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NCERT Solutions for Class 12 Geography (Hindi Medium)

 


NCERT Solutions for Class 12 Geography (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Geography Fundamentals of Human Geography (खण्ड 1: मानव भूगोल के मूल सिद्धांत)

NCERT Solutions for Class 12 Geography India – People and Economy (खण्ड 2: भारत – लोग और अर्थव्यवस्था)

NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography (खण्ड 3: भूगोल के प्रयोगात्मक कार्य)

NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 6 Spatial Information Technology (Hindi Medium)

 


NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 6 Spatial Information Technology (Hindi Medium)

अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।
(i) स्थानिक आंकड़ों के लक्षण निम्नांकित स्वरूप में दिखाई देते हैं।
(क) अवस्थितिक
(ख) रैखिक
(ग) क्षेत्रीय
(घ) उपर्युक्त सभी स्वरूपों में
(ii) विश्लेषक मॉड्यूल सॉफ्टवेयर के लिए कौन-सा एक प्रचालन आवश्यक है?
(क) आंकड़ा संग्रहण
(ख) आंकड़ा प्रदर्शन
(ग) आंकड़ा निष्कर्षण
(घ) बफ़रिंग
(iii) चित्ररेखा पूँज (रैस्टर) आंकड़ा फॉरमेट का एक अवगुण क्या है?
(क) सरल आंकड़ा संरचना
(ख) सहज एवं कुशल उपरिशायी
(ग) सुदूर संवेदन प्रतिबिंब के लिए सक्षम
(घ) कठिन परिपथ चाल विश्लेषण
(iv) भौगोलिक सूचना तंत्र कोट में उपयोग कर नगरीय परिवर्तन की पहचान कुशलतापूर्वक की जाती है
(क) उपरिशायी प्रचालन
(ख) सामीप्य विश्लेषण
(ग) परिपथ जाल विश्लेषण
(घ) बफ़रिंग

उत्तर:
(i) (ख) रैखिक
(ii) (घ) बफ़रिंग
(iii) (घ) कठिन परिपथ चाल विश्लेषण
(iv) (ख) उपरिशायी प्रचालन

प्र० 2. निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) चित्र रेखा पूँज एवं सदिश (वेक्टर) आंकड़ा मॉडल के मध्य अंतर।
उत्तर: चित्ररेखा पूँज (रैस्टर) आंकड़ा फॉर्मेट में आंकड़ों को वर्गों के जाल के प्रारूप में ग्राफिक प्रदर्शन किया जाता है। जबकि सदिश (वैक्टर) आंकड़े वस्तुओं को विशिष्ट बिंदुओं के बीच खींची गई रेखाओं के समुच्चय के रूप में | प्रदर्शित करते हैं।
(ii) उपरिशायी विश्लेषण क्या है?
उत्तर: अधिचित्रण विश्लेषण को उपरिशायी भी कहते हैं? भौगोलिक सूचना तंत्र का प्रमाण चिह्न अधिचित्रण प्रचालन है। इस विधि का प्रयोग करके मानचित्रों के बहुगुणी स्तरों को समन्वय एक महत्त्वपूर्ण विश्लेषण क्रिया है। इसमें दो अथवा अधिक विषयक स्तरों का अधिचित्रण करके नया मानचित्र स्तर प्राप्त किया जा सकता है।

(iii) भौगोलिक सूचना तंत्र में हस्तचलित (हस्तेन) विधि के गुण क्या हैं?
उत्तर: भौगोलिक सूचना तंत्र में हस्तेन निवेश की चार मुख्य अवस्थाएँ होती हैं
(i) स्थानिक आंकड़ों की प्रविष्टि
(ii) गुण न्यास की प्रविष्टि
(iii) स्थानिक और गुण न्यास का सत्यापन तथा संपादन
(iv) जहाँ आवश्यक हो स्थानिक का गुण न्यास से योजन करना।
आंकड़ा निवेश की हस्तेन विधियाँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि सूचनाधार की संस्थिति सदिश (वैक्टर) है। अथवा चित्र रेखापूँज वाली। भौगोलिक सूचना तंत्र में स्थानिक आंकड़ों के निवेश की सर्वाधिक प्रचलित विधियाँ अंकरूपण तथा क्रमवीक्षण हैं।
(iv) भौगोलिक सूचना तंत्र के महत्त्वपूर्ण घटक क्या हैं?
उत्तर: भौगोलिक सूचना तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं-
(i) हार्डवेयर
(ii) सॉफ्टवेयर
(iii) आंकड़े
(iv) लोग
(v) प्रक्रिया
इन्हें चित्र के माध्यम से भी दर्शाया जा सकता है।

