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NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 The Rise of Nationalism in Europe (यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय)


 

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 The Rise of Nationalism in Europe (यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय)

These Solutions are part of NCERT Solutions for Class 10 Social Science in Hindi Medium. Here we have given NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 The Rise of Nationalism in Europe.

प्रश्न अभ्यास

पाठ्यपुस्तक से

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें –


(क) ज्युसेपे मेत्सिनी


(ख) काउंट कैमिलो दे कावूर


(ग) यूनानी स्वतंत्रता युद्ध


(घ) फ्रैंकफर्ट संसद


(ङ) राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका ।


उत्तर (क) ज्युसेपे मेसिनी – वह इटली का एक क्रांतिकारी था। इसका जन्म 1807 में जेनोआ में हुआ था और वह कार्बोनारी के गुप्त संगठन का सदस्य बन गया। 24 वर्ष की अवस्था में लिगुरिया में क्रांति करने के लिए उसे देश से बहिष्कृत कर दिया गया। तत्पश्चात् इसने दो और भूमिगत संगठनों की स्थापना की। पहला था मार्सेई में यंग इटली और दूसरा बर्न में यंग यूरोप, जिसके सदस्य पोलैंड, फ्रांस, इटली और जर्मन राज्यों में समान विचार रखनेवाले युवा थे। मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की मर्जी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई थी। अतः इटली का एकीकरण ही इटली की मुक्ति का आधार हो सकता था। उसने राजतंत्र का घोर विरोध किया और उसके मॉडल पर जर्मनी, पोलैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड में भी गुप्त संगठन बने। इसी कारण मैटरनिख ने उसके विषय में कहा कि वह हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन’ है।

(ख) काउंट कैमिलो दे कावूर – काउंट कैमिलो दे कावूर इटली में मंत्री प्रमुख था, जिसने इटली के प्रदेशों को एकीकृत करनेवाले आंदोलन का नेतृत्व किया। वैचारिक तौर पर न तो वह क्रांतिकारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखनेवाला । इतालवी अभिजात वर्ग के तमाम अमीर और शिक्षित सदस्यों की तरह वह इतालवी भाषा से कहीं बेहतर फ्रेंच बोलता था। अतः इटली के सम्राट विक्टर इमेनुएल ने उसे 1852 को सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का प्रधानमंत्री बना । उसने यहाँ पर आर्थिक, शैक्षिक कृषि के विकास के लिए कार्य किए तथा सेना में सुधार किया। उसने फ्रांस व सार्डिनिया पीडमॉण्ट के बीच एक कूटनीतिक संधि की। अपनी इन कूटनीतिक चालों के कारण उसने इटली की समस्याओं की तरफ यूरोपीय देशों का ध्यान आकर्षित किया। 6 जून 1861 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। फिर भी वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहा जिनके कारण 18 फरवरी 1861 ई० में इटली की संसद ने विक्टर इमेनुएल को ‘इटली का सम्राट’ घोषित किया तथा इटली का एकीकरण संभव हुआ। सार्डिनिया-पीडमॉण्ट 1859 में आस्ट्रियाई बलों को हरा पाने में कामयाब हुआ।

(ग) यूनानी स्वतंत्रता युद्ध – यूनानी स्वतंत्रता युद्ध ने पूरे यूरोप के शिक्षित अभिजात वर्ग में राष्ट्रीय भावनाओं का संचार किया। 15वीं सदी से यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों को आजादी के लिए संघर्ष 1821 में आरंभ हो गया। यूनान में राष्ट्रवादियों को निर्वासन में रह रहे यूनानियों के साथ पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों का भी समर्थन मिला जो प्राचीन यूनानी संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे। कवियों और कलाकारों ने यूनान को ‘यूरोपीय सभ्यता का पालना’ बताकर प्रशंसा की और एक मुस्लिम साम्राज्य के विरुद्ध यूनान के संघर्ष के लिए जनमत जुटाया। अंग्रेज़ कवि लार्ड बायरन ने धन एकत्रित किया और बाद में युद्ध लड़ने भी गए, जहाँ 1824 में बुखार से उनकी मृत्यु हो गई। अंतत: 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी।

(घ) फ्रैंकफर्ट संसद – जर्मन इलाकों में बड़ी संख्या में राजनीतिक संगठनों ने फ्रैंकफर्ट शहर में मिलकर एक सर्व-जर्मन नेशनल एसेंब्ली के पक्ष में मतदान का फैसला किया। 18 मई, 1848 को, 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक सजेधजे जुलूस में जाकर फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया। यह संसद सेंट पॉल चर्च में आयोजित हुई। उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया। इस राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी गई जिसे संसद के अधीन रहना था। जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को ताज । पहनाने की पेशकश की तो उसने उसे अस्वीकार कर उन राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे। इस प्रकार जहाँ कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया, वहीं संसद का सामाजिक आधार कमजोर हो गया। संसद में मध्यम वर्गों का प्रभाव अधिक था, जिन्होंने मजदूरों और कारीगरों की माँगों का विरोध किया, जिससे वे उनका समर्थन खो बैठे। अंत में प्रशो के राजा के इंकार के कारण फ्रेंकफर्ट संसद के सभी निर्णय स्वतः समाप्त हो । गए जिससे उदारवादियों व राष्ट्रवादियों में निराशा हुई। प्रशा के सैनिकों ने क्रांतिकारियों को कुचल दिया जिससे यह संसद भंग हो गई।

(ङ) राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका – राष्ट्रवादी संघर्षों के वर्षों में बड़ी संख्या में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में भाग लिया। इसके बावजूद उन्हें एसेंब्ली के चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित रखा गया। था। जब सेंट पॉल चर्च में फ्रैंकफर्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक दीर्घा में खड़े होने दिया गया।

प्रश्न 2. फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या कदम उठाए?

उत्तर प्रारंभ से ही फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने ऐसे अनेक कदम उठाए, जिनसे फ्रांसीसी लोगों में एक सामूहिक पहचान की भावना उत्पन्न हो सकती थी। ये कदम निम्नलिखित थे


पितृभूमि और नागरिक जैसे विचारों ने एक संयुक्त समुदाय के विचार पर बल दिया, जिसे एक संविधान के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त थे।


एक नया फ्रांसीसी झंडा चुना गया, जिसने पहले के राष्ट्रध्वज की जगह ले ली।


इस्टेट जेनरल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के समूह द्वारा किया जाने लगा और उसका नाम बदलकर नेशनल एसेंब्ली | कर दिया गया।


नई स्तुतियाँ रची गईं, शपथे ली गईं, शहीदों का गुणगान हुआ और यह सब राष्ट्र के नाम पर हुआ।


एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई, जिसने अपने भू-भाग में रहनेवाले सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए।


आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए और भार तथा नापने की एक समान व्यवस्था लागू की गई।


क्षेत्रिय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और पेरिस में फ्रेंच जैसी बोली और लिखी जाती थी, वही राष्ट्र की साझा भाषा बन गई।


प्रश्न 3. मारीआन और जर्मेनिया कौन थे? जिस तरह उन्हें चित्रित किया गया उसका क्या महत्त्व था?

उत्तर फ्रांसीसी क्रांति के समय कलाकारों ने स्वतंत्रता, न्याय और गणतंत्र जैसे विचारों को व्यक्त करने के लिए नारी प्रतीकों का सहारा लिया इनमें मारीआन और जर्मेनिया अत्यधिक प्रसिद्ध हैं।


मारीआन – यह लोकप्रिय ईसाई नाम है। अतः फ्रांस ने अपने स्वतंत्रता के नारी प्रतीक को यही नाम दिया। यह छवि जन राष्ट्र के विचार का प्रतीक थी। इसके चिह्न स्वतंत्रता व गणतंत्र के प्रतीक लाल टोपी, तिरंगा और कलगी थे। मारीआन । की प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौराहों और अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर लगाई गई ताकि जनता को राष्ट्रीय एकता के राष्ट्रीय प्रतीक की याद आती रहे और वह उससे अपनी तादात्मय (तालमेल) स्थापित कर सके। मारीआन की छवि सिक्कों व डाक टिकटों पर अंकित की गई थी।


जर्मेनिया – यह जर्मन राष्ट्र की नारी रूपक थी। चाक्षुष अभिव्यक्तियों में वह बलूत वृक्ष के पत्तों को मुकुट पहनती है। क्योंकि जर्मनी में बलूत वीरता का प्रतीक है। उसने हाथ में जो तलवार पकड़ी हुई थी उस पर यह लिखा हुआ है “जर्मन तलवार जर्मन राइन की रक्षा करती है। इस प्रकार जर्मेनिया, जर्मनी में स्वतंत्रता, न्याय और गणतंत्र की प्रतीक बन कर उभरी एक नारी छवि थी।


प्रश्न 4. जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ।

उत्तर जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण चरण इस प्रकार हैं _


जर्मनी एकीकरण की माँग के दौरान संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आज़ादी जैसे सिद्धांतों का विकास हुआ।


संसदीय व्यवस्था स्थापित करने की पृष्ठभूमि तैयार की जाने लगी।


जर्मन लोगों में 1848 ई० से ही राष्ट्रीय भावना जागृत हो गई थी। इसमें यहाँ के मध्यम वर्ग का योगदान अधिक है।


उदारवादी विचारधारा के लोगों ने राजशाही और फौजों का कड़ा मुकाबला किया जिसमें वे सफल भी हुए।


इस प्रक्रिया में प्रशा के बड़े भू-स्वामियों ने भी अपना पूर्ण सहयोग दिया।


प्रशा ने इस राष्ट्रीय एकीकरण आंदोलन का नेतृत्व संभाला और उसे नया स्वरूप और नई दिशा प्रदान की।


इस प्रक्रिया के जनक प्रशा के प्रधानमंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क थे। इसमें उन्होंने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद की।


इस प्रक्रिया में प्रशा ने ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस से भी युद्ध किए तथा सफलता प्राप्त की।


18 जनवरी 1871 ई० में, वर्साय में प्रशा के राजा काइज़र विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया | जिससे जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया और अधिक सरल हो गई।


वर्साय के महल के शीशमहल (हॉल ऑफ मिरर्स) में जर्मन राजकुमारों, सेना के प्रतिनिधियों और प्रमुख मंत्री बिस्मार्क ने जर्मन सम्राट काइज़र विलियम प्रथम के नेतृत्व में नवीन जर्मन साम्राज्य निर्माण की महत्त्वपूर्ण घोषणा की।


इस प्रकार जर्मन राष्ट्र का एकीकरण हुआ।


इस प्रक्रिया में प्रशा राज्य एक प्रमुख शक्ति का केन्द्र बना।


प्रश्न 5. अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को ज्यादा कुशल बनाने के लिए नेपोलियन ने क्या बदलाव किए?

उत्तर नेपोलियन के नियंत्रण में जो क्षेत्र आया वहाँ उसने अनेक सुधारों की शुरुआत की। उनके द्वारा किए गए सुधार निम्नलिखित थे


प्राचीन सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक व्यवस्था को नष्ट किया गया।


सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए निम्न व उच्च वर्ग के भेद को खत्म किया गया।


1804 की नेपोलियन संहिता ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए थे। उसने कानून के समक्ष समानता और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया।


समान कर प्रणाली लागू की गई। प्रतिष्ठा मंडल की स्थापना करके विद्वानों, कलाकारों व देशभक्तों को सम्मानित किया गया।


डच गणतंत्र, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया।


सामंती व्यवस्था को खत्म किया और किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई।


शहरों में कारीगरों के श्रेणी संघों के नियंत्रणों को हटा दिया गया। यातायात और संचार व्यवस्थाओं को सुधारा गया।


आर्थिक सुधार करने के उद्देश्य से बैंक ऑफ फ्रांस’ की स्थापना की गई।


उसने दंड विधान को कठोर बनाया तथा जूरी प्रथा व मुद्रित पत्रों को पुनः प्रारंभ किया।


शिक्षा की उन्नति के लिए यूनिर्वसिटी ऑफ फ्रांस की स्थापना की, जहाँ लैटिन, फ्रेंच भाषा, साधारण विज्ञान व गणित की मुख्य तौर पर शिक्षा दी जाती थी।


कैथोलिक धर्म को राजधर्म बनाया। इस प्रकार किसानों, कारीगरों, मजदूरों और नए उद्योगपतियों ने नई-नई मिली आजादी को चखा।


चर्चा करें

प्रश्न 1. उदारवादियों की 1848 की क्रांति का क्या अर्थ लगाया जाता है? उदारवादियों ने किन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया?

उत्तर उदारवादियों की 1848 की क्रांति वास्तव में तब हुई जब कई यूरोपीय देशों में बेरोजगारी, भूखमरी तथा गरीबी का वातावरण था। इस क्रांति को लाने में मध्यम वर्ग का बहुत बड़ा योगदान था, जिस कारण सभी देशों में कई व्यापक परिवर्तन हुए। इनमें प्रमुख राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन इस प्रकार हैं :-

राजनैतिक क्षेत्र में परिवर्तन


राजतंत्र का अंत करके गणतंत्र की स्थापना की गई।


सार्वजनिक मताधिकार के आधार पर निर्मित जन-प्रतिनिधि सभाओं के निर्माण के प्रयास आरंभ हुए।


जर्मनी, इटली, पोलैंड, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्यों में उदारवादी मध्यम वर्गों के स्त्री-पुरुषों ने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग के साथ जोड़ा।


उदारवादियों ने ऐसे राष्ट्र राज्यों के निर्माण की माँग पर जोर दिया जो संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने जैसे संसदीय सिद्धांतों पर आधारित हो।


महिलाओं को राजनैतिक मताधिकार दिए जाने की माँग की जाने लगी।


सामाजिक क्षेत्र में परिवर्तन


महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा दिया जाने लगा तथा उनकी सभी क्षेत्रों में भागीदारी को महत्त्व व सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा।


कुलीन वर्ग की अपेक्षा मध्यम वर्ग के सभी क्षेत्रों (राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक) में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी जिससे कुलीन वर्ग की श्रेष्ठता कम हुई।


आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन


मजदूरों और कारीगरों ने भी अपनी माँगों के लिए प्रदर्शन व आंदोलन का मार्ग अपनाया।


भू-दासता और बंधुआ मजदूरी का अंत किया गया।


बाज़ारों की मुक्ति, चीजों तथा पूँजी के स्वतंत्र आदान-प्रदान की माँग ने जोर पकड़ा ताकि व्यापारिक उन्नति के मार्ग खुलें।


प्रश्न 2. यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को दर्शाने के लिए तीन उदाहरण दें।

उत्तर राष्ट्रवाद के विकास में नवीन परिस्थितियों जैसे कि युद्ध, क्षेत्रीय विस्तार, शिक्षा आदि को जितना योगदान रहा है, उतना ही योगदान संस्कृति का भी रहा है। इसके कई उदाहरण हमें इतिहास में मिलते हैं। इसमें कुछ इस प्रकार हैं


फ्रेडरिक सॉरयू का युटोपिया-1848 ई० में फ्रांस के फ्रेडरिक सॉरयू ने चार चित्रों की एक श्रृंखला बनाई, जिसके

द्वारा विश्वव्यापी प्रजातांत्रिक और सामाजिक गणराज्यों के स्वप्न को साकार रूप देने का प्रयास किया गया। उसने कल्पना पर आधारित आदर्श राज्य या समाज (यूटोपिया) को दर्शाया। इन चित्रों में सभी स्त्री, पुरुषों और बच्चों को स्वतंत्रता की प्रतिमा की वंदना करते हुए दिखाया गया है जिनके हाथों में मशाल व मानव के अधिकारों का घोषणापत्र है। इनमें उनकी पोशाकों को भी राष्ट्रीय आधार देने के लिए एक जैसी रखी गई तिरंगे झंडे, भाषा व राष्ट्रगान द्वारा भी राष्ट्र राज्य के रूप को प्रकट करने का प्रयास किया गया।


कार्लकैस्पर फ्रिट्ज़ का स्वतंत्रता के वृक्ष का रोपण-जर्मन चित्रकार कोर्लकैस्पर फ्रिट्ज ने स्वतंत्रता के वृक्ष का रोपण करते हुए एक चित्र बनाया है। इसकी पृष्ठभूमि में फ्रेंच सेनाओं को ज्वेब्रेकन राज्य पर कब्जा करते हुए दिखाया गया। इसमें फ्रांसीसी सैनिकों को नीली, सफेद व लाल पोशाकों में दिखाया गया है जो वहाँ के नागरिकों का दमन कर रहे हैं जैसे किसी किसान की गाड़ी छीन रहे हैं, कुछ महिलाओं को तंग कर रहे हैं या किसी को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर रहे हैं। अतः शोषितों द्वारा जो स्वतंत्रता का वृक्ष रोपते हुए दर्शाया गया है उस पर एक तख्ती लगी है जिस पर जर्मन में लिखा हुआ है-”हमसे आज़ादी और समानता ले लो-यह मानवता का आदर्श रूप है।” यह एक तरह से फ्रांसीसियों पर किया गया व्यंग्य था क्योंकि वे कहते थे कि वे जहाँ जाते हैं वहाँ राजतंत्र का अंत करके नई आदर्श व्यवस्था कायम करते हैं यानि वे मुक्तिदाता हैं।


यूजीन देलाक़ोआ की ‘द मसैकर ऐट किऑस’-फ्रांस के रूमानीवादी चित्रकार देलाक़ोआ ने एक चित्र बनाया था। इसमें उस घटना को चित्रित किया गया है जब तुर्को ने 20,000 यूनानियों को मार डाला था। इसे किऑस द्वीप कहा जाता है। इसमें महिलाओं व बच्चों की पीड़ा को केन्द्र बिंदु बनाया गया है जिसे चटकीले रंगों से रंगा गया है। ताकि देखने वालों की भावनाएं जागृत हों और उनके मन में यूनानियों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो। इस प्रकार कलाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद को उभारा और संस्कृति का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।


प्रश्न 3. किन्हीं दो देशों पर ध्यान केंद्रित करते हुए बताएँ कि 19वीं सदी में राष्ट्र किस प्रकार विकसित हुए?

