरण नियम और कानून के अनुपालन के के साथ होता है ।

🔹 निरीक्षण के लिए सरकार और नगर परिषदों के द्वारा खाद्य निरीक्षकों की नियुक्ति खाद्य निरीक्षक द्वारा गुणवत्ता समरूपता की स्थिति का निर्धारण द्वारा गुणवत्ता समरूपता की स्थिति का निर्धारण ।

🔶 विश्लेषण क्षमता :-

🔹 खाद्य विश्लेषण के लिए आवश्यक हर प्रकार से सुसज्जित एवं सरकारी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला की आवश्यकता प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता ।

🔹 प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता जिन्हें प्रयोगशाला प्रबंधन के सिद्धांतों और भौतिक , रासायनिक तथा सूक्ष्म जैविक विश्लेषण , खाद्य और खाद्य उत्पादन के परीक्षणों का ज्ञान हो । रसायनिक तथा सूक्ष्म जैविक विश्लेषण और खाद्य उत्पादों के परीक्षण का ज्ञान हो ।

❇️ खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणालियाँ :-

🔹 खाद्य मानकों को अपनाने और उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने के लिए एक मजबूत खाद्य नियंत्रण तंत्र की आवश्यकता होती है । 

❇️ खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणालियाँ :-

🔶 उत्तम निर्माण पद्धतियां :- 


उत्पादनकर्ता को उत्पादन से पहले यह सुनिश्चित कि यह उत्पाद हानिकारक नहीं है । 


निर्माताओं द्वारा अनुपालन और निष्पादन करने में सहायता करने हेतु gmp अच्छा व्यवसायिक माध्यम है । 


इसके उपयोग के द्वारा गलत लेबलिंग से बचा जा सकता है । 


उत्पादकों द्वारा उत्तम निर्माण पद्धतियों का अनुपालन करने से उपभोक्ता के मन में उस कंपनी के प्रति विश्वसनीयता बढ़ती है ।


🔶 उत्तम हस्तन पद्धतियाँ :- 


इस प्रक्रिया में खेत से दुकान अथवा उपभोक्ता तक पहुंचाने के दौरान खाद्य संदूषण के संभावित स्रोतों की पहचान करना और उनसे बचाव के उपाय सुझाना शामिल है । 


जीएचपी ( GHP ) यह सुनिश्चित करती है कि खाद्य पदार्थों का हस्तन करने वाले सभी व्यक्तियों के स्वास्थ्य संबंधी आदतें अच्छी हैं । 


❇️ संकट विश्लेषण क्रांतिक नियंत्रण बिंदु ( HACCP ) :-

🔹 खाद्य पदार्थों का उपयोग के लिए सुरक्षित होने का आश्वासन देने का एक साधन है । इसमें कच्ची सामग्री से लेकर निर्माण प्रक्रिया के प्रत्येक चरण पर विस्तार से ध्यान दिया जाता है । 

🔹 इसमें निम्न को सम्मिलित किया जाता है संभावित संकटों की पहचान , कच्ची सामग्री एकत्र करना , निर्माण , वितरण , खाद्य पदार्थों का उपयोग , आहार श्रृंखला के प्रत्येक चरण के समय होने वाले संकटों की संभावनाओं का आकलन और संकटों के नियंत्रण के लिए उपाय बताना ।

❇️ HACCP का महत्व / आवश्यकता :-


यह खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की उपागम है ।


यह नियमित रूप से उत्तम गुणवत्ता वाले उत्पादों का आश्वासन देता है ।


खाद्य निरीक्षण एवं परीक्षण अधिक समय लेने वाली तथा महंगी प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया में समस्या तभी पकड़ में आती है जब उत्पन्न हो जाती है , जबकि HACCP में हरचरण पर सावधानी बरतने के कारण समस्या उत्पन्न होते ही पकड़ में आ जाती है और उचित कार्यवाही की जा सकती है ।


खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उत्पादकों , संसाधकों , वितरकों और निर्यात करने वालों को संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम बनाता है ।


खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 एच एसीसीपी , जीएमपी , जीएचपी के माध्यम से खाद्य सुरक्षा का प्राथमिक उत्तरदायित्व उत्पादकों और आपूर्ति करने वालों पर डालता है । यह उपभोक्ता संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ।