(v) भौगोलिक सूचनातंत्र के कोर में स्थानिक सूचना बनाने की विधि क्या है?
उत्तर: भौगोलिक सूचना तंत्र के क्रोड में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूर्व-आवश्यक वस्तु स्थानिक आंकड़े हैं जिन्हें भौगोलिक सूचनातंत्र के क्रोड में अनेक विधियों द्वारा संग्रहित किया जाता है। जैसे
(i) आंकड़ा आपूर्तिदाता से अंकित रूप में आंकड़े प्राप्त करना।
(ii) विद्यमान अनुरूप आंकड़ों का अंकीकरण
(iii) भौगोलिक सत्ताओं का स्वयं सर्वेक्षण करके।
(vi) स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी क्या है?
उत्तर: स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी का संबंध स्थानिक सूचना के संग्रहण, भंडारण, पुनर्घाप्ति, प्रदर्शन हेरफेर, प्रबंधन तथा विश्लेषण में प्रौद्योगिक निवेश के प्रयोग से है। वास्तव में यह सुदूर-संवेदन, वैश्विक स्थिति-निर्धारण तंत्र, भौगोलिक सूचना तंत्र, आंकिक मानचित्र कला और सूचनाधार प्रबंध प्रणालियों का सम्मिश्रण है।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दों में दीजिए।
(i) चित्र रेखा पूँज (रैस्टर) एवं सदिश (वेक्टर) आंकड़ा फॉमेट को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: स्थानिक आंकड़ों का प्रदर्शन चित्र रेखा पूँज (रैस्टर) और सदिश (वैक्टर) फार्मेटों द्वारा होता है,
चित्र रेखा पुँज आंकड़ा फॉर्मेट – यह वर्गों के जाल के रूप में आंकड़ों का ग्राफी प्रदर्शन है, इसमें स्तंभों व पंक्तियों का जाल होता है जिसे ग्रिड (Grid) कहते हैं। एक स्तंभ व एक पंक्ति के भेदन स्थल को सेल (cell) कहते हैं। प्रत्येक सेल को एक स्थान दिया जाता है तथा उसके आधार पर ही इसका मूल्य निर्धारित किया जाता है। इसकी पंक्तियों व स्तंभों के निर्देशांक किसी भी व्यक्तिगत पिक्सेल (Pixel) की पहचान कर सकते हैं। आंकड़ों का यह प्रदर्शन प्रयोक्ता की प्रतिबिंब के पुनर्गठन अथवा दृश्यांकन में, सहायता करता है। सेलों के आकार तथा उनकी संख्या के बीच संबंध को चित्र रेखा पूँज (रैस्टर) के विभेदन के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। रैस्टर फार्मेट में आंकड़ों पर जाल या वर्ग के आकार के प्रभाव को स्पष्ट किया जाता है।

चित्ररेखा पूँज (रैस्टर) फाइल फॉर्मेटों का प्रयोग प्रायः निम्नक्रियाओं के लिए किया जाता है
(i) वायव फ़ोटोग्राफों, उपग्रहीय प्रतिबिंबों, क्रमवीक्षित कागजी मानचित्रों के आंकिक प्रदर्शन के लिए।
(ii) जब लागत/कीमत को कम करना आवश्यक हो।
(iii) जब मानचित्र में व्यक्तिगत मानचित्रीय लक्षणों का विश्लेषण आवश्यक हो।
(iv) जब ‘बैकड्राप’ मानचित्रों की आवश्यकता हो।
सदिश ( वेक्टर) आँकड़ा फॉर्मेट – एक सदिश (वेक्टर) आंकड़ा फॉर्मेट अपने यथार्थ निर्देशांकों द्वारा भंडारित बिंदुओं का प्रयोग करता है। इसमें रेखाओं और क्षेत्रों का निर्माण बिंदुओं के अनुक्रम होता है। रेखाओं की दिशा बिंदुओं के क्रमण के अनुरूप होती हैं। बहुभुजों का निर्माण बिंदुओं अथवा रेखाओं द्वारा होता है। सदिश (वेक्टर) आंकड़ों के निवेश के लिए हस्तेन अंकीकरण सर्वोत्तम विधि है। सदिश आंकड़ा प्रदर्शन, केवल निर्देशांकों के आरंभिक तथा अंतिम बिंदुओं को अंकित कर रेखा की स्थिति स्पष्ट करके होगा। प्रत्येक बिंदु की अभिव्यक्ति दो अथवा तीन संख्याओं के रूप में होगी। यह इस तथ्य पर निर्भर करेगा कि प्रदर्शन द्वि-आयामी है अथवा त्रि-आयामी। इन्हें प्रायः X, Y तथा X, Y, Z निर्देशांकों द्वारा निर्दिष्ट किया जाता हैं।