उत्तर 19वीं शताब्दी में लगभग पूरे यूरोप में राष्ट्रीयता का विकास हुआ जिस कारण राष्ट्र राज्यों का उदय हुआ। इनमें बेल्जियम व पोलैंड भी ऐसे ही देश थे।

1815 ई० में नेपोलियन की हार के बाद वियना संधि द्वारा बेल्जियम और पोलैंड को मनमाने तरीके से अन्य देशों के साथ जोड़ दिया गया। जिनका आधार यूरोपीय सरकारों की यह रूढ़िवादी विचारधारा थी कि राज्य व समाज की स्थापित पारंपरिक संस्थाएँ जैसे राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार बने रहने चाहिए। इसका बेल्जियम व पोलैंड ने विरोध किया। अपने को स्वतंत्र राष्ट्र राज्य के रूप में स्थापित किया। इनका निर्माण इस प्रकार हुआ :-


बेल्जियम – वियना कांग्रेस द्वारा बेल्जियम को हॉलैंड के साथ मिला दिया गया। परंतु दोनों देशों में ईसाई धर्म के कट्टर । विरोधी मतानुयायी रहते थे। जहाँ बेल्जियम में कैथोलिक थे वहाँ हॉलैंड में प्रोटेस्टेंट। हॉलैंड का शासक भी हॉलैंड वासियों को बेल्जियमवासियों से श्रेष्ठ मानता था। अतः इस श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए उसने सभी स्कूलों में प्रोटेस्टेंट धर्म की शिक्षा देने की राजाज्ञा जारी की। इसका बेल्जियमवासियों ने कड़ा विरोध किया, इसमें इंग्लैंड ने भी उनका साथ दिया जिस कारण हॉलैंड को बेल्जियम को 1830 में स्वतंत्र करना पड़ा। बाद में यहाँ पर इंग्लैंड जैसी संवैधानिक व्यवस्था कायम हुई।


पोलैंड – वियना संधि द्वारा ही पोलैंड को दो भागों में बाँटा गया और इसका बड़ा भाग रूस को ईनाम के तौर पर दे दिया

गया। परंतु जब वहाँ के लोगों में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ तो 1848 में पोलैंड में, वारसा में, क्रांति आरंभ हुई। इसे रूसी सेनाओं ने कठोरता से दबा दिया। परंतु राष्ट्रवादियों ने हार नहीं मानी और दुबारा विद्रोह किया जिसमें उन्हें सफलता मिली।


प्रश्न 4. ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का विकास एक लंबी संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा हुआ। इसमें किसी प्रकार की रक्तरंजित क्रांति नहीं हुई। अतः इस प्रक्रिया को आमतौर पर हम ‘रक्तहीन क्रांति’ के नाम से भी जानते हैं। यह प्रक्रिया इस प्रकार है


18वीं शताब्दी से पूर्व ब्रितानी एक राष्ट्र नहीं था। जबकि ब्रितानी द्वीप समूह में-अंग्रेज, वेल्श, स्कॉट या आयरिश | पहचान वाली नृजातीय समूह रहते थे जिनकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक व राजनैतिक परंपराएँ थीं।


इनमें आंग्ल राष्ट्र ने अपनी धन-दौलत, अहमियत और सत्ता के बल पर अन्य द्वीप समूह के राष्ट्रों पर अपना प्रभाव स्थापित करना प्रारंभ किया।


1688 ई० में एक लंबे संघर्ष के माध्यम से राजतंत्र की समस्त शक्ति आंग्ल संसद के अधीन आ गई और एक राष्ट्र का निर्माण किया गया जिसका केन्द्र इंग्लैंड था।


इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच एक्ट ऑफ यूनियन 1707 ई० में हुआ जिसके द्वारा यूनाइटेड किंग्डम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन का गठन किया गया। इसी के माध्यम से स्कॉटलैंड पर इंग्लैंड का प्रभुत्व स्थापित हो गया।


स्कॉटलैंड में ब्रितानी पहचान का विकास करने के लिए यहाँ की संस्कृति व राजनैतिक संस्थाओं को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया गया। जैसे-स्कॉटिश हाइलैंड्स के वासियों को उनकी गेलिक भाषा बोलने और राष्ट्रीय पोशाक पहनने से रोका गया। इस कारण मजबूर होकर लोगों को अपना देश छोड़कर अन्य जगहों पर जाना पड़ा।


आयरलैंड में भी ऐसा किया गया और यहाँ पर अंग्रेजों ने धार्मिक मतभेद को हथियार बनाया। आयरलैंड में कैथोलिक व प्रोटेस्टेंट दो धार्मिक गुट थे। अंग्रेजों ने प्रोटेस्टेंटों की मदद करके कैथोलिकों को दबाया।


1798 ई० में वोल्फ़ टोन और उसकी यूनाइटेड आयरिशमेन नेतृत्व में जो विद्रोह हुआ उसे दबा दिया गया और आयरलैंड को यूनाइटेड किंग्डम का भाग बना लिया गया।


ब्रितानी राष्ट्र का निर्माण करके इसके राष्ट्रीय प्रतीकों- यूनियन जॅक (ब्रिटेन का झंडा) और गॉड सेव आवर नोबल किंग (राष्ट्रीय गान) को संपूर्ण यूनाइटेड किंग्डम में प्रचारित व प्रसारित किया गया।


प्रश्न 5. बाल्कन प्रदेशों में राष्ट्रवादी तनाव क्यों पनपा?

उत्तर 1871 ई० के बाद बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रवाद का उदय हुआ क्योंकि


इस क्षेत्र की अपनी भौगोलिक व जातीय भिन्नता थी।


इस क्षेत्र में आधुनिक यूनान, रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्वेरिया, मेसिडोनिया, क्रोएशिया, बोस्निया-हर्जेगोविना, स्लोवेनिया, सर्बिया, मॉन्टिनिग्रो आदि देश थे जहाँ पर स्लाव भाषा बोलने वाले लोग रहते थे। ये सभी तुर्को से भिन्न थे।


तुर्को और इन ईसाई प्रजातियों के बीच मतभेदों के कारण यहाँ पर हालात भयंकर हो गए।


जब स्लाव राष्ट्रीय समूहों में स्वतंत्रता व राष्ट्रवाद का विकास हुआ तो तनाव की स्थिति और भी भयंकर हो गई।


इस कारण इन राज्यों में आपसी प्रतिस्पर्धा और हथियारों की होड़ लग गई । इसने स्थिति को और गंभीर बना दिया।


यूरोपीय देश (रूस, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी) भी इन क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे ताकि काला सागर से होने वाले व्यापार और व्यापारिक मार्ग पर उनका नियंत्रण हो।


उपरोक्त कारणों से इस क्षेत्र में यूरोपीय देशों और इन राज्यों में आपस में कई युद्ध हुए, जिसका अंतिम परिणाम प्रथम विश्व युद्ध के रूप में सामने आया।

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 2 The Nationalist Movement in Indo-China (इंडो-चाइना में राष्ट्रवादी आंदोलन)



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प्रश्न अभ्यास

पाठ्यपुस्तक से

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें

(क) उपनिवेशकारों के सभ्यता मिशन का क्या अर्थ था?

(ख) हुइन फू सो।

उत्तर

(क) उपनिवेशवाद में आर्थिक शोषण के अतिरिक्त उपनिवेशों को सभ्य बनाने का विचार भी काम कर रहा था। जिस तरह भारत के अंग्रेज़ दावा करते थे, उसी प्रकार फ्रांसीसियों का दावा था कि वे वियतनाम के लोगों को आधुनिक सभ्यता से परिचित करा रहे हैं। उनका विश्वास था कि यूरोप में सबसे विकसित सभ्यता कायम हो चुकी है। इसलिए वे मानते थे कि उपनिवेशों में आधुनिक विचारों का प्रसार करना यूरोपियों को ही दायित्व है और इस दायित्व की पूर्ति करने के लिए अगर उन्हें स्थानीय संस्कृतियों, धर्मों व परंपराओं को भी नष्ट करना पड़े तो इसमें कोई बुराई नहीं है। वैसे भी यूरोपीय शासक इन संस्कृतियों, धर्मों, परंपराओं को पुराना व बेकार मानते थे। उन्हें लगता था कि ये चीजें आधुनिक विकास को रोकती हैं।

(ख) हुइन फू सो-हुइन फू सो ‘होआ हाओ’ आंदोलन के संस्थापक थे। यह आंदोलन 1939 में शुरू हुआ था। यह आंदोलन 19वीं सदी के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों में उपजे विचारों से प्रेरित था । हुइन फू सो जादू-येना और गरीबों की मदद किया करते थे। व्यर्थ के खर्चे के खिलाफ़ उनके उपदेशों का लोगों पर काफी असर था। वे बालिका वधुओं की खरीद-फरोख्त, शराब व अफ़ीम के प्रबल विरोधी थे। फ्रांसीसियों ने हुइन फू सो के आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया। उन्होंने फू सो को पागल घोषित कर दिया। फ्रांसीसी उन्हें पागल बोन्जे कहकर बुलाते थे। 1914 में फ्रांसीसी डॉक्टरों ने मान लिया कि वे पागल नहीं हैं। इसके बाद उन्हें वियतनाम से निष्कासित करके लाओस भेज दिया।

प्रश्न 2. निम्नलिखित की व्याख्या करें


(क) वियतनाम के केवल एक-तिहाई विद्यार्थी ही स्कूली पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी कर पाते थे।


(ख) फ्रांसीसियों ने मेकोंग डेल्टा क्षेत्र में नहरें बनवाना और जमीनों को सुखाना शुरू किया।


(ग) सरकार ने आदेश दिया कि साइगॉन नेटिव गर्ल्स स्कूल उस लड़की को वापस कक्षा में ले, जिसे स्कूल से निकाल दिया गया था।


(घ) हनोई के आधुनिक नवनिर्मित इलाकों में चूहे बहुत थे।


उत्तर (क) वियतनाम में स्कूलों में दाखिला लेने की ताकत वहाँ के धनी वर्ग के पास ही थी। यह देश की आबादी का एक छोटा हिस्सा था। जो स्कूल में दाखिला ले पाते थे, उनमें से बहुत थोड़े से विद्यार्थी ही ऐसे होते थे जो सफलतापूर्वक स्कूल की पढ़ाई पूरी कर पाते थे। दरअसल बहुत सारे बच्चों को तो आखिरी साल की परीक्षा में जानबूझ कर फेल कर दिया जाता था ताकि वे अच्छी नौकरियों के लिए योग्यता प्राप्त न कर सकें। आमतौर पर दो-तिहाई विद्यार्थियों को इसी तरह फेल कर दिया जाता था। 1925 में 1.7 करोड़ की आबादी में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने वालों की संख्या 400 से भी कम थी।

(ख) फ्रांसीसियों ने वियतनाम के मेकोंग डेल्टा इलाके में खेती बढ़ाने के लिए सबसे पहले वहाँ नहरें बनवाईं और जमीनों को सुखाने के लिए जल निकासी का प्रबंध शुरू किया। सिंचाई की विशाल व्यवस्था बनाई गई। बहुत सारी नई नहरें और भूमिगत जल-धाराएँ बनाई गईं। ज्यादातर लोगों को जबरदस्ती काम पर लगाकर निर्मित की गई इस व्यवस्था से चावल के उत्पादन में वृद्धि हुई।

(ग) 1926 में साइगॉन नेटिव गर्ल्स स्कूल में एक बड़ा आंदोलन हुआ। यह आंदोलन तब शुरू हुआ जब एक कक्षा में अगली सीट पर बैठी वियतनामी लड़की को पिछली कतार में जाकर बैठने के लिए कहा गया क्योंकि अगली सीट पर एक फ्रांसीसी लड़की को बैठना था। वियतनामी लड़की ने सीट छोड़ने से इनकार कर दिया। स्कूल का प्रिंसिपल एक फ्रांसीसी था। उसने, उस लड़की को स्कूल से निकाल दिया। अन्य विद्यार्थियों ने भी जब प्रिंसिपल के फैसले का विरोध किया तो उन्हें भी स्कूल से निकाल दिया गया। इसके बाद यह विवाद बहुत फैल गया। हालात बेकाबू होने लगे तो सरकार ने आदेश दिया कि लड़की को दोबारा स्कूल में वापस ले लिया जाए। प्रिंसिपल ने लड़की को दाखिला तो दे दिया लेकिन ये ऐलान भी कर दिया कि ”मैं सारे वियतनामियों को पाँव तले कुचल कर रख दूंगा।”

(घ) हनोई के फ्रांसीसी आबादी वाले हिस्से को एक खूबसूरत और साफ-सुथरे शहर के रूप में बनाया गया था। वहाँ चौड़ी सड़कें थीं और जल-निकासी का बढ़िया इंतजाम था। शहर के आधुनिक भाग में लगे विशाल सीवर आधुनिकता का प्रतीक थे। यही सीवर चूहों को पनपने के लिए भी आदर्श स्थान साबित हुए। ये सीवर चूहों की निर्बाध आवाजाही के लिए भी उचित थे। इनमें चलते हुए चूहे पूरे शहर में बेखटके घूमते थे और इन्हीं पाइपों के रास्ते चूहे फ्रांसीसियों के चाक-चौबंद घरों में घुसने लगे।

प्रश्न 3. टोंकिन फ्री स्कूल की स्थापना के पीछे कौन-से विचार थे? वियतनाम में औपनिवेशिक विचारों के लिहाज से यह उदाहरण कितना सटीक है?

उत्तर 1907 में येकिन फ्री स्कूल की स्थापना की गई। इस स्कूल के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार थे


पश्चिमी ढंग से शिक्षा देना था।


इस शिक्षा में विज्ञान, स्वच्छता और फ्रांसीसी भाषा की कक्षाएँ भी शामिल थीं।


यह वियतनाम में औपनिवेशिक विचारों का सटीक उदाहरण है क्योंकि स्कूल की राय में सिर्फ विज्ञान और पश्चिमी | विचारों की शिक्षा प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं था, बल्कि आधुनिक बनने के लिए वियतनामियों को पश्चिम के लोगों जैसी ही दिखना भी पड़ेगा।


यह स्कूल अपने छात्रों को पश्चिमी शैलियों को अपनाने के लिए उकसाता था। बच्चों को छोटे-छोटे बाल रखने की | सलाह दी जाती थी। वियतनामियों के लिए यह अपनी पहचान को पूरी तरह बदल डालने वाली बात थी। वे तो पारंपरिक रूप से लंबे ही बाल रखते थे।


प्रश्न 4. वियतनाम के बारे में फान यू त्रिन्ह का उद्देश्य क्या था? फान बोई चाऊ और उनके विचारों में क्या भिन्नता थी?