Class 12 Home Science Chapter 5 खाद्य प्रसंस्करण और प्रौद्योगिकी Food Processing and Technology Notes In Hindi


 

Class 12 Home Science Chapter 5 खाद्य प्रसंस्करण और प्रौद्योगिकी Food Processing and Technology Notes In Hindi


📚 अध्याय = 5 📚

💠 खाद्य प्रसंस्करण और प्रौद्योगिकी 💠

❇️ खाद्य प्रसंस्करण का अर्थ :-

🔹 खाद्य प्रसंस्करण का अर्थ है खाद्य पदार्थों की जीवन अवधि को बढ़ाने के लिए उन्हें अलग अलग प्रक्रियाओं से गुजारा जाना जिसमें उनकी shelf – life बढ़ने के साथ साथ उनके मूल गुणों को भी लंबे समय तक बनाए रखा जा सकै । ऐसी प्रक्रियाएं खाद्य प्रसंस्करण कहलाती हैं ।

❇️ प्रौदयोगिकी का अर्थ :-

🔹 प्रौदयोगिकी का अर्थ है विज्ञान द्वारा विकसित नई – नई तकनीकों के प्रयोग द्वारा ‘ खाद्य उत्पादन , गुणवत्ता , भंडारण , संरक्षण , एवं shelfLife को बढ़ाना एवं आसान बनाना ।

❇️ खाद्य प्रसंस्करण और प्रौद्योगिकी का इतिहास :-

🔹 प्राचीन काल से भारत में फसल कटने पर अनाजों को सुखाया जाता है । जिनसे उनका जीवनकाल बढ़ जाता हैं । प्रारंभ में खाद्य पदार्थों का संसाधन उनकी सुपाच्यता , स्वाद सुधारने और निरंतर आपूर्ति बनाए रखने के लिए किया जाता था । भारत में अचार मुरब्बा और पापड़ संरक्षित उत्पादन के उदाहरण हैं जो कुछ फलों और सब्जियों या अनाजों से बनाए जाते हैं ।

🔹 समय बीतने के साथ – साथ उन्नत परिवहन , संचार और बढ़ते औद्योगीकरण ने ग्राहकों की आवश्यकताओं को और विविधता पूर्ण बना दिया और अब सुविधाजनक खाद्य पदार्थों , ताजे , अधिक प्राकृतिक , सुरक्षित और स्वाद स्वास्थ्यवर्धक खाद्य तथा पर्याप्त सुरक्षा काल वाले खाद्य पदार्थों की मोग बढ़ती जा रही है । ग्राहकों की इस मांग ने विज्ञान और तकनीक को खाद्य पदार्थों से जोड़ दिया ।

❇️ खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण और प्रौद्योगिकी का महत्व :-


भारत का कृषि उत्पादन बढ़ने के कारण भंडारण और प्रसंस्करण की आवश्यकता । 


भारतीय खाद्य उद्योग संसाधित खाद्य के प्रमुख उत्पादन के रूप में जीडीपी का 6 % ।


जीवनशैली में परिवर्तन आवागमन में वृद्धि और वैश्वीकरण के कारण विभिन्न उत्पादों की बढ़ती हुई मांग ।


आहार में पोषक तत्वों की कमी को प्रबलीकरण या फूड फोर्टिफिकेशन के द्वारा पूरा करना । आयोडीन युक्त नमक , फोलिक अम्ल युक्त आटा , विटामिन ई युक्त तेल या घी । 


खाद्य पदार्थों में ऊर्जा की मात्रा को कम करने के लिए एवं कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम करने के लिए चीनी की जगह पर कृत्रिम मिठास का प्रयोग एवं आइसक्रीम में वसा की जगह उच्चारित प्रोटीन का प्रयोग ।


❇️ खाद्य विज्ञान :-

🔹 यह एक विशेष क्षेत्र है जिसमें आधारभूत विज्ञान विषयों जैसे रसायन और भौतिकी , पाककला , कृषि विज्ञान और सूक्ष्म जीव विज्ञान के अनुप्रयोग शामिल हैं । इसमें फसल काटने से लेकर , भोजन पकाने एवं खाते की सभी तकनीकी पहली जुड़े हुए हैं । खाद्य वैज्ञानिक खाद्य के भौतिक रसायन पहलुओं से संबंध रखते हैं अतः हमें खाद्य की प्रकृति और गुणों को समझने में मदद करते हैं ।