(ii) भौगोलिक सूचना तंत्र से संबंधित कार्यों को क्रमबद्ध रूप में किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर: भौगोलिक सूचनातंत्र से संबंधित क्रियाओं को क्रमबद्ध रूप में करना होता है जैसे
(i) स्थानिक आंकड़ा निवेश – इसमें आंकड़ा आपूर्तिदाता से आंकिक आंकड़ा समुच्चय का प्रग्रहण करके, जो विभिन्न स्रोतों से प्राप्त हुए होते है, उनकी जाँच की जाती है कि आंकड़े अपने अनुप्रयोग के साथ संगत हैं।
अथवा नहीं। याद ऐसा नहीं है तो उन्हें संगत बनाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
(ii) गुणन्यास की प्रविष्टि – इसमें प्रकाशित रिकार्डी, सरकारी जनगणनाओं, प्राथमिक सर्वेक्षणों अथवा स्प्रेडशीटों जैसे स्रोतों से उपार्जित गुण न्यास को GIS सूचनाधार में या तो हस्तेन अथवा मानक स्थानांतरण फार्मेट का प्रयोग करते हुए, आंकड़ों को प्राप्त करके निवेश किया जाता है।
(iii) आंकड़ों का सत्यापन तथा संपादन – इसमें आंकड़ों की शुद्धता को सुनिश्चित करने हेतु त्रुटियाँ की पहचान तथा उनमें आवश्यक संशोधन के लिए भौगोलिक सूचना तंत्र में प्रग्रहित आंकड़ों को सत्यापन की आवश्यकता होती है। स्थानिक और गुण-न्यास के प्रग्रहण, के दौरान उत्पन्न त्रुटियों को इस तरह वर्गीकृत किया जा सकता
(क) स्थानिक आंकड़े अपूर्ण अथवा दोहरे हैं।
(ख) स्थानिक आंकड़े गलत मापनी पर है।
(ग) स्थानिक आंकड़े विरुपित हैं।
(iv) स्थानिक और गुण न्यास आंकड़ों की सहलग्नता – इसमें आंकड़े एक-दूसरे से सुमेलित होने चाहिए।
(v) स्थानिक विश्लेषण-स्थानिक विश्लेषण की कई विधियाँ है जैसे
(क) अधिचित्रण विश्लेषण
(ख) ब्रफर विश्लेषण
(ग) परिपथ जाल विश्लेषण
(घ) आंकिक भू-भाग मॉडल। भौगोलिक सूचना तंत्र में विश्लेषण के लिए ये सभी विधियाँ उपयोग में लाई
जाती हैं। कौन-सी विधि कहाँ उपयुक्त होगी यह निश्चित करके ही उसका उपयोग करना चाहिए।

NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 5 Field Surveys (Hindi Medium)

 


NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 5 Field Surveys (Hindi Medium)

अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से एकसही उत्तर का चुनाव कीजिए।
(i) क्षेत्र सर्वेक्षण की योजना के लिए नीचे दी गयी विधियों में कौन-सी विधि सहायक है?
(क) व्यक्तिगत साक्षात्कार
(ख) द्वितीयक सूचनाएँ
(ग) मापन
(घ) प्रयोग
(ii) क्षेत्र सर्वेक्षण के निष्कर्ष के लिए क्या किया जाना चाहिए।
(क) आंकड़ा प्रवेश एवं सारणीयन
(ख) प्रतिवेदन लेखन
(ग) सूचकांकों का अभिकलन
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं
(iii) क्षेत्र सर्वेक्षण के प्रांरभिक स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण क्या है?
(क) उद्देश्यों का निर्धारण
(ख) द्वितीयक आंकड़ों का संग्रहण
(ग) स्थानिक एवं विषयक सीमाओं को परिभाषित करना
(घ) निदर्शन अभिकल्पना

उत्तर:
(i) (क) व्यक्तिगत साक्षात्कार
(ii) (ग) सूचकांकों का अभिकलन
(iii) (ग) स्थानिक एवं विषयक सीमाओं की परिभाषित करना

प्र० 2. निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) क्षेत्र सर्वेक्षण क्यों आवश्यक है?
उत्तर: क्षेत्रीय सर्वेक्षण स्थानीय स्तर पर स्थानिक वितरण के प्रारूपों, उनके साहचर्य तथा अंतर्संबंधों के बारे में हमारी समझ को बढ़ाते हैं। इनके अलावा स्थानीय स्तर की सूचनाओं को एकत्रित करने में, जो कि द्वितीयक स्रोतों से उपलब्ध नहीं हैं, हमारी मदद करते हैं। इस तरह क्षेत्रीय सर्वेक्षणों का आयोजन वांछित सूचनाओं के एकत्रण में सहायक होते हैं।
(ii) क्षेत्र सर्वेक्षण के उपकरण एवं प्रविधियों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर: क्षेत्रीय सर्वेक्षण के लिए कुछ जरूरी उपकरण पर्यवेक्षक के पास होने चाहिए जैसे-प्रश्नावली कागज अथवा नोट करने योग्य डायरी, पेन, पेंसिल, रबर, शार्पनर, फीता, ऊँचाई/गहराई मापने का यंत्र, मिट्टी की अम्लीयता/क्षारीयता मापने की सामग्री, प्रदूषण को मापने की किट, दिशामापी (दिक् सूचक) आंकड़ों के प्रक्रमण के लिए उचित सॉफ्टवेयर के साथ एक लैपटॉप, कैमरा, क्षेत्रीय मानचित्र यदि उपलब्ध है तो इत्यादि। इसके अलावा द्वितीयक स्रोतों से प्राप्त आंकड़े व सूचनाएँ, भू-संपत्तियों का विवरण पत्रक एवं निर्वाचन सूची जिसमें परिवारों उनके मुखिया से संबंधित जानकारियाँ दी गई हों इत्यादि। साथ ही क्षेत्रीय सर्वेक्षण के उद्देश्य, प्रयोजन को सीमांकित करते हुए उपयुक्त समय का चुनाव किया जाना चाहिए ताकि वहाँ के अधिकांश निवासियों से आप सूचनाएँ प्राप्त कर सकें।
(iii) क्षेत्र सर्वेक्षण के चुनाव के पहले किस प्रकार के व्याप्ति क्षेत्र की आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर: अन्वेषक के लिए सर्वेक्षण क्षेत्र को चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण होता है साथ ही उसे यह निर्णय करना होता है कि सर्वेक्षण संपूर्ण जनसंख्या अथवा समग्र के लिए आयोजित किया जाना है अथवा चयनित प्रतिदर्श (चुने हुए सैंपलस) पर आधारित किया जाना है। यदि अध्ययन के लिए चुना गया क्षेत्र बहुत विस्तृत नहीं है। तब समग्र अथवा सभी घटकों का सर्वेक्षण किया जा सकता है। अन्यथा बृहत आकार की स्थिति में चयनित प्रतिदर्श तक ही सीमित रहना उपयुक्त होता है।
(iv) सर्वेक्षण अभिकल्पना को संक्षिप्त में समझाएँ।
उत्तर: सर्वेक्षण की अभिकल्पना को कार्यात्मक दृष्टि से निम्नलिखित चरणों में पूरा किया जाता है
प्रथम चरण – समस्या को परिभाषित करना-सर्वेक्षण के लिए चुनी गई समस्या को सुस्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। समस्या की प्रकृति को इंगित करते हुए सर्वेक्षण के विषय के शीर्षक तथा उपशीर्षक में उसकी झलक दिखनी चाहिए।