उत्तर फान यू त्रिन्ह वियतनाम के प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं में से एक थे। वे राजशाही या राजतंत्र के कट्टर विरोधी थे। उन्हें यह

स्वीकार नहीं था कि फ्रांसीसियों को देश से निकालने के लिए शाही दरबार या राजा की सहायता ली जाए। वे एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना चाहते थे। पश्चिम के लोकतांत्रिक आदर्शों से प्रभावित चिन्ह पश्चिमी सभ्यता को पूरी तरह खत्म करने के खिलाफ़ थे। उन्हें मुक्ति के फ्रांसीसी क्रांतिकारी आदर्श तो पसंद थे, लेकिन उनका आरोप था कि खुद फ्रांसीसी ही उन आदर्शों का अनुसरण नहीं कर रहे हैं। उनकी माँग थी कि फ्रांसीसी शासक वियतनाम में वैधानिक एवं शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करें और कृषि व उद्योगों का विकास करें।

फान बोई चाऊ भी एक राष्ट्रवादी नेता थे। इन्होंने 1903 में रेवोल्यूशनरी सोसायटी नामक पार्टी का गठन किया और तभी से वे उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के अहम नेता बने गए थे। इनके विचार फान बोई चाऊ से विपरीत थे। त्रिन्ह राजशाही को उखाड़ फेंकना चाहते थे, जबकि बोई चाऊ चाहते थे कि औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के लिए राजशाही का प्रयोग किया जाए। त्रिन्ह की योजना थी कि लोगों को राजशाही के खिलाफ़ खड़ा किया जाए और फान बोई चाऊ इस योजना से असहमत थे । वास्तव में दोनों का लक्ष्य एक ही था लेकिन रास्ते अलग-अलग थे।

चर्चा करें

प्रश्न 1. इस अध्याय में आपने जो पढ़ा है, उसके हवाले से वियतनाम की संस्कृति और जीवन पर चीन के प्रभावों की चर्चा करें।

उत्तर इस अध्याय के आधार पर देखें तो वियतनाम की संस्कृति और जीवन पर चीन का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है, जो इस प्रकार है


वियतनाम के प्रारंभिक इतिहास को देखें तो पता चलता है कि पहले यहाँ बहुत सारे समाज रहते.थे और पूरे इलाके | पर शक्तिशाली चीनी साम्राज्य का वर्चस्व था। जब वहाँ स्वतंत्र देश की स्थापना कर ली गई तो भी वहाँ के शासकों ने न केवल चीनी शासन व्यवस्था को बल्कि चीनी संस्कृति को भी अपनाए रखा।


वियतनाम समुद्री सिल्क रूट से भी जुड़ा हुआ था। इस कारण उसके चीन के साथ आर्थिक संबंध भी थे। इस रास्ते | से वस्तुओं, लोगों और विचारों को चीन के साथ आदान-प्रदान चलता रहता था।


इन दोनों देशों में बौद्ध धर्म और कन्फ्युशियस धर्म प्रमुख रहे जिन्होंने दोनों देशों के आपसी संबंधों को काफी मजबूत बना दिया।


वियतनाम का अभिजात वर्ग चीनी भाषा और कन्फ्यूशिसवाद की शिक्षा लेते थे।


साम्राज्यवादी शक्तियों ने जब रेल, सड़क आदि के माध्यम से इन दोनों देशों को एक प्रशासनिक नियंत्रण में लाने का प्रयास किया तो ये देश और निकट आ गए।


विदेशी साम्राज्यवाद का मुकाबला करने के लिए दोनों को एक जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिससे इनके संबंध और घनिष्ठ हो गए।

इस प्रकार धीरे-धीरे वियतनाम ने चीन की संस्कृति में अपने आपको रंग लिया।


प्रश्न 2. वियतनाम में उपनिवेशवाद विरोधी भावनाओं के विकास में धार्मिक संगठनों की भूमिका क्या थी?

उत्तर वियतनामियों में धार्मिक विश्वास बौद्ध धर्म, कन्फ्यूशियसवाद और स्थानीय रीति-रिवाजों पर आधारित थे। फ्रांसीसी मिशनरी वियतनाम में ईसाई धर्म के बीज बोने का प्रयास कर रहे थे। 18वीं सदी से ही बहुत सारे धार्मिक आंदोलन पश्चिमी शक्तियों के प्रभाव और उपस्थिति के खिलाफ़ जागृति फैलाने का प्रयास कर रहे थे। इसके दो उदाहरण ये हैं


स्कॉलर्स रिवोल्ट – 1868 का स्कॉलर्स रिवोल्ट फ्रांसीसी कब्जे और ईसाई धर्म के प्रसार के खिलाफ़ शुरुआती आंदोलनों में से था। इस आंदोलन की बागडोर शाही दरबार के अफसरों के हाथों में थी। ये अफ़सर कैथोलिक धर्म और फ्रांसीसी सत्ता के प्रसार से नाराज थे। इन्होंने एक हजार से ज्यादा ईसाइयों का कत्ल कर डाला। कैथोलिक मिशनरी 17 वीं सदी के शुरू से ही स्थानीय लोगों को ईसाई धर्म से जोड़ने में लगे हुए थे। 18वीं सदी के अंत तक उन्होंने लगभग 3 लाख लोगों को ईसाई बना लिया था। फ्रांसीसियों ने 1868 के आंदोलन को तो कुचल दिया, किंतु इस बगावत ने देशभक्तों में उत्साह का संचार जरूर किया।


होआ हाओ आंदोलन – यह आंदोलन 1939 में शुरू हुआ था। यह एक ऐसा धार्मिक आंदोलन था जो औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध चलने वाले आंदोलनों का पक्षधर था । हरे-भरे मेकोंग डेल्टा इलाके में इसे भारी लोकप्रियता मिली। इस आंदोलन के संस्थापक का नाम हुइन्ह फू सो था। वे जादू-टोना और गरीबों की मदद किया करते थे। फ्रांसीसियों ने इस आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया।

इस तरह के आंदोलनों का राष्ट्रवाद की मुख्यधारा के साथ अंतर्विरोध संबंध रहता था। राजनीतिक दल ऐसे आंदोलनों से जुड़े जन-समर्थन का फायदा उठाने की तो कोशिश करते थे, लेकिन उनकी गतिविधि से बेचैन भी रहते थे।


इसके बावजूद साम्राज्यवादी भावनाओं को झकझोरने में ऐसे आंदोलनों के योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता।

प्रश्न 3. वियतनाम युद्ध में अमेरिकी हिस्सेदारी के कारणों की व्याख्या करें । अमेरिका के इस कृत्य से अमेरिका में जीवन पर क्या-क्या असर पड़े?

उत्तर वियतनाम युद्ध में अमेरिका की हिस्सेदारी के प्रमुख कारण इस प्रकार थे –


अमेरिका के नीति निर्माता इस बात से परेशान थे कि अगर यहाँ पर हो ची मिन्ह की सरकार अपने प्रयासों में सफल हो गई तो यहाँ पर इस क्षेत्र के आस-पास के देशों में भी साम्यवादी सरकारें स्थापित हो जायेंगी।


इससे एशिया महाद्वीप में साम्यवादी विचारधारा को मजबूत आधार मिल जाएगा और पूँजीवादी देश अन्य नए | साम्राज्यवादी हितों को इस महाद्वीप में पूरा नहीं कर सकेंगे।


अमेरिका ने फ्रांस की इस युद्ध में मदद इसलिए भी की कि वह विश्व के अन्य देशों को यह बताना चाहता था कि वह | पूँजीवादी देशों का सबसे बड़ा शुभचिंतक है। अत: हर विपत्ति के समय में वह उनकी यथासंभव मदद करेगा।


अमेरिका वियतनाम के एकीकरण के पक्ष में भी नहीं था। अतः जब ‘हो ची मिन्ह’ के नेतृत्व वाली सरकार की सहायता से ‘एन.एल.एफ’ (नेशनल लिबरेशन फ्रंट) ने देश के एकीकरण की आवाज उठाई, तो अमेरिका इसकी बढ़ती ताकत व प्रस्तावों से भयभीत हो गया तथा सोचने लगा कि कहीं पूरे वियतनाम पर साम्यवादियों को प्रभाव न बढ़ जाए। इसलिए इसने उ० वियतनाम में अपनी फौजें और युद्ध सामग्री एकत्र करनी प्रारंभ कर दी।


जब अमेरिका युद्ध में फ्रांस की मदद के लिए सम्मिलित हो गया, तब इसका प्रभाव वियतनामियों के साथ-साथ अमेरिका पर भी पड़ा। उसे भयंकर क्षति उठानी पड़ी। इस युद्ध में उसके 47,244 सैनिक मारे गए और 3,03,704 घायल हुए। अमेरिकी सरकार को अपनी ही जनता के विरोध का सामना इस प्रकार से करना पड़ा


ज्यादातर अमेरिकी यह मानते थे कि उनका देश एक ऐसे युद्ध में अपनी सैन्य शक्ति नष्ट कर रहा है जिसे जीतना संभव नहीं है।


अमेरिकी जनता का यह भी मानना था कि यदि अमेरिका इस युद्ध में हारा तो विश्व में उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचेगी, अत: अमेरिका को युद्ध से हट जाना चाहिए।


युद्ध में सैनिकों की आवश्यकता पूर्ति के लिए अमेरिका में उन युवाओं को भर्ती किया जा रहा था जो अल्पसंख्यक और गरीब वर्ग से संबंधित थे। अमेरिका के अभिजात वर्ग के युवाओं को युद्ध से दूर रखा जा रहा था। इससे अमेरिका के अंदर अमेरिकी समाज में तनाव उत्पन्न हो गया जिससे सरकार को गृहयुद्ध का भय होने लगा।


अमेरिकी मीडिया और फिल्म निर्माण क्षेत्रों में भी वियतनामी युद्ध की पृष्ठभूमि पर कई फिल्में बनीं जिससे अमेरिकी जनमत भी वियतनाम की तरफ झुकने लगा।


अंतत: अमेरिका में ही इस युद्ध के कारण काफी तनाव उत्पन्न हो गया।

प्रश्न 4. अमेरिका के खिलाफ वियतनामी युद्ध का निम्नलिखित दृष्टिकोण से मूल्यांकन कीजिए

(क) हो-ची-मिन्ह भूल-भूलैया मार्ग पर माल ढोने वाला कुली

(ख) एक महिला सिपाही

उत्तर

(क) हो-ची-मिन्ह भूल-भूलैया मार्ग पर माल ढोने वाले कुली की भूमिका – अमेरिका और वियतनाम के युद्ध में हो-ची-मिन्ह भूल-भूलैया मार्ग पर माल ढोने वाले कुलियों ने युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस मार्ग का प्रयोग देश के उत्तर से दक्षिण की ओर सैनिक व रसद पहुँचाने के लिए होता था जिससे वियतनामी सैनिक अमेरिका का मुकाबला कर पाये। इस मार्ग पर सामान पहुँचाने वाले कुली लगभग 25 किलो सामान पीठ पर या 70 किलो सामान साईकिलों पर लेकर निकल जाते थे। अमेरिकी सेना ने वियतनामी सैनिकों के लिए रसद की आपूर्ति को बंद करने के लिए कई बार इस मार्ग पर बम बरसाए। किंतु वे इसे ध्वस्त नहीं कर पाए क्योंकि वहाँ के लोग हर हमले के बाद उसकी फौरन मरम्मत कर लेते थे। इससे पता चलता है कि वियतनाम के लोग अपने सीमित संसाधनों को सूझबूझ से प्रयोग करना जानते थे।

(ख) एक महिला सैनिक – त्रियू अयू: विश्व के लगभग प्रत्येक देश में जहाँ पर राष्ट्रवादी आंदोलन हुए, महिलाओं की छवि को एक योद्धा के रूप में चित्रित करके जन प्रेरणा के लिए उसका प्रयोग हुआ। वियतनाम में भी एक ऐसी ही महिला ‘त्रियू अयू’ थी। इनको जन्म तीसरी सदी में हुआ था । वह बचपन में ही अनाथ हो गई थी। इस कारण वह अपने भाई के साथ रहने लगी। जब वे बड़ी हुईं तो इन्होंने अपना घर छोड़ दिया और जंगल में रहने लगीं। यहां इन्होंने एक विशाल सेना का गठन किया और चीनियों के वर्चस्व को चुनौती दी । जब उनकी सेना इस संघर्ष में हार गई, तो इन्होंने जल में डूबकर अपनी जान दे दी। इस प्रकार वियतनामी मानसम्मान की रक्षा करने वाली वे एक शहीद ही नहीं कहलाईं, बल्कि एक देवी की तरह पूजी भी गईं। राष्ट्रवादियों ने इनकी छवि का प्रयोग वियतनामी और अमेरिकी युद्ध में जनता में साहस की भावना उत्पन्न करने के लिए किया।

प्रश्न 5. वियतनाम में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं की क्या भूमिका थी? इसकी तुलना भारतीय राष्ट्रवादी संघर्ष में महिलाओं की भूमिका से कीजिए।

उत्तर वियतनाम में साम्राज्यवादी विरोधी संघर्ष में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ प्रतिरोध आंदोलन में शामिल हो गईं। वे घायलों की मरहम पट्टी करने, भूमिगत कमरे व सुरंगे बनाने और दुश्मनों से मोर्चा लेने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगीं। उन्होंने छह हवाई पटियाँ बनाई, दस हजार बमों को बेकार किया, हजारों किलो माल ढोया, हथियार व गोला बारुद की सप्लाई जारी रखी और और 15 जहाजों को मार गिराया। 1965-75 के दौरान इस मार्ग पर चलने वाले युवाओं में 70-80 प्रतिशत लड़कियाँ थीं। एक सैनिक इतिहासकार के अनुसार वियतनामी सेना में 15 लाख महिलाएँ थीं। इन सबने इस संघर्ष में अद्वितीय साहस का परिचय दिया था।

राष्ट्रवादी भारतीय महिलाओं की वियतनामी राष्ट्रवादी महिलाओं से तुलना – भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। परंतु इनके विरोध के तरीके वियतनामी महिलाओं से भिन्न थे। जैसे –


1857 के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध में सम्मिलित होकर और लखनऊ की बेगम ज़ीनत महल ने महल में ही रहकर अपनी सेना का नेतृत्व किया।


भारतीय महिलाओं ने युद्धों की बजाए जन आंदोलनों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाई, जैसे-होमरूल आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि।


भारतीय महिलाओं के संघर्ष का तरीका शांतिपूर्ण विरोध करने का था। धरने पर बैठना और जलसों के आयोजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना आदि उनका प्रमुख कार्य था।


यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं ने शांतिपूर्ण मार्ग अपनाकर अपना विरोध ब्रिटिश शासन के प्रति प्रकट | किया, परंतु जब आज़ाद हिंद फौज का सुभाषचंद्र बोस जी ने गठन किया तो भारतीय महिलाएं इसमें भी भर्ती हुईं। इस प्रकार भारतीय महिलाओं ने शांतिपूर्ण विरोध के मार्ग को अधिक अपनाया था।


परियोजना कार्य

प्रश्न 1. दक्षिण अमेरिका के किसी एक देश में साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के बारे में पता लगाएँ । कल्पना कीजिए कि इस देश का एक स्वतंत्रता सेनानी वियेतमिन्ह के एक सिपाही से मिलता है; वे दोस्त बन जाते हैं और अपने-अपने देश में स्वतंत्रता संघर्षों के अनुभवों की चर्चा करने लगते हैं। उनके बीच क्या बातचीत हो सकती है, उसे लिखें।

उत्तर जब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सभी उपनिवेशो में साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष प्रारंभ हुआ तब संघर्ष द० अमेरिका (लैटिन अमेरिका) के देशों में भी हुआ। यहाँ पर इन देशों की स्वतंत्र सरकारें बनीं । यहाँ के देश हैं-अर्जेण्टाइना, चिली, उरूग्वे, परागुआ और क्यूबा। अर्जेण्टाइना का साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन


द० अमेरिका के इतिहास में अर्जेण्टाइना में नए शासन की स्थापना एक नवयुग का श्री गणेश था।


24 फरवरी, 1946 को जे.डी. पेरा के नेतृत्व में नई सरकार बनी। वे स्वयं राष्ट्रपति नियुक्त हुए।


सरकार को जन साधारण का समर्थन प्राप्त था।


पेरा ने अपने देश के आर्थिक विकास के लिए कई जनहित कार्य किए। जैसे उद्योगों की प्रगति, रेल, टेलिफोन का विकास आदि।


देश की सुरक्षा के लिए सैनिक सुदृढ़ता के कार्य भी किए गए।


14 सितंबर 1953 को पेरा के विरुद्ध सैनिक विद्रोह हुआ और यहाँ पर सैनिक शासन की स्थापना हुई।


जब दोनों देशों के सैनिक आपस में एक दूसरे से मिलेंगे तो वे संभवत: यह बातचीत करेंगे


दोनों अपने-अपने देशों में अमेरिका के विरुद्ध संघर्ष के बारे में बात करेंगे कि कैसे उनके देश के लोगों ने अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देकर उसे हराया।


वियतनामी सैनिक जब अर्जेण्टाइना के सैनिकों को अपने देश के छात्रों, महिलाओं के योगदान के विषय में बताएगा | तो अर्जेण्टाइना का सैनिक भी बताएगा कि उसके देश में भी इन वर्गों ने संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।


वियतनामी सैनिक संघर्ष के बाद स्थापित हुई सरकार के विषय में भी बता सकता है। अर्जेण्टाइना का सैनिक भी | बताएगा कि उसके देश की नई सरकार ने भी कई जनहित कार्य किए हैं ताकि देश का विकास हो सके।

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 3 Nationalism in India (भारत में राष्ट्रवाद)


 

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 3 Nationalism in India (भारत में राष्ट्रवाद)


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प्रश्न अभ्यास

पाठ्यपुस्तक से

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. व्याख्या करें

(क) उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई क्यों थी?

(ख) पहले विश्व युद्ध ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया?

(ग) भारत के लोग रॉलट एक्ट के विरोध में क्यों थे?

(घ) गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का फैसला क्यों लिया?