❇️ खाद्य संसाधन :-

🔹 यह ऐसी विधियों और तकनीकों का समूह है जो कच्ची सामग्री को तैयार या आधे तैयार उत्पाद में बदल देता है । यह खाद्य पदार्थों को आकर्षक विपणन योग्य और अक्सर लंबे सुरक्षा काल वाले खाद्य उत्पादों में बदल देता है ।

❇️ खाद्य उत्पादन :-

🔹 इसमें खाद्य पदार्थों को बढ़ती हुई जनसंख्या की मांगे पूरी करने के लिए खाद्य प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए बड़े पैमाने पर तैयार कर दिया जाना ।

❇️ खाद्य प्रौद्योगिकी :-

🔹 एक ऐसा विज्ञान है जिसमें वैज्ञानिक अनुप्रयोगों के साथ – साथ सामाजिक , आर्थिक ज्ञान और उत्पादन के लिए कानूनी नियम व व्यावहारिक उपयोग होता है । सुरक्षित पोषण संपूर्ण वांछनीय के साथ साथ सस्ते , सुविधाजनक खाद्य पदार्थों के चयन , भंडारण एवं संरक्षण , संसाधन एवं पैक करने के कौशलों को विकसित करता है ।

❇️ खाद्य संसाधन और प्रौद्योगिकी का विकास :-

🔹 वर्ष 1810 में निकोलस एप्पर्ट द्वारा खाद्य पदार्थों को बंद करने की प्रक्रिया को विकसित करना एक निर्णायक घटना थी । बाद में वर्ष 1864 में लुई पास्चर द्वारा अंगूरी शराब के खराब होने पर शोध ” उसे खराब होने से कैसे बचाएं “ का वर्णन खाद्य प्रौद्योगिकी का पहला आधार था । 

🔹 पाश्चर ने अल्कोहल , सिर्रका अंगूरी शराब और बीयर के अलावा दूध के खट्टा होने पर भी शोध किया । उन्होंने रोग उत्पन्न करने वाले जीवो को नष्ट करने के लिए पाश्चरीकरण ( निर्जीवी करण ) प्रक्रम को विकसित किया । पाश्चरीकरण खाद्य की सूक्ष्म जीवो से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम था । सबसे पहले सेना की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खाद्य प्रौद्योगिकी का उपयोग हुआ ।

🔹 समय के साथ – साथ 20 वीं सदी में कामकाजी महिलाओं के लिए , इसके साथ ही खाद्य उद्योग पोषण संबंधी मुद्दों पर ध्यान देने के लिए बाध्य हुआ । भोजन से जुड़ी मान्यताएं रुचियां बदली ,। खाद्य प्रौद्योगिकीविदो ने नई तकनीकों का उपयोग कर सुरक्षित और ताजे खाद्य उपलब्ध कराने का प्रयास किया खाद्य प्रौद्योगिकी ने विविध प्रकार के सुरक्षित और सुविधाजनक खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराए हैं । तेजी से विकसित हो रहे इस क्षेत्र ने सभी स्तरों पर रोजगार क रास्ते भी खोल दिए हैं ।

❇️ खाद्य संसाधन और संरक्षण का महत्व :-


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा खाद्य पदार्थों को रेडीमेड पदार्थों में बदला जाना ।


पदार्थों को अधिक उपयोगी सामग्री और लंबे समय तक स्थाई रहने योग्य और स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों में बदलना । 


खाद्य पदार्थों के संसाधन करने से भंडारण , लाने ले जाने , स्वाद और सुविधा में बढ़ोतरी । 


खाद्य पदार्थों भोज्य और सुरक्षित रूप से संरक्षित करने के लिए खाद्य संसाधन और संरक्षण की आवश्यकता । 