दूसरा चरण-उद्देश्य – सर्वेक्षण के उद्देश्यों, विशिष्ट उद्देश्यों को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। उद्देश्य सर्वेक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुरूप ही आंकड़ों को एकत्रित किया जाता है तथा उनके विश्लेषण की उपयुक्त विधियों का चयन किया जाता है।
तीसरा चरण-प्रयोजन – सर्वेक्षण हेतु चुने गए संदर्भित भौगोलिक क्षेत्र को सीमांकित करना, समय सीमा व प्रसंगों को सीमांकित करना ही प्रयोजन है।
चौथा चरण-विधियाँ एवं तकनीकें – चयनित समस्या से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए क्षेत्रीय सर्वेक्षण आयोजित किए जाते हैं। सूचनाएँ अथवा आंकड़े किन स्रोतों से, किस विधि से प्राप्त हुए हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण है साथ ही आंकड़ों के सारणीयन, प्रक्रमण, आरेखीय प्रदर्शन व मानचित्र विधियों/तकनीकों का चयन भी आवश्यक हैं।
पांचवाँ चरण-संकलन एवं परिकलन – अर्थपूर्ण विवेचन एवं विश्लेषण द्वारा ही सर्वेक्षण के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है। जितनी भी सूचनाएँ व आंकड़े सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त हुए हैं उनको विभिन्न सांख्यिकीय विधियों से प्रक्रमित व प्रदर्शित करके तुलनात्मक निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए मानचित्रकारी संबंधी अनुप्रयोगों व आरेख विधियों का भरपूर उपयोग किया जा सकता है।
छठा चरण-निष्कर्ष – उपरोक्त सभी चरणों के पूरा होने पर एक रिर्पार्ट तैयार की जाती है जिसमें सर्वेक्षण के परिणाम व निष्कर्ष प्रस्तुत किए जाते हैं।
(v) क्षेत्र सर्वेक्षण के लिए प्रश्नों की अच्छी संरचना क्यों आवश्यक है?
उत्तर: क्षेत्र सर्वेक्षण में व्यक्तिगत साक्षात्कार एक महत्त्वपूर्ण क्रियाकलाप है। क्षेत्र में जाकर पर्यवेक्षक व्यक्तिगत साक्षात्कार के माध्यम से सूचनाएँ/आंकड़े एकत्र करता है। सामाजिक मुद्दों से जुड़े क्षेत्रीय सर्वेक्षणों में व्यक्तिगत साक्षात्कारों द्वारा सूचनाएँ/आंकड़े प्राप्त किए जा सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवेश से बहुत कुछ सीखता है। यदि इन अनुभवों को कुशलतापूर्वक एकत्रित किया जाता है तो, ये सूचनाओं के महत्त्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं। व्यक्तिगत साक्षात्कार हेतु लोगों का चयन, अभिव्यक्ति के कौशल, सामाजिकता की अभिरुचि आदि से ये सूचनाएँ प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए साक्षात्कार में पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या सीमित, सुरुचिपूर्ण, तर्कसंगत विषय से संबंधित, कम शब्दों में अभिव्यक्ति से परिपूर्ण होनी चाहिए। प्रश्नों में असहजता नहीं होनी चाहिए। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनका उत्तर बिना झिझक के दिए जा सके। प्रश्न पूछते समय उत्तरदाता यह महसूस करे कि जिस समस्या से वे लंबे समय से ग्रसित हैं, उसका निराकरण संभव है। और यह साक्षात्कार उसका एक हिस्सा है।
क्षेत्रीय सर्वेक्षण की प्रश्नावली पहले से ही तैयार होनी चाहिए और उसके संभावित उत्तरों के लिए पर्याप्त स्थान प्रश्न के सामने दिया गया हो। ताकि प्रश्नकर्ता व उत्तर दाता अपना समय व्यर्थ न गवाएँ। टेक्नीकल प्रश्न उसमें शामिल नहीं होने चाहिए।

प्र० 3. निम्नलिखित समस्याओं में से किसी एक के लिए क्षेत्र सर्वेक्षण अभिकल्पना की रचना कीजिए|
(i) पर्यावरण प्रदूषण
(ii) मृदा अपघटन
(iii) बाढ़
(iv) सूखा
(v) आपदा विषयक
(vi) भूमि उपयोग में हो रहे परिवर्तन की पहचान।

NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 4 Use of Computer In Data Processing and Mapping (Hindi Medium)

 


NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 4 Use of Computer In Data Processing and Mapping (Hindi Medium)

अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए;
(i) निम्नलिखित आंकड़ों के प्रदर्शन के लिए आप किस प्रकार के ग्राफ का उपयोग करेंगे?
(क) रेखा
(ख) बहुदंड आलेख
(ग) वृत्त आरेख
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
(ii) राज्य के अंतर्गत ज़िलों का प्रदर्शन किस प्रकार के स्थानिक आंकड़ों द्वारा होगा?
(क) बिंदु
(ख) रेखाएँ।
(ग) बहुभुज
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
(iii) एक वर्कशीट के सेल में दिए गए सूत्र में वह कौन-सा प्रचालक है जिसका पहले परिकलन किया जाता है|
(क) +
(ख) –
(ग) /
(घ) x
(iv) एक्सेल में विजार्ड फंक्शन आपको समर्थ बनाता है|
(क) ग्राफ रचना में
(ख) गणितीय और सांख्यिकीय क्रियाओं को करने में।
(ग) मानचित्र आलेखन में
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

उत्तर:
(i) (ख) बहुदंड आलेख
(ii) (ग) बहुभुज
(iii) (ग) /
(iv) (क) ग्राफ रचना में।

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) एक्सेल में विजार्ड फंक्शन आपको समर्थ बनाता है?
उत्तर: एक्सेल में विजार्ड फंक्शन के द्वारा चार्ट जिसमें दंड आरेख, प्रमुखता से बनाए जाते हैं। इसके अलावा रेखा ग्राफ, आयत चित्रे आदि भी बनाए जा सकते हैं।
(ii) एक कंप्यूटर के विभिन्न भागों की हस्तेन विधियों की तुलना में कंप्यूटर के प्रयोग के क्या लाभ हैं?
उत्तर: विभिन्न प्रकार के आलेख, आरेख, चित्र, ग्राफ व मानचित्रों के निर्माण में आंकड़ों के प्रक्रमण तथा उनकी रचना में कंप्यूटर के प्रयोग ने समय की बचत की है। साथ ही त्रुटि होने संभावना भी कम रहती है जबकि हस्तेन विधि से इसमें काफी अधिक समय लगता है तथा त्रुटि की संभावना बनी रहती है।
(iii) आंकड़ा प्रक्रमण और प्रदर्शन की हस्तेन विधियों की तुलना में कंप्यूटर के प्रयोग के क्या लाभ हैं?
उत्तर: आंकड़ों के प्रक्रमण और प्रदर्शन की हस्तेन विधियों में समय अधिक लगता है तथा त्रुटियों की संभावना बनी रहती है जबकि कंप्यूटर की मदद से आंकड़ों के प्रक्रमण व प्रदर्शन में समय कम लगता है तथा उनमें सटीकता का % उच्च रहता है।
(iv) वर्कशीट क्या होती है?
उत्तर: भूगोल में कंप्यूटर के अनुप्रयोग में एम०एस० एक्सेल एक महत्त्पूर्ण सॉफ्टवेयर है। एम०एस० एक्सेल को स्प्रेड शीट प्रोग्राम भी कहा जाता है। स्प्रेडशीट एक आयताकार पेज होता है जिसे कार्यविधि पत्र (वर्कशीट) कहते हैं। इसमें 16,384 पंक्तियाँ तथा 256 स्तंभ होते हैं। स्तंभों को अंग्रेजी के अक्षर A, B, C, D आदि पहचान दी जाती है जबकि पंक्तियों को संख्या 1, 2, 3, 4, इत्यादि पहचान दी जाती है। एक पंक्ति और एक स्तंभ के संयोजन से एक सेल का निर्माण होता है जिसमें प्रविष्टियाँ अंकित की जाती हैं। और इन्हें सुरक्षित करने के लिए उपयुक्त नाम दे दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर इसको पुनः खोलकर कार्य संपादन कर सकते हैं।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए।
(i) स्थानिक व गैर-स्थानिक आंकड़ों में क्या अंतर है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए?
उत्तर: स्थानिक आंकड़े किसी स्थान के भौगोलिक व सांस्कृतिक लक्षणों को प्रतिनिधित्व करते हैं। इनको मानचित्र पर प्रदर्शित करने के लिए बिंदु, रेखाएँ तथा बहुभुज का प्रयोग करते हैं। विद्यालय, अस्पताल, कुएँ, नलकूप, कस्बे व गाँव जैसे लक्षणों को बिंदुओं के द्वारा; सड़कों, रेलवे लाइनों, नहरों, नदियों, शाक्ति व संचार पंथों को रैखिक प्रदर्शन द्वारा, तथा प्रशासकीय इकाइयों जैसे देश, जिले, राज्य व खंड, भूमि उपयोग प्रकारों, तालाबों, झीलों आदि लक्षणों को बहुभुज विधि से प्रदर्शित करते हैं। जबकि गैर-स्थानिक आंकड़े गुण न्यास को प्रदर्शित करते हैं जैसे-आपके पास अपने विद्यालय की स्थिति दर्शाने वाला मानचित्र है। तब आप विद्यालय का नाम, कक्ष संख्या, कक्षा में विद्यार्थियों की अनुसूची, पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं, उपकरणों इत्यादि की सुविधाओं और संबंधित सूचनाओं को शामिल कर सकते हैं। इसमें आप महसूस करेंगे कि आप स्थानिक आंकड़ों के विशिष्ट गुणों की व्याख्या कर रहे होते हैं। इस तरह आप स्थानिक आंकड़ों के गुण न्यास की व्याख्या कर रहे होते हैं जिसके के कारण ये गैर-स्थानिक आंकड़े
कहलाते हैं।
(ii) भौगोलिक आंकड़ों के प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर: भौगोलिक आंकड़ों को दो वर्गों में रखा जाता है। स्थानिक आँकड़े तथा गैर-स्थानिक आंकड़े। इनका वर्णन पहले ही प्रश्न (i) में किया जा चुका है।

NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 3 Graphical Representation of Data (Hindi Medium)

 


NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 3 Graphical Representation of Data (Hindi Medium)

अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।
(i) जनसंख्या वितरण दर्शाया जाता है।
(क) वर्णमात्री मानचित्र द्वारा
(ख) सममान रेखा मानचित्रों द्वारा
(ग) बिंदुकित मानचित्रों द्वारा
(घ) ऊपर में से कोई भी नहीं
(ii) जनसंख्या की दशकीय वृद्धि को सबसे अच्छा प्रदर्शित करने का तरीका है।
(क) रेखा ग्राफ
(ख) दंड आरेख
(ग) वृत्त आरेख
(घ) ऊपर में से कोई भी नहीं
(iii) बहुरेखाचित्र की रचना प्रदर्शित करती है।
(क) केवल एक चर
(ख) दो चरों से अधिक
(ग) केवल दो चर
(घ) ऊपर में से कोई भी नहीं
(iv) कौन-सा मानचित्र गतिदर्शी माना जाता है।
(क) बिंदुकित मानचित्र
(ख) सममान रेखा मानचित्र
(ग) वर्णमात्री मानचित्र
(घ) प्रवाह संचित्र

उत्तर:
(i) (ग) बिंदुकित मानचित्रों द्वारा
(ii) (क) रेखा ग्राफ
(iii) (ख) दो चरों से अधिक
(iv) (घ) प्रवाह संचित्र