उत्तर

(क) आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय की परिघटना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी। क्योंकि


औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ़ संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे।


उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बाँध दिया था।


वियतनाम, चीन, बर्मा, भारत और लैटिन तथा अफ्रीकी देशों में राष्ट्रीय आंदोलन उनके सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक शोषण के कारण प्रारंभ हुए। इनमें राष्ट्रीय भावनाओं का विकास हुआ तथा उन्होंने उपनिवेशवाद को पूरे विश्व से हटा दिया।


इस कारण राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के कारण हुआ। उपनिवेशिक देश उपनिवेशवाद का विरोध करने के लिए एकजुट हुए, औपनिवेशिक शासन का विरोध किया तथा अपने देश के हित के लिए एकजुट होकर लड़े। इससे राष्ट्रवाद को पनपने में मदद मिली।

(ख) प्रथम विश्वयुद्ध 1 अगस्त 1914 ई० में मित्रराष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जापान, अमेरिका) तथा धुरी राष्ट्रों (आस्ट्रिया-हंगरी, जर्मनी, तुर्की, इटली) के मध्य प्रारंभ हुआ। इसका भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन पर व्यापक प्रभाव पड़ा, जो इस प्रकार है –


भारतीयों का विश्व से संपर्क – इस युद्ध में सैनिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए बड़ी संख्या में भारतीयों को सेना में भर्ती किया गया। जब वे युद्ध क्षेत्रों में गए तो वहां से मिले अनुभवों का उनपर प्रभाव पड़ा, और उनमें आत्मविश्वास जागा। उन्होंने यह भी जाना कि स्वतंत्र वातावरण और लोकतंत्रीय संगठन क्या होते हैं? अत: वे ऐसी ही स्थिति भारत में भी विकसित या स्थापित करने के लिए तत्पर हो गए।


आर्थिक प्रभाव – युद्ध के कारण ब्रिटेन की रक्षा व्यय बढ़ गया। इसे पूरा करने के लिए उसने अमेरिका जैसे देशों से कर्जे लिए। इन कर्जी को चुकाने के लिए भारतीयों पर सीमा शुल्क और अन्य टैक्स बढ़ा दिए। इस कारण भारतीयों पर आर्थिक दबाव बढ़ा । इसी समय कीमतें भी बढ़ जाने से भारतीयों की आम आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई। अत: आम भारतीय जनता अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हो गई।


सांप्रदायिक एकता – ‘खलीफा’ के प्रश्न पर सभी मुसलमान अंग्रेजों के विरूद्ध हो गए। जब गांधी जी ने अली बंधुओं के सहयोग के लिए खिलाफत आंदोलन प्रारंभ किया तो हिंदु-मुस्लिम एकता को बल मिला। साथ ही 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य “लखनऊ समझौता” हो गया। इस कारण भारत में सांप्रदायिक एकता को मजबूत आधार प्राप्त हुआ और राष्ट्रवादी आंदोलन का जनाधार बढ़ा।


प्राकृतिक संकट – 1918-21 ई० के मध्य भारत में अकाल, सूखा, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ पड़ीं जिनमें सरकार का रवैया असहयोग पूर्ण था। आम जनता महामारियों का शिकार हो रही थी, और सरकार इनसे निपटने के लिए कोई खास प्रयास नहीं कर रही थी। इस कारण भारतीय अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध एकजुट हो गए।


डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट – 1915 ई० में अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों को रोकने के लिए ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ पास किया। यह एक दमनकारी एक्ट था। इसने क्रांतिकारी आंदोलन को दबाने के बजाए और तीव्र कर दिया जिससे आम जनता में भी राष्ट्रवादी भावनाएं पनपी। इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


(ग) भारत में रॉलट एक्ट का विरोध :


1918 ई० में अंग्रेजी सरकार ने ‘रॉलट’ की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की जिसका उद्देश्य भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को रोकने के लिए कानून बनाना था।


इस समिति ने दो कानून बनाए जिनके द्वारा सरकार को स्वतंत्रता आंदोलन का दमन करने के लिए असीमित अधिकार मिल गए। इनका प्रमुख कानून था-सरकार राजनैतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए जेल में दो साल के लिए कैद कर सकती है। भारतीयों ने इसे ‘काला कानून’ कहा तथा इसके विरोध में हड़ताल व प्रदर्शन किए।


गांधी जी ने भी इसके विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ करने का आह्वान किया। उनका यह विरोध अंततः असहयोग आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ।


(घ) 5 फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित चौरी-चौरा नामक जगह पर बाजार से गुजर रहा एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। आंदोलनकारियों ने कुछ पुलिसवालों को थाने में बंदकर आग लगा दी। इस घटना के बारे में सुनते ही महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन रोकने का आह्वान किया। उनको लगा था कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा था।

प्रश्न 2. सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?

उत्तर सत्याग्रह के विचार का मूल आधार सत्य की शक्ति पर आग्रह तथा सत्य की खोज करना है। गांधी जी इसके प्रबल समर्थक थे तथा उन्होंने इसकी व्याख्या इस प्रकार की


अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं।


प्रतिशोध की भावना या आक्रमकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे भी अपने संघर्ष में सफल हो सकता है।


इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए। उत्पीड़क शत्रु को ही नहीं बल्कि सभी लोगों को हिंसा के जरिए सत्य को स्वीकार करने पर विवश करने की बजाए सच्चाई को देखने और उसे सहज भाव से स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।


इस संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है। गांधी जी का अटूट विश्वास था कि अहिंसा का धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।


प्रश्न 3. निम्नलिखित पर अखबार के लिए रिपोर्ट लिखें

(क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड

(ख) साइमन कमीशन

उत्तर

(क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड

संपादक

टॉइम्स ऑफ इंडिया

दिल्ली।

महोदय

आज 13 अप्रैल, 1919 ई० की शाम को जलियाँवाला बाग में भयंकर हत्याकांड हुआ जिसने विश्व मानवता को शर्मिंदा कर दिया। इसमें एक ओर अपने : प को सभ्य कहने वाली अंग्रेजी सरकार थी और दूसरी तरफ असभ्य, अशिक्षित माने जाने वाले भारतीय थे। यह घटना इस प्रकार घटी-डॉ० सैफुद्दीन किचलू और डॉ० सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरुद्ध अमृतसर में सार्वजनिक हड़ताल हो गई है तथा हर जगह जनसभाओं का आयोजन हो रहा है। |

इसी समय आज 13 अप्रैल को बैसाखी वाले दिन लोग बैसाखी के मेले में सम्मिलित होने के लिए इस बाग में बड़ी संख्या में एकत्र हुए। इसी बाग में एक शांतिपूर्ण जनसभा भी चल रही थी। अचानक जनरल डायर (जालंधर डिविजन का कमांडर) सेना की एक टुकड़ी के साथ यहाँ पहुँचा। उसने बाग के मुख्य द्वारों को बंद कर दिया तथा बिना किसी चेतावनी के निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। यह गोलीबारी 10 मिनट तक चलती रही। चूँकि लोगों को बचाव का कोई मार्ग नहीं मिला इस कारण वे इसमें फँस गए। प्राप्त जानकारी के अनुसार एकत्र लोगों की संख्या 20 हजार के आस-पास थी। इसमें से 1000 लोग मारे गए हैं जबकि सरकारी आँकड़े यह संख्या 379 बता रहे हैं।

इस घटना की जानकारी जैसे ही लोगों को प्राप्त हुई उनमें सरकार के विरुद्ध आक्रोश और गुस्सा भड़क उठा है तथा अमृतसर तथा पंजाब के अन्य भागों में तनाव का माहौल बन गया है। अत: सरकार ने स्थिति पर काबू पाने के लिए सारे पंजाब में मार्शल लॉ लगा दिया है।

अतः मैं निवेदन करती हूँ कि इस समाचार को अपने अखबार के मुख्य पृष्ठ पर छापे, जिससे संपूर्ण विश्व और भारतवर्ष को इसकी जानकारी मिले । जो अंग्रेजी सरकार जनरल डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक कहकर सम्मानित कर रही है उसको उसके इस अमानवीय कृत्य के लिए दंडित किया जाए।

जय हिंद

भवदीया

क ख ग

(ख) साइमन कमीशन

संपादक

नवजागरण

कलकत्ता।

महोदय,

3 फरवरी, 1928 ई० को इंग्लैंड की सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में सात सदस्यों का एक कमीशन भारत भेजा। इसके मुख्य उद्देश्ये भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना तथा उसके बारे में सुझाव देने हैं। इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं है। अतः इस कमीशन का घोर विरोध होने लगा है। इसको काले झंडे दिखाए जा रहे हैं और ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे लगाए जा रहे हैं।

साइमन विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व लाला लाजपतराय कर रहे हैं। इस कमीशन में जहाँ कोई भी भारतीय सदस्य नहीं हैं वहीं इसकी रिपोर्ट अपूर्ण और अव्यावहारिक है। इसमें औपनिवेशिक साम्राज्य का उल्लेख नहीं किया गया है और न ही इसमें अधिराज्य की स्थिति को स्पष्ट किया गया है। इसमें केंद्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना का कोई उल्लेख नहीं किया गया।

कमीशन ने व्यस्क मताधिकार की मांग को भी अव्यावहारिक बताकर ठुकरा दिया है। अत: यह रिपोर्ट भारतीयों को संतुष्ट नहीं कर पा रही है। इसी कारण चारों ओर इसका विरोध हो रहा है। इस रिपोर्ट द्वारा सांप्रदायिकता को जो बढ़ावा दिया गया है यह सरकार के भारत के प्रति गलत उद्देश्यों को उजागर करता है।

अतः मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि इस रिपोर्ट को आप अपने अखबार के मुख्य पृष्ठ पर छापकर भारतीयों की भावनाओं पर आघात करने वाली अंग्रेजी सरकार की आलोचना करें।

जय हिंद

भवदीया

क ख ग

प्रश्न 4. इस अध्याय में दी गई भारत माता की छवि और अध्याय 1 में दी गई जर्मेनिया की छवि की तुलना कीजिए।

उत्तर भारत माता और जर्मेनिया की छवि की तुलना

चर्चा करें

प्रश्न 1. 1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाइए। इसके बाद उनमें से किन्हीं तीन को चुन कर उनकी आशाओं और संघर्षों के बारे में लिखते हुए यह दर्शाइए कि वे आंदोलन में शामिल क्यों हुए?

उत्तर 1921 में असहयोग आंदोलन में भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया लेकिन हरेक की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं। आंदोलन में शामिल प्रमुख सामाजिक समूह निम्नलिखित थे-शिक्षित मध्यम वर्ग, भारतीय दस्तकार और मजदूर, भारतीय किसान, पूँजीपति वर्ग, जमींदार वर्ग तथा व्यापारिक वर्ग। सभी ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया।


शिक्षित मध्यम वर्ग – शहरों में शिक्षित मध्यम वर्ग ने असहयोग आंदोलन की शुरूआत की। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए, शिक्षकों ने इस्तीफे दे दिए। वकीलों ने मुकदमें लड़ने बंद कर दिए। शिक्षित वर्ग आंदोलन में शामिल इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने देखा कि उनके बराबर पढ़े-लिखे अंग्रेज उनके अफसर बन जाते थे। भारतीय लोगों को वेतन भी अंग्रेजों के मुकाबले कम मिलता था। वे केवल क्लर्क ही पैदा होते थे और क्लर्क ही मर जाते थे। इस भेदभावपूर्ण नीति के कारण शिक्षित वर्ग अंग्रेज सरकार का विरोधी था।


व्यापारी वर्ग – बहुत से स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी चीजों का व्यापार करने या विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इनकार कर दिया। अंग्रेज सरकार की गलत नीतियों के कारण व्यापारी वर्ग पूरी तरह बरबाद हो चुका था। अंग्रेज सस्ते दामों पर कच्चा माल ब्रिटेन ले जाते थे और वहाँ से तैयार माल लाकर अधिक कीमत पर भारत में बेचते थे। भारतीय व्यापारियों को इससे बहुत नुकसान होता था।


सामान्य जनता – असहयोग आंदोलन एक जन आंदोलन बन गया था क्योंकि आम जनता ने विदेशी कपड़ों तथा चीजों का बहिष्कार किया, शराब की दुकानों की पिकेटिंग की और विदेशी कपड़ों की होली जलाई। आम जनता अंग्रेजों के अत्याचार से दुखी हो चुकी थी इसलिए उसने बढ़-चढ़कर असहयोग आंदोलन में भाग लिया।


बाग़ान मजदूर – गांधी जी के विचार और स्वराज की अवधारणा जब मजदूरों को समझ में आई तो वे भी बाग़ानों की चारदीवारियों से बाहर निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हो गए। वे अपने अधिकारियों की अवहेलना करने । लगे। वे बागानों को काम छोड़कर अपने घरों को लौट गए क्योंकि उनको लगने लगा कि गांधी राज आते ही सबको जमीन मिल जाएगी।


प्रश्न 2. नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करें कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था।

उत्तर 31 जनवरी 1930 को गांधी जी ने इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया था। इसमें सबसे महत्वपूर्ण माँग नमक कर को खत्म करने के बारे में थी। नमक का अमीर-गरीब सभी प्रयोग करते थे। यह भोजन का अभिन्न हिस्सा था। इसलिए नमक पर कर को ब्रिटिश सरकार का सबसे दमनकारी पहलू बताया था। 11 मार्च तक उनकी माँगें नहीं मानी गई तो 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने अपने 56 स्वयंसेवकों के साथ नमक यात्रा शुरू की। यह यात्रा साबरमती से दांडी नामक गुजराती तटीय कस्बे में जाकर खत्म होनी थी। 6 अप्रैल को वे दाँडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालदर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह कानून का उल्लंघन था ।

यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था


इस बार लोगों को न केवल अंग्रेजों को सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा। हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए।


यह यात्रा साबरमती से 240 किलोमीटर दूर दाँडी में जाकर समाप्त होनी थी। गांधी जी की टोली ने 23 दिनों तक हर रोज लगभग 10 मील का सफर तय किया। गांधी जी जहाँ भी रूकते हजारों लोग उन्हें सुनने आते। इन सभाओं में गांधी जी ने स्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और कहा कि लोग अंग्रेजों की शांतिपूर्ण अवज्ञा करें यानि कि अंग्रेजों को कहा। न मानें।


इस प्रकार गांधी जी की नमक यात्रा उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक बन गई।

प्रश्न 3. कल्पना कीजिए कि आप सिविल नाफरमानी आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिला हैं। बताइए कि इस अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता?

उत्तर सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में अनेक औरतों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। गांधी जी की बातों को सुनने के लिए औरतें अपने घरों से बाहर आ जाती थीं।

मैंने भी इस समय अनेक जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की, मैं भी अन्य महिलाओं के साथ जेल गई। इस आंदोलन के दौरान मैंने यह अनभव किया कि शहरी क्षेत्रों में सभी वर्गों की महिलाओं ने भाग लिया परंतु इसमें उच्च जातियों की महिलाएं अधिक थीं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न किसान परिवार की महिलाओं ने अधिक भाग लिया।

इस दौरान मैंने पाया कि सभी राष्ट्रसेवा को अपना प्रथम कर्तव्य मानने लगे। हम महिलाओं में यह आत्मविश्वास जागा कि वे घर के अतिरिक्त राष्ट्रसेवा का दायित्व भी निभा सकती हैं।

परंतु कांग्रेस ने लंबे समय तक महिलाओं को उच्च पद नहीं दिए। उन्हें आंदोलनों में केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति तक ही सीमित रखा।

प्रश्न 4. राजनीतिक नेता पृथक निर्वाचिका के सवाल पर क्यों बँटे हुए थे?