सूक्ष्म जीवो से खराब होने से बचाना और उनकी SHELF LIFE बढ़ाना ।


❇️ खाद्य पदार्थों का नष्ट होने से बचाने :-

🔹 खाद्य पदार्थों को नष्ट होने से बचाने के लिए संसाधित विधियों मूलभूत संकल्पना


CO2,02 को नियंत्रित करना


पीएच कम करना


भंडारण के समय ताप कम करना


ऊष्मा का अनुप्रयोग


जल को हटाना


❇️ खाद्य पदार्थों का वर्गीकरण :-

🔹 संसाधन की सीमा और प्रकार के अनुसार खाद्य पदार्थों का वर्गीकरण :-


कार्य मुल्क खाद्य पदार्थ


संश्लेषित खाद्य पदार्थ


खाद्य व्युत्पन्न पदार्थ


फॉर्मूला बद्य खाद्य पदार्थ


विनिर्मित खाद्य पदार्थ


संरक्षित खाद्य पदार्थ


चिकित्सी य खाद्य पदार्थ


❇️ करियर बनाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण एवं प्रौद्योगिकी की शाखाएं :-


पेय पदार्थ , मद्य निर्माण कारखाना


अनाज और योजक पदार्थ


समुद्री खाद्य


वसा और तेल


स्थायिकारी , परिरक्षक / रंग


डेयरी उत्पाद , फल सब्जी संसाधन


❇️ करियर के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कौशल :-


खाद्य उद्योग में संसाधन एवं निर्माण का ज्ञान ।


उपभोक्ता बाजारों में शोध का ज्ञान ।


नई प्रौद्योगिकी का विकास ।


वर्तमान खाद्य उत्पादों में सुधार एवं नए उत्पादों का विकास ।


खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना ।


सुरक्षा मॉनिटर करना ।


गुणवत्ता को नियंत्रित करना  


गुणवत्ता नियंत्रण करने की पद्धतियों में सुधार करना ।


लाभप्रद उत्पादन के लिए लागत निकालने का गुण ।


नियामक मामले ।


खाद्य प्रसंस्करण एवं प्रौद्योगिकी की विभिन्न शाखाओं में भिन्नता अनुसार संबंधित कौशल


❇️ जीविका ( करिअर ) के अवसर :-


उत्पादन प्रबंधक 


परियोजना कार्यान्वयन 


विपणन और विक्रय अधिकारी 


संवेदी मूल्यांकन 


गुणवत्ता आश्वासन 


शोध और विकास , उत्पादन विकास 


परियोजना की वित्तीय व्यवस्था 


परियोजना का मूल्यांकन 


शिक्षण और शोध 


उद्यमशीलता विकास 


परामर्श 


उत्पादों का तकनीकी विपणन 

Class 12 Home Science Chapter 4 खान – पान व्यवस्था और भोजन सेवा प्रबंधन Catering and Food Service Management Notes In Hindi


 

Class 12 Home Science Chapter 4 खान – पान व्यवस्था और भोजन सेवा प्रबंधन Catering and Food Service Management Notes In Hindi


📚 अध्याय = 4 📚

💠 खान – पान व्यवस्था और भोजन सेवा प्रबंधन 💠

❇️ भोजन सेवा प्रबंधन :-

🔹 इसका अर्थ है आवश्यकता अनुसार भोजन का प्रबंध करना । ऐसी सेवाएं जो घर का भोजन उपलब्ध ना होने की स्थिति में व्यक्ति के भोजन की व्यवस्था कर सकें । इस प्रकार भोजन की व्यवस्था करने को भोजन सेवा प्रबंधन कहते हैं ।

❇️ खानपान व्यवस्था और भोजन सेवा प्रबंधन : एक परिचय  :- 

🔹 प्राचीन समय में भोजन का प्रबंधन धर्मशाला में होता था । सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में परिवर्तन के साथ भोजन सेवा और भोजन प्रबंधन एक उद्योग के रूप में उभर आया है । क्योंकि ऐसे भोजन की बहुत अधिक मांग है जो स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि साफ सुथरा और स्वास्थय पूरक हो और बहुत सुंदर तरीके से परोसा जाता हो । 

🔹 वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के प्रभाव से भोजन की सुरक्षा और गुणवत्ता में न केवल सुधार हुआ है । बल्कि भोजन तैयार करने से लेकर परोसने तक का कार्य तकनीकी बद्ध हो गया है । खानपान व्यवस्था और भोजन सेवा प्रबंधन सिर्फ एक कल्याणकारी कार्य ना हो कर एक बहुत बड़े लाभदाई एवं रचनात्मक व्यवसाय के रूप में स्थापित हो गया है ।

❇️ खानपान व्यवस्था और भोजन सेवा प्रबंधन का महत्व :-

🔹 आज बढ़ते जा रहे प्रवसन , शहरीकरण , वैश्वीकरण , अंतरराष्ट्रीय यात्राएं पर्यटन विभिन्न पाक प्रणालियां और विज्ञापनों की जानकारी एवं लोगों में नए भोजन का स्वाद लेने की बढ़ती हुई रुचि इत्यादि अनेक कारणों ने भोजन सेवा प्रबंधन के कार्य को बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है । 

❇️ भोजन सेवाओं के विकास को प्रभावित करने वाले कारक :-

🔹 भोजन सेवाओं के विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्न :-


धार्मिक प्रथाएं


परंपरा और संस्कृति


औद्योगिक विकास


सामाजिक और आर्थिक परिवर्त


प्रौद्योगिकी विकास


वैश्वीकरण


❇️ कैटरिंग सेवाएं :-

🔹 खानपान व्यवस्था भोजन सेवा उपलब्ध कराने वाली सेवाएं खानपान व्यवस्था या कैटरिंग सेवाएं कहलाती हैं ।

🔹 ऑर्डर के अनुसार भोजन तैयार कर ऑफिस में पहुंचाना , घरों में पहुंचाना , घर पर बने भोजन को ग्राहक पहुंचाना , अंतरराष्ट्रीय और पर्यटकों के लिए खानपान की व्यवस्था करना . सामुदायिक गतिविधियों जैसे मेले , प्रदर्शनी , फूल फल सब्जी की प्रदर्शनों में आने वाले लोगों के लिए भोजन , अल्पाहार या फिर पेय पदार्थों की व्यवस्था करना ।

🔹 रैलियों के लिए , मीटिंग्स के लिए , हॉस्टल के लिए , अस्पतालों के लिए , छात्रावासों इत्यादि के लिए भोजन का प्रबंध करना कैटरिंग सेवाओं के उदाहरण है ।

❇️ भोजन उद्योग :-

🔹 वे उद्योग जो लाभांश कमाने के लिए भोजन का व्यापार करते हैं । यह आदेश के अनुसार भोजन तैयार कर मांग करने वाले तक पहुंचाते हैं । यह बहुत महंगे से लेकर सस्ते साधन तक हो सकते हैं । होटल रेस्टोरेंट फास्ट फूड की दुकान है विद्यालय महाविद्यालय विश्वविद्यालय उद्योग और दफ्तर इत्यादि की कैंटीन या कैफिटेरिया ।

❇️ भोजन सेवा प्रबंधन :-

🔹 लोगों की आवश्यकता के अनुसार उन्हें संतोषजनक एवं लागत प्रभावी तरीके से कलात्मक और वैज्ञानिक ढंग से भोजन और पेय पदार्थ उपलब्ध कराने की कला को भोजन सेवा प्रबंधन कहते हैं ।

❇️ भोजन सेवा प्रबंधक :-

🔹 वह होता है जो भोजन सेवा भोजन सेवा इकाई या संगठन के प्रबंधन और शासन की जिम्मेदारी लेता है ।

❇️ खानपान व्यवस्था में व्यंजन सूची / menu :-

🔹 भोजन सेवा इकाई में सभी गतिविधियां व्यंजन सूची से प्रभावित होती हैं । व्यंजन सूची से ही आवश्यक सामग्री , उपकरणों के प्रकार और संख्या , कर्मचारियों की निपुणता और उनकी नियुक्ति की संख्या निर्धारित की जाती है ।

❇️ खानपान व्यवस्थाओं में सेवाओं के प्रकार :-

🔶 कल्याणकारी या गैर व्यवसायिक :- इन सेवाओं का मुख्य उददेश्य परोपकार और सामाजिक कल्याण है । इसका लक्ष्य है इससे संबंधित लोगों को भरपेट भोजन कराना । इसके उदाहरण है कार्यस्थल पर सशस्त्र सेना बलों , विद्यालयों में और सरकार द्वारा कार्यान्वित पूरक भोजन कार्यक्रमों में या अस्पतालों में रोगियों को भोजन कराना ।