उत्तर पृथक चुनाव प्रणाली का अभिप्राय ऐसे चुनाव क्षेत्रों से है जिनका निर्माण धर्म के आधार पर किया जाए अर्थात् एक धर्म का व्यक्ति केवल अपने धर्म के व्यक्ति को ही वोट देगा। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालने के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण किया। अपने इस कार्य में अंग्रेज सरकार काफी हद तक सफल रही क्योंकि पृथक निर्वाचन क्षेत्रों पर भारतीय आपस में बँट गए


कांग्रेस पृथक निर्वाचन पद्धति का विरोध कर रही थी। पहले अंग्रेजों ने केवल हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात कही थी किंतु बाद में जब हरिजनों को भी हिंदुओं से अलग करके पृथक निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटने की बात कही जाने लगी तो कांग्रेस ने इसका खुलकर विरोध किया।


दलितों के उद्धार में लगे बी.आर. अम्बेडकर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे। उनका मानना था कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तिकरण से ही दूर हो सकती है।


भारत को मुस्लिम समुदाय भी पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के पक्ष में था। मुहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि यदि मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएँ और मुस्लिम बहुल प्रातों में मुसलमानों को आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो वे मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने के लिए तैयार हैं।


इस प्रकार इन बातों से पता चलता है कि पृथक निर्वाचन क्षेत्रों को लेकर भारतीयों में फूट पड़ गई थी। कांग्रेस पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के खिलाफ थी जबकि दलित वर्ग तथा मुस्लिम वर्ग इसके पक्ष में थे। जिन्ना और अम्बेडकर जैसे नेता चाहते थे कि पृथक निर्वाचन पद्धति को लागू किया जाए जिससे दलितों और मुसलमानों को राजनीति में विशिष्ट स्थान प्राप्त हो सके जबकि गांधी जी इसके विरुद्ध थे। उनका कहना था कि पृथक निर्वाचन पद्धति से भारत के विभिन्न धर्मों के लोगों में रोष उत्पन्न होगा, उनकी एकता समाप्त हो जाएगी। इसलिए वे इसे स्वीकारने के पक्ष में नहीं थे।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1. कीनिया के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन का अध्ययन करें। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की तुलना कीनिया के स्वतंत्रता संघर्ष से करें।

उत्तर कीनिया की खोज सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने की। 1498 में वास्को-डी-गामा मोम्बासा पहुँचा। इसके बाद समुद्री रास्ते से पुर्तगालियों ने कीनिया के साथ मसालों का व्यापार शुरू किया। 17वीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच तथा अरबों ने भी इस क्षेत्र में आना शुरू किया और 1730 तक इन यूरोपीय शक्तियों ने पुर्तगालियों को कीनिया से बाहर कर दिया। 1885 में जर्मनों ने इस पर कब्जा किया और 1890 में इसके तटीय प्रदेश ब्रिटेन को सौंप दिए । अंग्रेजों ने कीनिया-यूगांडा रेलवे का निर्माण किया। इसका कुछ स्थानीय जनजातियों ने विरोध किया। 20वीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय किसानों ने कॉफी और चाय की खेती करनी प्रारंभ कर दी। 30,000 श्वेत लोग यहाँ आकर बस गए और लाखों किकियू (स्थानीय जनजाति के लोग) भूमिहीन हो गए।

1952 से 1959 तक कीनिया आपातकालीन स्थिति में रहा तथा यहाँ माऊ-माऊ विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ पूरे जोरशोर से चला। यूरोप की गोरी जातियाँ कीनिया के अश्वेत लोगों को निम्न कोटि का मानती थी। इस सिद्धांत की तीव्र प्रतिक्रिया हुई और कीनिया में राष्ट्रवाद का प्रसार होने लगा। राष्ट्रवाद को मुख्य प्रेरणा जातीय समानता के सिद्धांत से मिली। पाश्चात्य संपर्क और पाश्चात्य साहित्य ने भी कीनिया के प्रबुद्ध लोगों में राष्ट्रवाद की भावना जगाई। किंतु 1956 तक माऊ-माऊ विद्रोह पूरी तरह कुचल दिया गया।

इस विद्रोह से यह सिद्ध हो चुका था कि कीनिया के लोग राष्ट्रवाद की भावना से भर चुके थे और उन्हें अधिक समय तक गुलाम नहीं बनाया जा सकता था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई अफ्रीकी देशों में स्वतंत्रता की लहर आई । विश्व युद्ध के कारण उपनिवेशी शक्तियाँ कमजोर पड़ चुकी थीं। परिणामस्वरूप कीनिया में भी 1957 में पहले प्रत्यक्ष चुनाव कराए गए। अंग्रेजों ने सोचा था कि वहाँ उदारवादियों को सत्ता सौंप दी जाएगी। किंतु ‘जीमो केनियाटा’ की पार्टी कीनिया अफ्रीकन नेशनल यूनियन (KANU) ने अपनी सरकार बना ली और 12 दिसम्बर 1963 को कीनिया आजाद हो गया।

भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन तथा कीनिया के स्वतंत्रता संघर्ष की तुलना

समानताएँ:


दोनों ही देशों का साम्रज्यवादी शक्तियों ने शताब्दियों तक शोषण किया। अतः दोनों ही आर्थिक पिछड़ेपन और सामाजिक रूढ़िवादिता से पीड़ित रहें। दोनों ही देशों की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दुर्बलता का लाभ उठाकर यूरोपीय शक्तियों ने यहाँ उपनिवेशवाद और ‘नव-उपनिवेशवाद’ का प्रसार किया।


दोनों ही देशों में राष्ट्रवाद की लहर फैली। दोनों ही देश उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के विरोधी थे। दोनों देशों के । लोगों ने पूरी ताकत से उपनिवेशवादी शक्तियों का विरोध किया और अंत में इसमें सफलता पाई।


अपने आर्थिक-सामाजिक विकास के लिए दोनों ही महाद्वीप विदेशी सहायता लेने के लिए विवश हो गए। अतः सहायता देने वाली शक्तियों को सहायता प्राप्त देशों में अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के पर्याप्त अवसर मिलते रहते हैं।


असमानताएँ:


भारत का राष्ट्रवाद कीनिया के मुकाबले अधिक परिपक्व था। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन में समाज के सभी वर्गों ने भाग लिया। जातीय, भाषायी तथा धार्मिक आधार पर विभाजित सभी वर्ग राष्ट्रीयता के प्रश्न पर एकजुट हो गए। जबकि कीनिया में राष्ट्रीय आंदोलन स्थानीय जनजातियों द्वारा ही चलाए गए। जब इन स्थानीय जनजातियों को अपनी रोजी-रोटी छिनती नजर आई तो इन्होंने विद्रोह कर दिया। इनके विद्रोहों में वो एकता दिखाई नहीं देती जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विद्रोहों में दिखती है।


भारत में राष्ट्रीय आंदोलन अधिकांशतः अहिंसक तथा शांतिपूर्ण रहा केवल कुछ अपवादों को छोड़कर क्योंकि यहाँ राष्ट्रवादी नेता सुनियोजित कार्यक्रम चलाते थे। उनके पीछे राष्ट्रवाद की एक लंबी परंपरा की तथा महात्मा गांधी जैसे चमत्कारिक व्यक्तित्व के नेता थे जो अहिंसा के पुजारी थे। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो भारत का राष्ट्रीय आंदोलन उतना उग्र नहीं था जितना कीनिया का था। रंगभेद और कबीलेवाद की समस्याओं का सामना कीनिया को करना पड़ा। कीनिया के नेता भारतीय नेताओं की तुलना में अधिक उग्र रहे।


भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का कारण यहाँ के शिक्षित वर्ग द्वारा राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करना था। यहाँ के प्रबुद्ध वर्ग ने फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति आदि के समानता, स्वतंत्रता तथा न्याय जैसे विचारों को आम जनता तक पहुँचाया। भारत में शिक्षा का प्रसार कीनिया के मुकाबले अधिक था। इसलिए कीनिया में स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे विचारों को फैलने में काफी समय लगा। वहाँ राष्ट्रवादी विचार देर से फैले।


इस प्रकार हमने देखा कि भारत और कीनिया के स्वतंत्रता संघर्ष में काफी समानताएँ थीं किंतु साथ ही काफी असमानताएँ भी थीं।

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 4 The Making of Global World (भूमंडलीकृत विश्व का बनना)



NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 4 The Making of Global World (भूमंडलीकृत विश्व का बनना)



These Solutions are part of NCERT Solutions for Class 10 Social Science in Hindi Medium. Here we have given NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 4 The Making of Global World.

प्रश्न अभ्यास

पाठ्यपुस्तक से

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान-प्रदान के दो उदाहरण दीजिए। एक उदाहरण एशिया से और एक उदाहरण अमेरिकी महाद्वीपों के बारे में चुनें।

उत्तर

चीन – 15वीं शताब्दी तक बहुत सारे ‘सिल्क मार्ग’ अस्तित्व में आ चुके थे। इसी रास्ते से चीनी पॉटरी जाती थी और इसी रास्ते से भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े व मसाले दुनिया के दूसरे भागों में पहुँचते थे। वापसी में सोने-चाँदी जैसी कीमती धातुएँ यूरोप से एशिया पहुँचती थीं।

अमेरिका – सोलहवीं सदी में जब यूरोपीय जहाजियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता खोज लिया और वे अमेरिका तक जा पहुँचे तो अमेरिका की विशाल भूमि और बेहिसाब फसलें और खनिज पदार्थ हर दिशा में जीवन का रंग-रूप बदलने लगे। आज के पेरू और मैक्सिको में मौजूद खानों से निकलने वाली कीमती धातुओं, खासतौर से चाँदी, ने भी यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्चिम एशिया के साथ होने वाले उसके व्यापार को गति प्रदान की।

प्रश्न 2. बताएँ कि पूर्व-आधुनिक विश्व में बीमारियों के वैश्विक प्रसार ने अमेरिकी भू-भागों के उपनिवेशीकरण में किस प्रकार मदद की?

उत्तर


16वीं सदी के मध्य तक पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो गया था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था।


यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताकत के दम पर नहीं जीतती थीं। स्पेनिश विजेताओं के पास तो कोई परंपरागत किस्म का सैनिक हथियार नहीं था। यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे जो स्पेनिश सैनिकों और अफसरों के साथ वहाँ जा पहुँचे थे।


लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी।


इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई । एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई।


जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे, वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे। इसने सभी समुदायों को खत्म कर डाला।


इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया।


इस तरह से बिना किसी चुनौती के बड़े साम्राज्यों को जीतकर अमेरिका में उपनिवेशों की स्थापना हुई।


बंदूकों को तो खरीदकर या छीनकर हमलावरों के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता था। पर चेचक जैसी बीमारियों के मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमलावरों के पास उससे बचाव का तरीका भी था और उनके शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता भी विकसित हो चुकी थी।

प्रश्न 3. निम्नलिखित के प्रभावों की व्याख्या करते हुए संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें

(क) कार्न लॉ के समाप्त करने के बारे में ब्रिटिश सरकार का फैसला

(ख) अफ्रीका में रिंडरपेस्ट का आना।

(ग) विश्वयुद्ध के कारण यूरोप में कामकाजी उम्र के पुरुषों की मौत।

(घ) भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामंदी का प्रभाव ।

(ङ) बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने उत्पादन को एशियाई देशों में स्थानांतरित करने का फैसला।

उत्तर (क) ब्रिटेन की सरकार ने बड़े भू-स्वामियों के दबाव में मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी थी। जिन कानूनों के सहारे सरकार ने यह पाबंदी लागू की थी, उन्हें ‘कार्न लॉ’ कहा जाता था। खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वे कार्न लॉ को फौरन निरस्त कर दें। कार्न लों के समाप्त हो जाने के बाद बहुत कम कीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाने लगा। आयातित खाद्य पदार्थों की लागत ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम थी। फलस्वरूप, ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित कार्न लॉ की कीमत का मुकाबला नहीं कर सकते थे। विशाल भू-भागों पर खेती बंद हो गई। हजारों लोग बेरोज़गार हो गए। गाँवों से उजड़कर वे या तो शहरों में या दूसरे देशों में जाने लगे।

(ख)


अफ्रीका में 1890 के दशक में रिंडरपेस्ट नामक बीमारी बहुत तेजी से फैल गई।


मवेशियों में प्लेग की तरह फैलने वाली इस बीमारी से लोगों की आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहरी असर पड़ा।


उस समय पूर्वी अफ्रीका में एरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों का पेट भरने के लिए एशियाई देशों से जानवर लाए जाते थे।


यह बीमारी ब्रिटिश आधिपत्य वाले एशियाई देशों से आए जानवरों के जरिए यहाँ पहुँची थी।


अफ्रीका के पूर्वी हिस्से से महाद्वीप में दाखिल होने वाली यह बीमारी जंगल की आग की तरह पश्चिमी अफ्रीका की तरफ बढ़ने लगी।


1892 में यह अफ्रीका के अटलांटिक तट तक जा पहुँची।


रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया। पशुओं के खत्म हो जाने से अफ्रीकियों के रोजी-रोटी के साधन समाप्त हो गए।


(ग)


प्रथम विश्व युद्ध 1914 में शुरू हुआ था और 1919 में समाप्त हुआ।


इस युद्ध में मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाजों और रासायनिक हथियारों को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।


इस युद्ध में 90 लाख से अधिक लोग मारे गए तथा 2 करोड़ लोग घायल हुए।


मृतकों और घायलों में ज्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे।


इस महाविनाश के कारण यूरोप में कामकाज के लायक लोगों की संख्या बहुत कम रह गई।


परिवार के सदस्य घट जाने से युद्ध के बाद परिवारों की आय भी गिर गई।


(घ) महामंदी का प्रभाव जहाँ पश्चिमी देशों पर बडे भयंकर तौर पर पड़ा वहीं उपनिवेशों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ा जो इस प्रकार था

1. व्यापारिक क्षेत्र – 20 वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में भारत से कृषि वस्तुओं का निर्यात और निर्मित सामान का आयात बड़े पैमाने पर होने लगा था। महामंदी के कारण इस प्रक्रिया पर भी बुरा असर पड़ा। 1928-34 के बीच आयात का प्रतिशत आधा रह गया था क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कीमतें बढ़ गई थीं।

2. कृषि उत्पादों पर प्रभाव – इस मंदी के कारण उन कृषि उत्पादों और उनसे निर्मित सामानों पर भारी असर पड़ा जिनकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग थी। यानि जूट और पटसन की उपज और बनने वाली वस्तुएं । इस समय टाट का निर्यात बंद हो गया था जिस कारण कच्चे पटसन की कीमतें 60 प्रतिशत से भी अधिक गिर गईं। अत: जिन कृषकों ने पटसन उगाने के लिए कर्जे लिए थे उनकी स्थिति पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा और वे और अधिक कर्जदार हो गए।

3. शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव – शहरी अर्थव्यवस्था पर महामंदी का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा स्योंकि यहाँ पर ज्यादातर वेतन भोगी वर्ग रहता था या फिर बड़े जमींदार वर्ग के लोग रहते थे जिन्हें ज़मीन का लगान मिलता था। राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ा दिया था, जिससे उद्योगों को भी लाभ हुआ।

इसके विपरीत ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा। सरकार द्वारा लगान कम न करने के कारण कृषकों की स्थिति अत्यधिक दयनीय हो गयी। एक ओर उन्हें अपने उत्पादों की सही कीमत नहीं मिल

रही थी वहीं दूसरी ओर उनपर लगान और कर्जा का भारी बोझ पड़ रहा था। अत: ग्रामीण क्षेत्र में भारी असंतोष का वातावरण था।

4. वैश्वीकरण की प्रक्रिया पुनः प्रारंभ – इस मंदी के समय भारत की कीमती धातुओं विशेषकर सोने का निर्यात पुन: प्रारंभ हो गया था। इससे वैश्वीकरण की प्रक्रिया पुन: प्रारंभ हो गई थी। ।

(ङ)


1920 के दशक में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थापना की गई। 70 के दशक के मध्य में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में कई परिवर्तन आए। अब विकासशील देश अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से कर्जे और विकास संबंधी सहायता ले सकते थे।


पचास और साठ के दशकों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विश्वव्यापी प्रसार हुआ। चूँकि अधिकतर सरकारें बाहर से आने वाली चीजों पर भारी आयात शुल्क वसूल करने लगी थीं अत: बड़ी कंपनियों ने अपने संयंत्रों को उन्ही देशों में लगाने प्रारंभ कर दिए जहां वे अपने उत्पाद बेचना चाहते थे और उन्हें घरेलू उत्पादकों के रूप में काम करना पड़ता था।


70 के दशक में एशियाई देशों में बेरोजगारी बढ़ने लगी थी। अत: इन कंपनियों ने एशिया के ऐसे देशो में उत्पादन केन्द्रित किए जहां वेतन कम देना पड़ता था। चीन में अन्य एशियाई देशों के मुकाबले सबसे कम वेतन देना पड़ता था। अत: इन कंपनियों ने यहाँ पर अत्यधिक निवेश किया। इससे अर्थव्यवस्था में भारी परिवर्तन आए। जिसने विश्व के आर्थिक भूगोल को बदल दिया।


प्रश्न 4. खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दें।

उत्तर 1890 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी। इससे तकनीक में भी बदलाव आ चुके थे। खाद्य उपलब्धता पर भी तकनीक का प्रभाव पड़ने लगा जो इस प्रकार था।


रेलवे का विकास-अब भोजन किसी आस-पास के गाँव या कस्बे से नहीं बल्कि हजारों मील दूर से आने लगा था। खाद्य-पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए रेलवे का इस्तेमाल किया जाता था। पानी के जहाजों से इसे दूसरे देशों में पहुँचाया जाता था।


नहरों का विकास-खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव का बहुत अच्छा उदाहरण हम पंजाब में देखते हैं। यहाँ ब्रिटिश भारतीय सरकार ने अर्द्ध-रेगिस्तानी परती जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया ताकि निर्यात के लिए गेहूं की खेती की जा सके। इससे पंजाब में गेहूं का उत्पादन कई गुना बढ़ गया और गेहूँ को बाहर बेचा। जाने लगा।


रेफ्रिजरेशन तकनीक का विकास-1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप को मांस का निर्यात नहीं किया जाता था। उस समय जिंदा जानवर ही भेजे जाते थे, जिन्हें यूरोप ले जाकर काटा जाता था। लेकिन जिंदा जानवर बहुत ज्यादा जगह घेरते थे। बहुत सारे लंबे सफर में मर जाते थे। बहुतों का वजन गिर जाता था या वे खाने लायक नहीं रहते थे। इसलिए मांस खाना एक महँगा सौदा था। नई तकनीक के आने पर यह स्थिति बदल गई। पानी के जहाजों में रेफ्रिजरेशन की तकनीक स्थापित कर दी गई, जिससे जल्दी खराब होने वाली चीजों को भी लंबी यात्राओं पर ले जाया । जा सकता था। अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड सब जगह से जानवरों की बजाए उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा। इससे न केवल समुद्री यात्रा में आने वाला खर्चा कम हो गया बल्कि यूरोप में मांस के दाम भी गिर गए। अब बहुत सारे लोगों के भोजन में मांसाहार शामिल हो गया।


प्रश्न 5. ब्रेटन वुड्स समझौते का क्या अर्थ है?

उत्तर युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह था कि औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार बनाए रखा जाए। इस फ्रेमवर्क पर जुलाई 1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी। इसी को ब्रेटन वुड्स समझौते के नाम से जाना जाता है।

सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की गई। युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतजाम करने के वास्ते अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक का गठन किया गया। इसी वजह से विश्व बैंक और आई०एम०एफ० को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रिटेन वुड्स ट्विन भी कहा जाता है। इसी आधार पर युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अक्सर ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है।

चर्चा करें

प्रश्न 1. कल्पना कीजिए की आप कैरीबियाई क्षेत्र में काम करने वाले गिरमिटिया मजदूर हैं। इस अध्याय में दिए गए विवरणों के आधार पर अपने हालात और अपनी भावनाओं का वर्णन करते हुए अपने परिवार के नाम एक पत्र लिखें।

उत्तर मैं मतादीन भारत से जाने वाला एक गिरमिटिया मजदूर था। मुझे 20वीं सदी के प्रारंभ में गुयाना में 10 साल के अनुबंध के तहत काम के लिए जाना पड़ा। वहाँ से मैंने अपने माता-पिता को एक पत्र लिखा

आदरणीय माताजी-पिताजी,

चरण स्पर्श,

मैं यहाँ पर ठीक हूँ। आशा करता हूँ कि आप सब भी सकुशल होंगे। वैसे तो यहाँ पर रोजगार मिला हुआ है परंतु जिस एजेंट ने मुझे यहाँ भेजा था उसने यहाँ के विषय में पूर्ण जानकारी नहीं दी थी जिससे कि मुझे लम्बी समुद्री यात्रा करनी पड़ेगी, यहाँ काम करने के हालात अच्छे नहीं हैं। उसने मुझे कहा था कि मैं बीच में कुछ दिनों के लिए आपसे मिलने भी आ सकेंगा पर अब वह अपने वादे से मुकर रहा है। अतः मैं आपसे मिलने नहीं आ सकता।

मैं यहाँ पर एक बागान में काम करता हूँ। यहाँ मेरे साथ कुलियों जैसा बर्ताव होता है। यदि कोई यहाँ से भागने की कोशिश करता है और पकड़ा जाता है तो उसके साथ बुरा बर्ताव होता है जिसमें कोई-कोई तो मर भी जाता है। अतः हम लोग यहाँ से भागने का प्रयास नहीं करते।

अब तो बस इसी इंतजार में समय कट रहा है कि हमारे नेता इस घिनौनी अनुबंधित दास प्रथा के खिलाफ आवाज उठाएं।

और हमें आजाद करवाएं। मैं वापस घर आना चाहता हूँ। फिलहाल मैं आपको कुछ पैसे भेज रहा हूं। ये पैसे कम हैं क्योंकि पिछले कुछ दिन बीमार होने के कारण काम नहीं कर सका जिससे मेरे पैसे कट गए और मुझे कम वेतन मिला। पत्र का

जवाब शीघ्र देना।

आपका पुत्र

मतादीन

प्रश्न 2. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमयों में तीन तरह की गतियों या प्रवाहों की व्याख्या करें। तीनों प्रकार की गतियों के भारत और भारतीयों से संबंधित एक-एक उदाहरण दें और उनके बारे में संक्षेप में लिखें।

उत्तर अर्थशास्त्रियों ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह की गतियों या प्रवाहों का उल्लेख किया है


व्यापार का प्रवाह-पहला प्रवाह व्यापार का होता है जो 19वीं सदी में मुख्य रूप से वस्तुओं जैसे कपड़ा या गेहूँ आदि के व्यापार तक ही सीमित था।


श्रम का प्रवाह-दूसरा प्रवाह श्रम का होता है। इसमें लोग काम या रोजगार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।


पूँजी का प्रवाह-तीसरा प्रवाह पूँजी का होता है जिसे अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज के इलाकों में निवेश कर दिया जाता है।


ये तीनों प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े थे और लोगों के जीवन को प्रभावित करते थे।

भारत से तीन प्रवाहों के उदाहरण – भारत में प्राचीन काल से ही तीनों प्रकार के प्रवाह देखने को मिलते हैं


प्राचीन काल से ही भारतीयों ने अपने पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक संबंध बना रखे थे। भारतीय व्यापारी भारत से मसाले, कपास आदि लेकर विदेशों में जाते थे तथा वहाँ से जरूरी चीजें लेकर आते थे।


बहुत से भारतीय कारीगर और इंजीनियर विदेशों में बागानों, खानों, सड़क निर्माण और रेल निर्माण का काम करने के लिए गए।


भारत में प्राचीन काल में बहुत से देशों ने पूँजी का निवेश किया। पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों तथा अंग्रेजों ने यहाँ व्यापारिक कंपनियाँ खोली तथा चाय के बागान आदि स्थापित किए।


प्रश्न 3. महामंदी के कारणों की व्याख्या करें।

उत्तर 1929 में आर्थिक महामंदी की शुरूआत हुई। इस मंदी के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे


औद्योगिक क्रांति के कारण अमेरिका तथा ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर उत्पादन कार्य होने लगा था। 1930 तक तैयार माल का इतना बड़ा भण्डार एकत्र हो गया कि उनका कोई खरीददार न रहा।


कृषि क्षेत्र में अति उत्पादन के कारण कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगी। किसानों ने अपनी घटती आय को बढ़ाने के लिए अधिक उत्पादन करना शुरू कर दिया किंतु इससे कीमतें और गिरने लगी। खरीददारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी-पड़ी सड़ने लगी।


संकट से पूर्व बहुत से देश अमेरिका से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था चलाते थे। 1928 के कुछ समय पहले विदेशों में अमेरिका का कर्ज एक अरब डालर था। साल भर के भीतर यह कर्ज घटकर केवल चौथाई रह गया था। जो देश अमेरिकी कर्ज पर सबसे ज्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट खड़ा हो गया।


यूरोप में कई बड़े बैंक धराशायी हो गये। कई देशों की मुद्रा की कीमत बुरी तरह गिर गई। अमेरिकी सरकार इस महामंदी से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आयातित पदार्थों पर दो गुना सीमा शुल्क वसूल करने लगी।


अमेरिका के शेयर बाजार में शेयरों की कीमत में गिरावट आ गई। इसकी वजह से वहाँ लाखों व्यापारियों का दीवाला निकल गया।


प्रश्न 4. जी-77 देशों से आप क्या समझते हैं? जी-77 को किस आधार पर ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है? व्याख्या करें।

उत्तर वे विकासशील देश जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए थे किंतु 50 व 60 के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज प्रगति से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने एक नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली के लिए आवाज उठाई और अपना एक संगठन बनाया जिसे समूह-77 या जी-77 के नाम से जाना जाता है।

ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का जन्म हुआ था जिन्हें ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान कहा जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक पर केवल कुछ शक्तिशाली विकसित देशों का ही प्रभुत्व था इसलिए उनसे विकासशील देशों को कोई लाभ नहीं हुआ। इसलिए ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानों विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रतिक्रिया स्वरूप विकासशील देशों ने जी-77 नामक संगठन बनाकर नई आर्थिक प्रणाली की माँग की ताकि उनके आर्थिक उद्देश्य पूरे हो सकें। उनके प्रमुख आर्थिक उद्देश्य थे-अपने संसाधनों पर उनका पूरा नियंत्रण हो, कच्चे माल के सही दाम मिलें और अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाजारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1. उन्नीसवीं सदी के दौरान दक्षिण अफ्रीका में स्वर्ण हीरा खनन के बारे में और जानकारियाँ इकट्ठी करें। सोना और हीरा कंपनियों पर किसका नियंत्रण था? खनिक कौन लोग थे और उनका जीवन कैसा था?

उत्तर 19वीं शताब्दी में दक्षिण अफ्रीका में हीरा और स्वर्ण धातुओं के खनन का कार्य बड़ी तेजी से किया जाने लगा। इसके लिए ब्रिटेन, फ्रांस जैसे बड़े यूरोपीय देशों ने अपने-अपने खोजी दलों का गठन किया जिन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप के भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए इसके विभिन्न क्षेत्रों के नक्शे बनाए और यहाँ तक पहुँचने के रास्ते खोजे । बाद में इन्होंने अफ्रीका का बँटवारा किया जिसे अफ्रीका का कागजी बँटवारे के नाम से जाना जाता है।

अफ्रीका की इन खानों पर ज्यादातर ब्रिटेन व फ्रांस की कंपनियों का नियंत्रण था। इन खादानों में कार्य करने वाले ज्यादातर अफ्रीकी होते थे। इनकी स्थिति बड़ी दयनीय होती थी। उनसे अत्यधिक कार्य लिया जाता था। इनकी सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाता था। इनको बाड़ो में बंद कर दिया जाता था तथा इनको खुलेआम घूमने-फिरने नहीं दिया जाता था। यदि कोई मजदूर भागने का प्रयास करता तो उसे पकड़ लिया जाता था तथा कठोर दंड दिया जाता था, कभी-कभी तो जान से भी मार दिया जाता था।

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 5 The Age of Industrialisation (औद्योगीकरण का युग)



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प्रश्न अभ्यास

पाठ्यपुस्तक से

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. निम्नलिखित की व्याख्या करें –

(क) ब्रिटेन की महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमले किए।

(ख) सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में किसानों और कारीगरों से काम करवाने लगे।

(ग) सूरत बंदरगाह अठारहवीं सदी के अंत तक हाशिये पर पहुँच गया था।

(घ) ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्तों को नियुक्त किया था।

उत्तर (क) जेम्स हरग्रीज़ ने 1764 में स्पिनिंग जेनी नामक मशीन बनाई थी। इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया तेज कर दी और

मज़दूरों की माँग घटा दी। एक ही पहिया घुमाने वाला एक मजदूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कई धागे बनने लगते थे। जब इन मशीनों का प्रयोग शुरू हुआ तो हाथ से ऊन कातने वाली औरतें इस तरह की मशीनों पर हमला करने लगी क्योंकि इस मशीन की वजह से उनका काम छिन गया था। इस मशीन की वजह । से शारीरिक श्रम की माँग घटने के कारण बहुत-सी महिलाएँ बेरोजगार हो गई थीं। इसलिए उन्होंने स्पिनिंग जेनी के प्रयोग का विरोध किया।

(ख)


17वीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरफ़ रुख करने लगे थे। वे किसानों और कारीगरों को पैसा देते थे और उनसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पादन करवाते थे।


उस समय विश्व व्यापार के विस्तार और दुनिया के विभिन्न भागों में उपनिवेशों की स्थापना के कारण चीजों की माँग बढ़ने लगी थी। इस माँग को पूरा करने के लिए केवल शहरों में रहते हुए उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था। इसलिए नए व्यापारी गाँवों की तरफ जाने लगे।


गाँवों में गरीब काश्तकार और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करने लगे। यह वह समय था जब छोटे व गरीब किसान आमदनी के नए स्रोत हूँढ़ रहे थे।


इसलिए जब सौदागर वहाँ आए और उन्होंने माल पैदा करने के लिए पेशगी रकम दी तो किसान फौरन तैयार हो गए।


सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँव में ही रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को भी संभाल सकते थे।


इससे कुटीर उद्योग को बल मिला।


(ग) 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला नेटवर्क टूट गया। यूरोपीय कंपनियों की ताकत बढ़ती जा रही थी। उन्होंने पहले स्थानीय दरबारों से कई तरह की रियायतें हासिल की और उसके बाद उन्होंने व्यापार पर इजारेदारी अधिकार प्राप्त कर लिए। इससे सूरत जैसे बंदरगाह कमजोर पड़ गए। इन बंदरगाहों से होनेवाले निर्यात में नाटकीय कमी आई। पहले जिस कर्जे से व्यापार चलता था वह खत्म होने लगा। धीरे-धीरे स्थानीय बैंकर दिवालिया हो गए। 17वीं सदी के आखिरी सालों में सूरत बंदरगाह से होने वाला व्यापार का कुल मूल्य 1.6 करोड़ रुपये था। 1740 के दशक तक यह गिर कर केवल 30 लाख रुपये रह गया था। इस प्रकार 18वीं सदी के अंत तक सूरत बंदरगाह हाशिए पर हो गया था।

(घ) 1764 के युद्ध के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनैतिक सत्ता स्थापित हो गई तब कंपनी ने व्यापार पर एकाधिकार कायम करने के लिए उससे सीधा संबंध स्थापित करना चाहा। इसके लिए उसने गुमास्तों की नियुक्ति की। यह कार्य कंपनी ने दो चरणों में पूर्ण किया।


प्रथम चरण – कंपनी ने सर्वप्रथम बुनकरों को सक्रिय व्यापारियों व दलालों से मुक्त करवाने के लिए इनपर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतन भोगी कर्मचारी नियुक्त किए जिन्हें ‘गुमास्ता’ कहा गया।


द्वितीय चरण – कंपनी ने बुनकरों पर पाबंदी लगा दी कि वे अन्य खरीददारों को अपना माल नहीं बेच सकते। जब बुनकरों को काम का ऑर्डर मिल जाएगा तो उन्हें कच्चा माल खरीदने के लिए कर्जा देने की भी व्यवस्था की गई, परंतु इसमें एक शर्त यह रखी गई कि जो कर्जा लेगा वह अपना माल गुमास्ता को ही बेचेगा।


परंतु जल्द ही गुमास्तों और बुनकरों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि एक तो गुमास्ते तैयार माल की उचित कीमत नहीं देते थे, दूसरे यदि कोई बुनकर समय पर माल तैयार नहीं कर पाता तो उसे दंड देते थे, जैसे कोड़े मारना।

इस व्यवस्था में बुनकर की स्थिति दयनीय हो गई क्योंकि जहाँ उन्हें अपने माल की उचित कीमत नहीं मिल रही थी वहीं वे कंपनी के कर्जे तले भी दबते जा रहे थे।

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प्रश्न 2. प्रत्येक वक्तव्य के आगे ‘सही’ या ‘गलत’ लिखें

(क) उन्नीसवीं सदी के आखिर में यूरोप की कुल श्रम शक्ति का 80 प्रतिशत तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम कर रहा था।

(ख) अठारहवीं सदी तक महीन कपड़े के अंतर्राष्ट्रीय बाजार पर भारत का दबदबा था।

(ग) अमेरिकी गृहयुद्ध के फलस्वरूप भारत के कपास निर्यात में कमी आई।

(घ) फ्लाई शटल के आने से हथकरघा कामगारों की उत्पादकता में सुधार हुआ।

उत्तर

(क) सही

(ख) सही

(ग) गलत

(घ) सही।

प्रश्न 3. आदि-औद्योगीकरण का मतलब बताएँ।

उत्तर औद्योगीकरण का इतिहास प्रारंभिक फैक्टरियों की स्थापना से शुरू होता है। इंग्लैंड और यूरोप में फैक्टरियों की स्थापना से भी पहले ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन फैक्टरियों में नहीं होता था। बहुत सारे इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को पूर्व-औद्योगीकरण कहते हैं। इस पूर्व-औद्योगीकरण की अवस्था में व्यावसायिक आदान-प्रदान होता था। इस पर सौदागरों का नियंत्रण था और चीजों का उत्पादन कारखानों की बजाय घरों पर होता था। उत्पादन के प्रत्येक चरण में प्रत्येक सौदागर 20-25 मजदूरों से काम करवाता था। इस प्रकार औद्योगीकरण से पहले, फैक्टरियों की स्थापना से पहले के उत्पादन कार्य को आदि-औद्योगीकरण कहा जाता था।

चर्चा करें

प्रश्न 1. उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाए हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे?