🔶 होटल और व्यवसायिक खानपान व्यवस्था :- इस प्रकार की सेवाएं और प्रतिष्ठान सामान्य जनों के प्रयोग के लिए खुले होते हैं । इनका उद्देश्य लाभ कमाना होता है । देश के लिए इन सेवाओं का बहुत अधिक महत्व है । क्योंकि यह उदयोग अपनी सेवाओं के बदले देश में चलाते हैं । होटल और भोजन प्रबंध सेवाएं पर्यटक पर्यटन और अवकाश उद्योग की मदद करते हैं ।

❇️ व्यवसायिक क्षेत्र द्वारा की जाने वाली खान पान व्यवस्था में पाई जाने वाली भिन्नता एवं कारण :-

🔹 अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त 7/5 सितारा होटल जिनकी सेवा त्रुटि रहित होती है । उत्कृष्ट कोटि की सेवाएं , भोजन एवं परिवेश महंगी कीमतों पर उपलब्ध कराते हैं ।

🔹 कम खर्चीली प्रतिष्ठान , होटल , रेस्टोरेंट इत्यादि होते हैं । सुखद परिवेश , अच्छा भोजन और उच्च स्तरीय सेवा अपेक्षाकृत कम कीमत में उपलब्ध कराते हैं ।

🔹 छोटे रेस्टोरेंट्स जहां परिवेश पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता । सीमित व्यंजन सूची , सीमित उपकरण परंतु सस्ता भोजन उपलब्ध कराया जाता है ।

❇️ भोजन सेवा प्रणालियों के प्रकार :-


परंपरागत भोजन प्रणालियाँ


कॉमिसरी भोजन ( रसद विभाग ) सेवा प्रणाली


तैयार भोजन संबंधी सेवा प्रणाली


संयोजक ( असेबंली ) सेवा प्रणाली 


🔶 परंपरागत भोजन प्रणालियों :- 

🔹 भोजन उसी परिसर के रसोई घर में तैयार किया जाता है , जहां पर परोसा जाना है । भोजन पदार्थों को परोसने के लिए वितरित कर दिया जाता है । उदाहरण के लिए अस्पताल में मरीजों को । यह प्रणाली व्यक्तिगत पसंद के लिए अधिक अनुकूल है । मौसम के अनुसार उपलब्ध सामग्री उपयोग किया जा सकता है और व्यंजन सूची बनाने में बहुत लचीलापन रहता है । इसमें लागत भी बहुत कम आती है । 

🔶 कॉमिसरी भोजन ( रसद विभाग ) सेवा प्रणाली :-

🔹 इस प्रणाली में भोजन एक केंद्र पर तैयार किया जाता है , परंतु परोसने के लिए के लिए कुछ दूरी पर स्थित क्षेत्रों में वितरि कर दिया जाता है । इसमें यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है कि भोजन विभिन्न स्थानों पर सप्लाई हो गया है । 

🔹 उदाहरण के लिए कैफे कॉफी डे , बरिस्ता , जहां पर मूल खाद्य पदार्थ आइसक्रीम दूध , बिस्किट इत्यादि केंद्रीय रसोईघर से सप्लाई की जाती है । ग्राहक के ऑर्डर देने पर उसकी इच्छा अनुसार उसमें सुगंध और अन्य टॉपिंग इत्यादि मिलाकर तैयार कर दिया जाता है । 

🔹 इसका लाभ यह है कि हर इकाई के लिए खाद्य पदार्थ बनाने के लिए अलग उपकरण और व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं होती है जहां पर सभी इकाइयों के लिए उत्पादों की गुणवत्ता एकरूपता सुनिश्चित की जा सकती है और यह लागत प्रभावी भी है ।

🔶 तैयार भोजन संबंधी सेवा प्रणाली :-

🔹 खाद्य पदार्थों को परोसने के समय से बहुत पहले बनाकर तैयार कर लिया जाता है और जब तक वे उपयोग में नहीं आते उन्हे हिमशीतित अर्थात डीप फ्रीज़र में रखा जाता है । बड़े शहरों में इस प्रकार के बहुत से खाद्य पदार्थ मिलते हैं जैसे पराठे समोसे कटलेट फ्रेंच फ्राइस । 