उत्तर 19वीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाए हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता देते थे। इसके निम्नलिखित कारण थे


विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। इसलिए कम वेतन पर मजदूर मिल जाते थे। अतः उद्योगपति मशीनों की बजाए हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को ही रखते थे।


जिन उद्योगों में मौसम के साथ उत्पादन घटता-बढ़ता रहता था वहाँ उद्योगपति मशीनों की बजाए मजदूरों को ही काम | पर रखना पसंद करते थे।


बहुत सारे उत्पाद केवल हाथ से ही तैयार किए जा सकते थे। मशीनों से एक जैसे उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा | सकते थे। लेकिन बाजार में अक्सर बारीक डिजाइन और खास आकारों वाली चीजों की काफी माँग रहती थी । इन्हें बनाने के लिए यांत्रिक प्रौद्योगिकी की नहीं बल्कि इन्सानी निपुणता की जरूरत थी।


विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के कुलीन लोग हाथों से बनी चीजों को महत्व देते थे। हाथ से बनी चीजों को परिष्कार और सुरूचि का प्रतीक माना जाता था। उनको एक-एक करके बनाया जाता था और उनका डिजाइन भी अच्छा होता था।


यदि थोड़ी मात्रा में उत्पादन करना हो तो उसे मशीनों की बजाय श्रमिकों से ही कराया जाता था।


क्रिसमस के समय बाइंडरों और प्रिंटरों का कार्य मशीनों की बजाए मजदूरों की सहायता से अधिक अच्छी तरह से हो सकता था।


विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन के उच्च वर्ग के कुलीन व पूँजीपति वर्ग के लोग हाथों से बनी वस्तुओं को अधिक महत्त्व देते थे क्योंकि ये वस्तुएँ सुरुचि और परिष्कार की प्रतीक थी। इनमें अच्छी फिनिशिंग यानि सफाई होती थी। इनमें डिजाइनों की विविधता होती थी तथा इन्हें बड़ी मेहनत से बनाया जाता था।


प्रश्न 2. ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी कपड़े की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए क्या किया?

उत्तर  ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी कपड़े की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रबंध और नियंत्रण की एक नई व्यवस्था लागू की। यह काम निम्नलिखित तरीके से किया गया


कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को खत्म करने तथा बुनकरों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की। कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैयार कर दिए जिन्हें ‘गुमाश्ता’ कहा जाता था।


कंपनी का माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य खरीददारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गई। इसके लिए उन्हें पेशगी रकम दी जाती थी। एक बार काम का ऑर्डर मिलने पर बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए कर्ज दे दिया जाता था। जो कर्ज लेते थे उन्हें अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था। उसे वे और किसी व्यापारी को नहीं बेच सकते थे।


ये गुमाश्ता बुनकरों के बीच नहीं रहते थे इसलिए इनका बुनकरों से टकराव होने लगा। गुमाश्ता दंभपूर्ण व्यवहार करते थे तथा माल समय पर तैयार न होने की स्थिति में बुनकरों को पीटा करते थे। अब बुनकर न तो मोल-भाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे। उन्हें कंपनी से जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी पर वे कर्षों की वजह से कंपनी से बँधे हुए थे।

प्रश्न 3. कल्पना कीजिए कि आपको ब्रिटेन तथा कपास के इतिहास के बारे में विश्वकोश (Encyclopaedia) के लिए लेख लिखने को कहा गया है। इस अध्याय में दी गई जानकारियों के आधार पर अपना लेख लिखिए।

उत्तर इस परियोजना कार्य को विद्यार्थी स्वयं पूरा करेंगे। विद्यार्थियों की सहायता के लिए पाठ में दी गई जानकारी के आधार पर एक लेख यहाँ दिया जा रहा है

ब्रिटेन तथा कपास का इतिहास


इंग्लैंड में औद्योगीकरण से पहले भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था।


यह उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं होता था।


इस चरण को आदि औद्योगीकरण कहा जाता है।


इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले लेकिन उनकी संख्या में 18वीं सदी के अंत में तेजी से वृद्धि हुई।


कपास नए युग का प्रतीक था। 19वीं सदी के अंत में कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई।


1760 में ब्रिटेन अपने कपास उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए 25 लाख पौंड कच्चे कपास का आयात करता था।


1787 में यह आयात बढ़कर 220 लाख पौंड तक पहुँच गया।


यह वृद्धि उत्पादन की प्रक्रिया में बहुत सारे बदलावों का परिणाम था।


18वीं सदी में कई ऐसे अविष्कार हुए जिन्होंने उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण की कुशलता बढ़ा दी।


प्रति मजदूर उत्पादन बढ़ गया और पहले से ज्यादा मजबूत धागों व रेशों का उत्पादन होने लगा।


इसके बाद रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी।


अभी तक कपड़ा उत्पादन पूरे देहात में फैला हुआ था। यह काम लोग अपने घर पर ही करते थे लेकिन अब महँगी नयी मशीनें खरीदकर उन्हें कारखानों में लगाया जा सकता था।


कारखानों में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गई थीं।


सूती उद्योग और कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे।


कपास उद्योग 1840 के दशक तक औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था।


जब इंग्लैंड में कपास उद्योग विकसित हुआ तो वहाँ के उद्योगपति दूसरे देशों से आने वाले आयात को लेकर पेरशान दिखाई देने लगे।


उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़े पर आयात शुल्क वसूल करे जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में आराम से बिक सके।


दूसरी तरफ उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाजारों में भी बेचे।


1860 के दशक में बुनकरों के सामने नयी समस्या खड़ी हो गई।


उन्हें अच्छी कपास नहीं मिल पा रही थी।


जब अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू हुआ और अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई तो ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा।


प्रथम विश्व युद्ध के बाद आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जर्मनी में जापान के मुकाबले कमजोर पड़ जाने के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।


कपास का उत्पादन बहुत कम रह गया था और ब्रिटेन से होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में जबरदस्त गिरावट आई।


प्रश्न 4. पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा?

उत्तर प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन बढ़ा। इसके लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे


ब्रिटिश कारखाने सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे। इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। भारतीय बाजारों को रातों-रात एक विशाल देशी बाजार मिल गया।


भारतीय कारखानों में भी फौज के लिए जूट की बोरियाँ, फौजियों के लिए वर्दी के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन तथा बहुत सारे अन्य सामान बनने लगे।


नए कारखाने लगाए गए। पुराने कारखाने कई पालियों में चलने लगे। बहुत सारे नये मजदूरों को काम मिल गया। उद्योगपतियों के साथ-साथ मजदूरों को भी फायदा हुआ, उनके वेतन में बढ़ोतरी होने से उनकी कायापलट हो गई।


प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को फँसा देखकर राष्ट्रवादी नेताओं ने भी स्वदेशी चीजों के प्रयोग पर बल देना शुरू कर दिया जिससे भारतीय उद्योगों को और अधिक बढ़ावा मिला।


इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के कारण विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाजारों पर कब्जा कर लिया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत बना ली।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1. अपने क्षेत्र में किसी एक उद्योग को चुनकर उसके इतिहास का पता लगाएँ। उसकी प्रौद्योगिकी किस तरह बदली? उसमें मजदूर कहाँ से आते हैं? उसके उत्पादों का विज्ञापन और मार्केटिंग किस तरह किया जाता है? उस उद्योग के इतिहास के बारे में उसके मालिकों और उसमें काम करने वाले कुछ मजदूरों से बात करके देखिए।

उत्तर हमारे क्षेत्र में पत्थर और टाइलों का उद्योग काफी व्यापक स्तर पर फैला हुआ है। दुर्गापुरी चौक से लेकर लोनी तक इसके पचासों शोरूम व गोदाम हैं। पिछले पचास वर्षों से इस उद्योग में अनेक परिवर्तन आये हैं। पहले इसके चार-पाँच शोरूम व गोदाम ही हुआ करते थे लेकिन दिल्ली जैसे शहर में बढ़ते निर्माण कार्यों व आधुनिक निर्माण में घरों से लेकर बड़े-बड़े मॉलों तक में पत्थर के बढ़ते प्रयोग ने क्षेत्र में अनेक शोरूमों व गोदामों को फैलने का मौका दिया है।

बदलती प्रौद्योगिकी – पहले पत्थरों व टाइलों का यहाँ सिर्फ व्यापार होता था। राजस्थान के कोटा, जोधपुर व उदयपुर से पत्थर यहाँ लाकर बेचे जाते थे लेकिन बदलते फैशन में सिर्फ साधारण पत्थर के स्थान पर अब नक्काशीदार पत्थरों तथा पालिश किये गये पत्थरों की माँग ने यहाँ पत्थरों की कटाई-तराशी और पालिश की तकनीक में बहुत परिवर्तन ला दिया है। मशीनों द्वारा यहाँ पत्थरों को विभिन्न आकारों व डिजाइनों में काटा व तराशा जाता है। राजस्थान से लाए गए पत्थरों को विदेशों से लाए गए पत्थरों के साथ मेल करके पत्थरों की डिजाइनदार टाइलें बनायी जाती हैं। दीवारों व ड्राइंगरूम के लिए पत्थरों को लकड़ी व प्लास्टिक के फ्रेमों में भी जोड़ा व जड़ा जाता है। इसके लिये कुशल कारीगर व आधुनिक उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।

इन गोदामों व शोरूमों पर दो तरह के मज़दूर होते हैं-एक तो वे जो सिर्फ पत्थरों की ढुलाई का काम करते हैं व दूसरे वो जो इसकी कटाई व गढ़ाई का काम करते हैं । ढुलाई की मजदूरी करने वाले मजदूर प्रायः बिहार, उड़ीसा व उत्तर प्रदेश से यहाँ आते हैं तथा पत्थरों की नक्कासी व पॉलिश व घिसाई-कटाई करने वाले मज़दूर राजस्थान व कटकी से यहाँ आते हैं।

इस उद्योग के कुछ मालिकों व मजदूरों से बात करके पता चला कि यह उद्योग यहाँ 50-60 वर्षों से चल रहा है तथा चूंकि यह जगह औद्योगिक क्षेत्र के रूप में घोषित नहीं है इसलिये यहाँ के मालिक व मजदूर सरकारी उत्पीड़न के शिकार हैं तथा क्षेत्र में उद्योग के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

इसके उत्पादों का विज्ञापन और मार्केटिंग के बारे में पूछने पर बताया कि उन्हें इसके लिये विशेष प्रयास व उपाय करने की जरूरत नहीं पड़ती। दिल्ली व उसके आस-पास इस तरह की कुछ एक जगह ही हैं जैसे मंगोलपुरी, कीर्ति नगर आदि तथा निर्माण कार्य में लगी कम्पनियाँ व लोग स्वयं ही अच्छे पत्थरों व टाइलों की खोज में यहाँ स्वयं आते हैं तथा इस क्षेत्र में अच्छी क्वालिटी व कीमत कम होने के कारण इन्हें अपना ग्राहक बनाने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होती। बस स्थानीय निकायों की सख्ती ने कुछ लोगों को अपने शोरूम व गोदामों को अन्यत्र स्थानांतरित करने के लिए मजबूर कर दिया है। 50-60 वर्षों से चल रहे इस उद्योग का भविष्य सरकार की नीतियों के ऊपर निर्भर करता है।

NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 6 Work, Life and Leisure (काम, आराम और जीवन)



NCERT Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 6 Work, Life and Leisure (काम, आराम और जीवन)

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प्रश्न अभ्यास

पाठ्यपुस्तक से

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. अठारहवीं सदी के मध्य से लंदन की आबादी क्यों फैलने लगी? कारण बताइए।

उत्तर अठारहवीं सदी के मध्य से लंदन की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी। इसकी आबादी 6,75,000 तक पहुँच चुकी थी। इसके लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

(क) लंदन में औद्योगिक क्रांति के कारण आबादी तेज़ी से बढ़ी। हालाँकि, लंदन में विशाल कारखाने नहीं थे, फिर भी प्रवासी आबादी चुंबक की तरह उसी तरफ़ खिंची चली आती थी। गैरेथ स्टेडमैन जोन्स के शब्दों में, “19वीं शताब्दी का लंदन क्लर्को और दुकानदारों, छोटे पेशेवरों और निपुण कारीगरों, नौकरों, दिहाड़ी मजदूरों, कुशल व शारीरिक श्रम करने वालों की बढ़ती आबादी, सिपाहियों, फेरीवालों और भिखारियों का शहर था।”

(ख) रोजगार प्राप्त करने लोग लंदन की तरफ़ आ रहे थे। लंदन की गोदी के अलावा मुख्य रूप से पाँच तरह के बड़े उद्योगों में बहुत सारे लोगों को काम मिला हुआ था । ये उद्योग थे—परिधान और जूता उद्योग, लकड़ी व फर्नीचर उद्योग, धातु एवं इंजीनियरिंग उद्योग, छपाई और स्टेशनरी उद्योग तथा शल्य चिकित्सा उपकरण के घड़ी जैसे सटीक माप वाले उत्पादों और कीमती धातुओं की चीजें बनाने वाले उद्योग।

(ग) पहले विश्व युद्ध के दौरान लंदन में मोटरकार और बिजली के उपकरणों का भी उत्पादन होने लगा और विशाल कारखानों की संख्या बढ़ते-बढ़ते इतनी हो गई कि शहर की तीन-चौथाई नौकरियाँ इन्हीं कारखानों में सिमट गईं।

प्रश्न 2. उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के बीच लंदन में औरतों के लिए उपलब्ध कामों में किस तरह के बदलाव आए? ये बदलाव किन कारणों से आए?

उत्तर 18वीं सदी के अंत में और 19वीं सदी के प्रारंभ में फैक्टरियों में बहुत सारी औरतें काम करती थीं। जैसे-जैसे तकनीक में

सुधार आया, कारखानों में औरतों की नौकरियाँ छिनने लगीं और वे घरेलू कामों में सिमट कर रह गईं। 1861 की जनगणना से पता चला कि लंदन में लगभग ढाई लाख नौकर हैं। उनमें औरतों की संख्या बहुत ज्यादा थी। उनमें से अधिकांश हाल । ही में शहर में आई थीं। बहुत सारी औरतें परिवार की आय बढ़ाने के लिए अपने मकानों का भी इस्तेमाल करती थीं। वे या तो किसी को भाड़े पर रख लेती थीं या घर पर ही रहकर सिलाई-बुनाई, कपड़े धोने या माचिस बनाने जैसे काम करती थीं। 20वीं सदी में हालात फिर बदले। जब औरतों को युद्धकालीन उद्योगों और दफ्तरों में काम मिलने लगा तो वे घरेलू काम छोड़कर फिर बाहर आने लगीं।

प्रश्न 3. विशाल शहरी आबादी के होने से निम्नलिखित पर क्या असर पड़ता है? ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ समझाइए।

(क) ज़मींदार

(ख) कानून-व्यवस्था संभालने वाला पुलिस अधीक्षक

(ग) राजनीतिक दल का नेता

उत्तर

(क) जमींदार वर्ग – यह वर्ग बड़ी-बड़ी जमीनों का मालिक होता था। जब शहरों का विकास हुआ तो यह वर्ग शहरों में आकर रहने लगा था । इनकी ग्रामीण जीवन शैली पूरी तरह से बदल गई। जब शहरों में आबादी बढ़ने के कारण रहने की समस्या उत्पन्न हुई, तब इस वर्ग ने इस समस्या को हल करने में अपना योगदान दिया। जब मिलमालिकों और सरकार ने शहरों में निवास के नए मकान बनाने की जिम्मेवारी नहीं ली, तब इस वर्ग ने अपनी भूमि पर छोटे-छोटे मकान या चॉल आदि बनाकर मजदूरों और कारीगरों को किराए पर दिए जिससे ये धनी हो गए और जल्द ही इस धन से शहरों में इन्होंने अपने कारखाने स्थापित कर लिए। जब शहरों में शराबखोरी और गंदगी का माहौल उत्पन्न हो गया तो इस वर्ग ने इनसे निपटने के लिए संयमता आंदोलन प्रारंभ किया।

(ख) कानून-व्यवस्था संभालने वाला पुलिस अधीक्षक – शहरों में जब जनसंख्या बढ़ने लगी तब यहाँ पर कई तरह के अपराध भी होने लगे, क्योंकि गाँवों से ज्यादातर लोग यहाँ पर काम की तलाश में आए और जब उन्हें काम नहीं मिला तो अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए अपराध करने लगे। ऐसे में जिला प्रमुख पुलिस अधिकारी या पुलिस अधीक्षक की कानून-व्यवस्था को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका हो गई, क्योंकि परोपकारी जहाँ र गज में नैतिकता को लेकर चिंतित थे, वहीं उद्योगपति परिश्रमी और अनुशासित मजदूर वर्ग की चाह के कारण परेशान थे। अतः पुलिस द्वारा अपराधियों पर नजर रखी गई। साथ ही उनकी जिंदगी के तौर-तरीकों की जाँच की जाने लगी। जनता में अनुशासन बनाए रखने के लिए पुलिस और शासन द्वारा अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा दी गई। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटा गया। ये सभी कार्य पुलिस अधीक्षक के अधीन पुलिस विभाग के अन्य अधिकारियों द्वारा किए गए। इसके अतिरिक्त शासन द्वारा लायक गरीब लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध करवाए गए ताकि वे अपराध की ओर आकर्षित न हो।

(ग) राजनैतिक दल का नेता – जब शहरों का विकास हुआ तो यहाँ पर अन्य चीजों के विकास के साथ-साथ राजनैतिक गतिविधियाँ भी आरंभ हुईं। जब जनसंख्या वृद्धि के कारण यहाँ पर अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुईं तब अवसरवादी नेताओं ने इनका लाभ उठाते हुए मजदूरों और कारीगरों के संगठन बनाए तथा हड़तालें आदि करवाने लगे। इन्होंने जनता को आश्वासन दिया कि वे उनकी समस्याओं का जल्द से जल्द हल करवाएंगे। इस प्रकार से इन्होंने अपने और अपने दल के लिए जनसमर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।

प्रश्न 4. निम्नलिखित की व्याख्या करें –

(क) 19वीं सदी में धनी लंदनवासियों ने गरीबों के लिए मकान बनाने की ज़रूरत का समर्थन क्यों किया?

(ख) बंबई की बहुत सारी फ़िल्में शहर में बाहर से आने वालों की जिंदगी पर आधारित क्यों होती थीं?

(ग) 19वीं सदी के मध्य में बंबई की आबादी में भारी वृद्धि क्यों हुई?

उत्तर

(क) 19वीं सदी में धनी लंदनवासियों ने गरीबों के लिए मकान बनाने का समर्थन निम्नलिखित कारणों से किया


गरीबों के एक कमरे वाले मकानों में भीड़ रहती थी, वहाँ हवा निकासी का इंतजाम नहीं था और साफ़-सफ़ाई की सुविधाएँ नहीं थीं।


खस्ताहाल मकानों के कारण आग लगने का खतरा बना रहता था।


इस विशाल जनसमूह के कारण सामाजिक उथल-पुथल की आशंका दिखाई देने लगी थी। 1917 की रूसी क्रांति के बाद यह डर काफ़ी बढ़ गया था। लंदन के गरीब कहीं विद्रोह न कर दें, इस आशंका से निपटने के लिए मजदूरों के लिए आवासीय योजनाएँ शुरू की गईं।


(ख) बम्बई में जो फिल्में बनीं उनमें से कई फिल्में बाहर से आने वाले लोगों की जिंदगी पर आधारित होती थीं। इसके कई कारण थे


इनमें उनके जीवन में आने वाली दैनिक समस्याओं को दिखाया गया।


इनमें लोकप्रिय गीतों द्वारा शहरों के अंतर्विरोधों को दर्शाया गया जैसे सी.आई.डी. का गाना ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हटके जरा बचके यह है बंबई मेरी जान।


इनमें उन लोगों के जीवन को भी दर्शाया गया जो बंबई को सपनों का शहर समझकर आते थे और यहाँ पर अनेक कठिनाईयों का सामना करते थे।


इनमें शहरी अमीरों और बाहर से आने वाले गरीबों के बीच के अंतर्विरोधों को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाता था।


बाहर से आने वाले लोगों को बंबई के जीवन में गंदा वातावरण, आवासी मकानों का अभाव, लोगों का संकीर्ण दृष्टिकोण, मानव-मूल्यों की उपेक्षा, गरीबी और अपराध को फिल्मों में दिखाया गया।


(ग) 19वीं सदी के मध्य में बंबई की आबादी में भारी वृद्धि के कारण


शहरी आकर्षण – बंबई की आबादी बढ़ने का मुख्य कारण लोगों का शहरों के प्रति बढ़ता आकर्षण था, जिससे आकर्षित होकर लोग यहाँ पर आकर रहने लगे। उन्होंने आधुनिक जीवन शैली को अपनाने के साथ-साथ रोजगार के नये अवसरों की तलाश कर अपना जीवन-स्तर ऊँचा उठाया। जैसे-रहन-सहन की आधुनिक जीवन पद्धति, रोजगार के नए अवसर, आदि।


व्यापारिक कारण – बंबई देश की प्रमुख बंदरगाहों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में वस्तुओं का आयात निर्यात होता था। इस कारण यह पश्चिमी भारत का प्रशासनिक और व्यापारिक केन्द्र बन गया जिससे लोग नवीन व्यापारिक अवसरों को प्राप्त करने के लिए यहाँ आने लगे।


रोजगार के नवीन अवसर – 1819 में बंबई को प्रेसीडेंसी की राजधानी घोषित कर दिया गया। परिणामस्वरूप बंबई एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र के रूप में प्रकट हो गया। इस कारण व्यापारी, महाजन, जमींदार आदि यहाँ पर नवीन व्यापार के लिए आने लगे। आम ग्रामीण लोग यहाँ पर रोजगार के अवसर को प्राप्त करने के लिए तथा फिल्मी जगत में अपना भाग्य आजमाने के लिए आने लगे।


आवागमन का विकास – बंबई जब प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक केन्द्र बन गया तब यहाँ पर आवागमन की सुविधाओं का भी विकास हुआ, जिस कारण लोगों का यहाँ आना जाना आसान हो गया।


प्राकृतिक प्रकोप – 1888-89 के बीच कच्छ के सूखे क्षेत्रों में अकाल पड़ने के कारण लोग यहाँ पर काम की तुलाश में आए। 1898 में जब प्लेग एक महामारी के रूप में फैला तब भी लोग इससे बचने के लिए बंबई आ गए। अंतत: उपरोक्त कारणों से बंबई की आबादी बढ़ गई।


चर्चा करें।

प्रश्न 1. लोगों को मनोरंजन के अवसर उपलब्ध कराने के लिए इंग्लैंड में 19वीं सदी में मनोरंजन के कौन-कौन से साधन सामने आए?

उत्तर 19वीं सदी में इंग्लैंड में मनोरंजन के निम्नलिखित साधन सामने आए


लंदन के अमीर वर्ग के लोगों के लिए एक वार्षिक उत्सव होता था जिसे ‘लंदन सीजन’ कहा जाता था। इसमें ऑपेरा, रंगमंच और शास्त्रीय संगीत आदि कई प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन किए जाते थे।


मेहनतकश अपना खाली समय पब या शराबघरों में बिताते थे। इस मौके पर वे खबरों का आदान-प्रदान भी करते थे और कभी-कभी राजनीतिक कर्रवाइयों के लिए गोलबंदी भी करते थे।


19वीं सदी में लोगों को इतिहास की जानकारी देने के लिए बहुत सारे पुस्तकालय, कला दीर्घाएँ और संग्रहालय खोले गये जिसमें काफी संख्या में दर्शक आते थे।


निचले वर्ग के लोगों में मनोरंजन के साधन के रूप में संगीत सभा काफी लोकप्रिय थी।


20वीं सदी के प्रारंभ तक विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों के लिए सिनेमा मनोरंजन का जबरदस्त साधन बन गया।


औद्योगिक मजदूर छुट्टी के दिनों में समुद्र के किनारे जाकर धूप और स्वच्छ हवा का आनंद उठाने लगे।


प्रश्न 2. लंदन में आए उन सामाजिक परिवर्तनों की व्याख्या करें जिनके कारण भूमिगत रेलवे की जरूरत पैदा हुई। भूमिगत रेलवे के निर्माण की आलोचना क्यों हुई?

उत्तर भूमिगत रेलवे की आवश्यकता


इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद लोग बड़ी संख्या में शहरों की तरफ रूख करने लगे। हालाँकि लंदन में विशाल | कारखाने नहीं थे फिर भी प्रवासी आबादी लंदन की तरफ आने लगी।


लंदन की गोदी के अलावा मुख्य रूप से पाँच तरह के बड़े उद्योगों में बहुत सारे लोग काम पर लगे हुए थे-परिधान और जूता उद्योग, लकड़ी के फर्नीचर उद्योग, धातु एवं इंजीनियरिंग उद्योग, छपाई और स्टेशनरी उद्योग तथा शल्य चिकित्सा उपकरण उद्योग आदि।


लंदन में आबादी बढ़ने के साथ-साथ अपराध भी बढ़ने लगे। 1870 के दशक में लंदन में आवास, भोजन तथा साफ सफाई की समस्याएँ बढ़ने लगी।


लोगों के लिए अच्छे आवास की व्यवस्था करना जरूरी हो गया था। विश्व युद्धों के दौरान मजदूर वर्ग के लिए आवास का इंतजाम करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश राज्य ने अपने ऊपर ले ली और स्थानीय शासन के जरिए 10 लाख मकान बनाए गए। शहर के आसपास उपशहरी बस्तियाँ अस्तित्व में आ चुकी थीं।


लोगों को उपनगरीय बस्तियों से शहर तक लाने के लिए परिवहन की कोई सुविधा नहीं थी।


लोगों को उपशहरी बस्तियों में रहने के लिए तभी तैयार किया जा सकता था जबकि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बनाई जाती।


इसी बात को ध्यान में रखकर लंदन में भूमिगत रेलवे का निर्माण किया गया। लंदन की भूमिगत रेलवे ने आवास की समस्या को काफी हद तक हल कर दिया था। लोग इसके जरिए शहर के भीतर-बाहर आ-जा सकते थे।


भूमिगत रेलवे की आलोचना के कारण – दुनिया की सबसे पहली भूमिगत रेल के पहले खंड का उद्घाटन 10 जनवरी 1863 को किया गया। पहले दिन 10,000 यात्रियों ने इसमें यात्रा की। 1880 तक भूमिगत रेल नेटवर्क का विस्तार हो चुका था। प्रारंभ में भूमिगत यात्रा की कल्पना से लोग डर जाते थे। इस भूमिगत रेल की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाने लगी


रेल के डिब्बे मुसाफिरों से भरे रहते थे। डिब्बे का माहौल सल्फर, कोयले की धूल और ऊपर लगे गैस के लैंप से निकलती गंध से भरा हुआ था।


लोग अपने गंतव्य स्थल पर पहुँचने तक श्वासावरोधन और गर्मी के कारण बेहाल हो जाते थे। लोगों का कहना था कि इन रेलगाड़ियों को फौरन बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए खतरा है।


बहुत सारे लोगों का मानना था कि इन “लौह दैत्यों’ ने शहर में अफरा-तफरी और अस्वास्थ्यकर माहौल बढ़ा दिया है।


भूमिगत रेलवे के निर्माण की प्रक्रिया में होने वाले बेहिसाब विनाश के कारण भी लोगों ने इसका विरोध किया। एक नागरिक का कहना था कि मकान गिरा दिए गए, सड़कों को तोड़कर बंद कर दिया गया, जमीन में गहरे गड्ढे और खाइयाँ खोद दी गईं और चारों तरफ बेहिसाब मिट्टी और धूल के अंबार लगा दिए गए।


इस प्रकार लंदन में बनी भूमिगत रेलवे के कारण लंदन के गरीबों को काफी बड़ी संख्या में उजाड़ा गया। इन सारी आलोचनाओं के बावजूद इस भूमिगत रेलवे को जबरदस्त कामयाबी हासिल हुई।

प्रश्न 3. पेरिस के हॉसमानीकरण से क्या अभिप्राय है? इस तरह के विकास को आप किस हद तक सही या गलत मानते हैं? इस बात का समर्थन या विरोध करते हुए अखबार के संपादक को पत्र लिखिए और उसमें अपने दृष्टिकोण के पक्ष में कारण दीजिए?

उत्तर पेरिस का हाँसमानीकरण –


1852 में लुई नेपोलियन तृतीय को फ्रांस का सम्राट घोषित किया गया।


सम्राट बनते ही उसने पेरिस के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ किया। इसके लिए उसने बैरान हॉसमान नामक वास्तुकार

को चुना जिसने 17 वर्षों (1852-59) में यह कार्य पूर्ण किया। इसके लिए उसने पेरिस के मध्य से गरीबों की बस्तियों को साफ किया ताकि कोई विद्रोह ना हो। शहर में सीधी और चौड़ी सड़कें बनाई गईं, खुले मैदान बनाए गए और बड़ेबड़े पेड़ लगवाए गए तथा सुरक्षा के लिए पुलिस का प्रबंध किया गया, पानी का प्रबंध किया गया और बस अड्डे बनाए गए। इस कायाकल्प को पेरिस का हॉसमानीकरण कहा जाता है। इस कार्य में लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ।


पक्ष में तर्क


इससे पेरिस का पुनर्निर्माण हुआ।


सड़कों को चौड़ा किया गया और उसके दोनों किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाए गए।


खुले मैदान बनाए गए।


सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया और रात में गश्त प्रारंभ की गई।


हजारों लोगों को रोजगार मिला।


शहर में पानी की व्यवस्था की गई।


बस अड्डे बनाए गए यानि आवागमन की व्यवस्था को भी सुधारा गया।


विपक्ष में तर्क


इसके लिए लगभग 3,50,000 लोगों के घरों को उजाड़ा गया।


गरीबों की बस्तियों को उजाड़ा गया।


प्राचीन जीवन पद्धति जिसमें मेल-मिलाप और अपनापन था वह खत्म हो गया। उसकी जगह उच्चवर्गीय संस्कृति की स्थापना हुई।


इससे वृद्ध और परंपरागत विचारधारा वाले लोगों को बहुत दुख हुआ। उनकी भावनाओं को ठेस पहुँची।


अखबार के संपादक को पत्र

संपादक जी,

हिन्दुस्तान टाइम्स,

दिल्ली-110001

विषय – हॉसमानीकरण के पक्ष में विचार!

आपका अखबार फ्रांस के ज्यादातर लोगों द्वारा पढ़ा जाता है। अतः मैं आपके अखबार के माध्यम से पेरिस हॉसमानीकरण के पक्ष में अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूँ। यद्यपि इसके विरोध में कई जगहों पर प्रदर्शन आदि हो रहे हैं पर हमें इसके अच्छे पक्ष को भी देखना चाहिए जो इस नवीन रचना का उद्देश्य है।

इससे पेरिस का पुनर्निर्माण हुआ है, शहर की गंदगी साफ हुई है, सुरक्षा, यातायात, पानी आदि की व्यवस्थाओं में सुधार हुआ है। पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सड़कों के दोनों तरफ छायादार वृक्ष लगाए गए हैं। तथा बाग बनाए गए हैं। सड़कों को सीधा और चौड़ा किया जा रहा है। इससे पेरिस एक नवीन रूप लेकर सामने आ रहा है जो आने वाले समय में सबके आकर्षण का केन्द्र बनेगा । अतः मैं हॉसमानीकरण का समर्थन करता हूँ और चाहता हूँ। कि आप मेरे पत्र को अपने अखबार में छापकर अन्य लोगों को भी इस परिवर्तन के पक्ष में सोच-विचार करने का मौका दें।

भवदीय

क ख ग

प्रश्न 4. सरकारी नियमन और नये कानूनों ने प्रदूषण की समस्या को किस हद तक हल किया? निम्नलिखित के स्तर में | परिवर्तन के लिए बने कानूनों की सफलता और विफलता का एक-एक उदाहरण दीजिए

(क) सार्वजनिक जीवन

(ख) निजी जीवन

उत्तर औद्योगीकरण के कारण लंदन की बढ़ती आबादी ने सफाई और स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएँ पैदा कर दीं। गरीबों के एक कमरे वाले मकानों में जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा था। इन मकानों में भीड़ रहती थी, हवा निकासी का इंतजाम नहीं था। लंदन को साफ-सुथरा बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयास किए गए। भीड़ भरी बस्तियों की भीड़ कम करने, खुले स्थानों को हरा-भरा बनाने, आबादी कम करने और शहर को योजनानुसार बसाने के लिए कोशिशें शुरू कर दी गई।

(क) सार्वजनिक जीवन में सुधार लाने के लिए उठाए गए कदम


मकानों की भारी किल्लत के असर को काबू करने के लिए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान किराया नियंत्रण कानून लागू किया गया।


वास्तुकार और योजनाकार एवेनेजर हावर्ड ने गार्डन सिटी की अवधारणा दी। उन्होंने एक ऐसे शहर का खाका खींचा जहाँ पेड़-पौधों की भरमार हो और जहाँ लोग रहते भी हों, काम भी करते हों।


हावर्ड के विचारों के आधार पर रेमंड अनविन और बैरी पार्कर ने न्यू अर्जविक नाम से एक गार्डन सिटी का डिजाइन तैयार किया। इसमें साझा बाग-बगीचे, खूबसूरत नजारों का इंतजाम किया गया था। हर चीज को बड़ी बारीकी से सजाया गया था।


लंदन के इर्द-गिर्द हरित पट्टी विकसित की गई।


(ख) निजी जीवन में सुधार के कदम –


बर्लिन और न्यूयार्क जैसे शहरों की तर्ज पर अपार्टमेंट्स के विशाल ब्लॉक बनाए गए।


विश्व युद्धों के दौरान मजदूर वर्ग के लिए आवास का इंतजाम करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश राज्य ने अपने ऊपर ले ली और स्थानीय शासन के जरिये 10 लाख मकान बनाए गए।


इस प्रकार प्रदूषण कम करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए किंतु उनका फायदा केवल समाज के अमीर वर्ग को ही मिला। गार्डन सिटी में बने मकानों को केवल खाते-पीते कामगार ही खरीद सकते थे। लंदन व पेरिस के अमीर देहात में अवकाश गृह बनवाने का खर्चा उठा सकते थे किंतु यह विकल्प सबके पास नहीं था।