🔹 मैफ़्को और गोदरेजऐसे उद्योगों के उदाहरण हैं जिन्होंने ऐसे उत्पाद विकसित किए हैं और भी उनका वितरण भी कर रहे हैं । 

🔹 इस प्रकार की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है । इस जमी हुई अवस्था में खाद्य पदार्थ के भंडारण के लिए अलग फ्रीजर की आवश्यकता होती है । खाद्य पदार्थों को संभालने की प्रक्रिया में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है जिससे उन्हें दूषित और खराब होने से बचाया जा सके ।

🔶 संयोजक ( असेबंली ) सेवा प्रणाली :-

🔹 इसमें पूर्ण रूप से तैयार खाद्य पदार्थ विनिर्माता से खरीदे जाते हैं और परोसे जाने वाले स्थान पर अंतिम प्रक्रियाएँ की जाती हैं । इस कार्यों में परोसने के स्थान पर कम से कम प्रक्रिया करने की आवश्यकता होती है । 

🔹 उदाहरण के लिए गोलगप्पे । इसकी विशेषतायह है कि तैयार की गई वस्तु बहुत अधिक मात्रा में नहीं की जाती ।

🔶 संयोजक ( असेबंली ) सेवा प्रणाली :-

🔹 मैं न्यू बनाने , खाद्य पदार्थों के चयन , बनाने और परोसने , आवश्यक उपकरणों का ज्ञान ,

🔹 संगठनात्मक और प्रबंधक कौशल तथा सफल कार्मिक निदेशक ।

🔹 सुनिश्चित कर सके की सफाई और स्वच्छता सर्वोत्तम है । लागत नियंत्रण की समुचित प्रणाली ।

🔹 इकाई के भौतिक स्वरूप के लिए स्थान का बुद्धिमता से प्रयोग किया गया हो ।

🔹 सुनिश्चित कर सके कि अपशिष्ट प्रबंधन के लिए उचित कार्रवाई और विधियां प्रयोग में लाई जा रही है . सारी प्रक्रिया यथासंभव पर्यावरण हितैषी हो ।

❇️ व्यंजन सूची नियोजन :-

🔹 व्यंजन सूची का अर्थ है पर परोसे जाने वाले खाद्य पदार्थों की सूची । यह ग्राहक को यह बताती है कि उस रेस्टोरेंट या होटल में कौन कौन सी डिशेस या खाद्य पदार्थ कितने मूल्य में और दिन के किस समय में उपलब्ध होंगी आमतौर पर आसपास रहने वाले एवं बारंबार आने वाले ग्राहकों की पोषण संबंधी आदतों और संस्कृति के अनुसार बनाया जाता है । 

❇️ व्यंजन सूची के कार्य :-

🔹 व्यंजन सूची के मुख्यतः दो कार्य है : 


यह ग्राहक को सूचित करती है कि उसके लिए क्या उपलब्ध है । 


भोजन प्रबंध स्टाफ को बताती है कि उन्हें क्या बनाना है ।


🔹 मेनू कार्ड तीन तरह के विचारों को दिखाता है । ग्राहक को परोसे गए भोजन की मात्रा विविधता और स्वादिष्ट होने के साथ ही कीमत अदा होने का भी भाव मिलता है । 

🔹 कर्मचारियों को जिन्हें लिखित व्यंजन सूची को वास्तविक खाद्य पदार्थ में बदलना होता है एवं प्रबंधन को जिन्हें लाभ अच्छी ख्याति और उनके प्रतिष्ठान पर ग्राहक के दोबारा आने की संतुष्टि होती है । एक मन्यू कार्ड रेस्टोरेंट की शैली को प्रतिबिंबित करता है ।

🔹 आकर्षक और अच्छे डिजाइन वाली व्यंजन सूची बिक्री को बढ़ाती है और विज्ञापनसूची नियोजित करने के लाभ यह है कि श्रम बचाने वाली , समय बचाने वाली और लागत प्रभावी होती हैं व्यंजन सूची नियोजित करने के लाभ यह है कि यह कम श्रम , समय और लागत मैं तैयार हो जाता है ।

❇️ भोजन सेवा प्रबंधन के लिए संसाधन :-

🔹 ये संसाधन सामान्यत : छ ‘ M ’ के रूप में जाने जाते हैं –


धन


सामग्री


मिनट


मशीनें


मार्केट


मनुष्य


❇️ प्रबंधन के कार्य :-


नियोजन 


आयोजन 


प्रतिनिधित्व 


निर्देशन 


प्रेरित करना 


बजट बनाना 


संपूर्ण प्रक्रम का समन्वय करना एवं रिपोर्टिंग करना


❇️ जीविका के लिए तैयारी करना :-

🔹 खाद्य सेवा उद्योग में सफलता के लिए आवश्यक कुछ व्यक्तिगत कौशल :-


भोजन में रूचि और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पाक कलाओं में होने वाले परिवर्तनों की नियमित जानकारी । 


भोजन की गुणवत्ता , उत्पादन , स्वच्छता और खाद्य लागत नियंत्रण पर ध्यान देने की योग्यता । 


उत्पादन के उच्च स्तर को स्थापित करना , बनाए रखना और लागू करने की योग्यता । 


बहिरवादी और मैत्रीपूर्ण प्रवृत्ति , अच्छे आयोजन योग्यताएं और विस्तृत विवरण के लिए दृष्टि । मनोहर , प्रसन्न और ऊर्जावान व्यक्तित्व । 


संप्रेषण क्षमता और पारस्परिक क्रिया पोषण । लंबे समय तक क्रियाशील रहने की क्षमता । 


अंग्रेजी और पसंद की अन्य भाषाओं में अंग्रेजी और पसंद की अन्य भाषाओं की जानकारी और नियंत्रण ।


❇️ कार्यक्षेत्र :-


अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय उद्योग में कार्य करने के लिए -तत्परता


समर्पण अभ्यास और निपुणता की आवश्यकता


दूर दृष्टि व्यवसायिक सोच वाले नौजवानों की आवश्यकता है ।


भोजन सेवा व्यवसायि क कार्यक्षेत्र की मांग


अनगिनत व्यवसायिक सुविधाएं


सुंदर स्थानोंपर कार्य करने के अवसर


❇️ खानपान व्यवस्था और भोजन सेवा उद्योग में करियर :-

🔹 प्रकार विभिन्न के कैरियर के कुछ उदाहरण :-


यात्रा संबंधी परिवहन निकायों में भोजन प्रबंध जैसे वायुयान रेलगाड़ी समुद्री विहार इत्यादि ।


विभिन्न स्तरों पर शेफ का कार्य


स्वयं का स्वतंत्र बिजनेस , मनोरंजन कैटरिंग , रेस्टोरेंट उद्योगों में भोजन प्रबंध


होटल , रेस्टोरेंट में विभिन्न स्तरों पर प्रबंधक का कार्य 


स्वास्थ्य देखभाल उद्योग में कार्य अस्पताल


भोजन सेवा पर्यवेक्षकों का कार्य करना


❇️ जीविका ( करिअर ) के अवसर :-


भोजन – प्रबंध उद्योग में खाद्य सेवा पर्यवेक्षक , अल्पाहार-गृह प्रबंधक , भोजन – प्रबंधक , उत्पादन प्रबंधक , क्रय प्रबंधक और खाद्य सेवा निदेशक / सहायक खाद्य सेवा निदेशक के रूप में । 


3 सितारा से 7 सितारा होटलों , विशिष्ट भोजनालयों में शैफ़ ( रसोइया ) के रूप में । 


विद्यालय , उद्योग और अस्पतालों के कैंटीन प्रभारी के रूप में ।


मनोरंजन उद्यानों में भोजन – प्रबंध , राष्ट्रीय , राज्य और क्षेत्रीय उद्यानों में भोजन – प्रबंध , साहसिक / पारिस्थितिकी पर्यटन के लिए भोजन प्रबंध , थीम पार्टियों , उत्पादन शुभारंभ समारोहों , दावतों , सरकारी समारोहों के लिए भोजन प्रबंध ।


प्रचार माध्यमों के प्रदर्शनों में अपने उद्यमशीलता संबंधी प्रयासों में।


पाक – विज्ञान में विशेषज्ञ 


पत्र – पत्रिकाओं ब्लाग्स संचार माध्यमों के प्रदर्शनों के लिए लिखना ।