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) थिमैटिक मानचित्र क्या है?
उत्तर: थिमैटिक मानचित्र को विषयक मानचित्र अथवा वितरण मानचित्र भी कहा जाता है। इसमें चुने गए क्षेत्र/प्रदेश की विविधताओं व विशेषताओं को प्रदर्शित करने के लिए बिंदुकित, वर्णमात्री अथवा सममान रेखा विधि का उपयोग करके मानचित्र तैयार किए जाते हैं।
(ii) आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर: आंकड़ों के बेहतर प्रस्तुतीकरण के लिए उन्हें तालिकाबद्ध वे वर्गीकृत किया जाता है। तुलनात्मक अध्ययन हेतु उनको आरेखों व मानचित्रों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। उपयुक्त निष्कर्ष निकालने हेतु उन्हें अनेक प्रकार के प्रक्रमण की आवश्यकता होती है। तब जाकर, वे प्रस्तुतीकरण के योग्य बन पाते हैं।
(iii) बहुदंड आरेख और यौगिक दंड आरेख में अंतर बताइए।
उत्तर: बहुदंड आरेख में किसी घटक के विभिन्न तत्वों को समूह में एक साथ प्रदर्शित किया जाता है जैसे भारत की कुल साक्षरता दर की दशकीय वृद्धि को एक दंड द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। उसी के साथ स्त्री व पुरुष साक्षरता दर को भी अलग-अलग दंडों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। जबकि यौगिक दंड आरेख पर किसी घटक के विभिन्न तत्वों को एक ही दंड पर प्रदर्शित किया जाता है। जैसे – भारत में विद्युत का कुल उत्पादन एक दंड/आयत पर दिखाया जाता है। उसी दंड पर तापीय विद्युत, जलीय विद्युत न नाभिकीय विद्युत के योगदान को उनकी मात्रा के अनुरूप दिखाया जाता है। यह उत्पादन दिए गए वर्ष के अनुरूप प्रदर्शित किया जाता है।
(iv) एक बिंदुकित मानचित्र की रचना के लिए क्या आवश्यकताएँ हैं?
उत्तर: बिंदुकित मानचित्र किसी एक तत्व जैसे-जनसंख्या या फसल आदि के वितरण को प्रदर्शित करने के लिए बनाए जाते हैं। एक बिंदु को मान/मूल्य निर्धारित कर मापनी तय की जाती है। एक ही आकार-प्रकार के बिंदु, वितरण के प्रतिरूप को प्रदर्शित करने के लिए चुने हुए क्षेत्र/प्रदेश पर अंकित किए जाते हैं।
(v) सममान रेखा मानचित्र क्या है? एक क्षेपक को किस प्रकार कार्यान्वित किया जाता है।
उत्तर: मानचित्र पर किसी भौगोलिक लक्षण अथवा जलवायविक तत्वों को जैसे-ऊँचाई, तापमान, वायुदाब, वर्षा व लवणता के समान मानों वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को सममान रेखा (Isopleth) कहते हैं। इनके विशेष उदाहरण हैं-समोच्च रेखाएँ (Isohypses or contouns), समताप रेखाएँ (Isotherms), समदाव रेखाएँ (Isobars), समवर्षा रेखाएँ (Isohyets), समगंभीरता रेखाएँ (Isobaths) समभूकंप रेखाएँ (Isoseismallines), समलवणता रेखाएँ (Isohaline), समदिक्पाती रेखाएँ (Isogones), सममेघ रेखाएँ (Isonephs) आदि। सममान रेखाओं को (Isolines) भी कहा जाता है।
क्षेपक – समान मानों के स्थानों को मिलाने वाली सममान रेखाओं का चित्रण ही क्षेपक कहलाता है। क्षेपक का उपयोग । दो स्थानों के प्रेक्षित मानों के बीच माध्यमान प्राप्त करने के लिए किया जाता है। क्षेपक ज्ञात करने की विधि है।

(vi) एक वर्णमात्री मानचित्र को तैयार करने के लिए अनुसरण करने वाले महत्वपूर्ण चरणों की सचित्र व्याख्या कीजिए।
उत्तर: वर्णमात्री अथवा छाया विधि के द्वारा मानचित्र पर विभिन्न भौगोलिक तथ्यों की मात्रा/माप को रंगों की विभिन्न आभाओं अथवा छायाओं के द्वारा इस तरह प्रदर्शित किया जाता है कि अधिक मान के लिए गहरा तथा उसके बाद के मानों के लिए क्रमश हल्के रंग/छायाओं/आभाओं का प्रयोग किया जाता है। इसे अंग्रेजी में Choropleth कहा जाता है। वर्गामात्री मानचित्र तैयार करने के लिए विभिन्न चरणों का अनुसरण करते हैं
(क) एकत्रित आंकड़ों को आरोही अथवा अवरोही क्रम में व्यवस्थित करना।
(ख) आंकड़ों को उनके पास (अधिकतम-न्यूनतम मान की गणना करके) के अनुसार पांच अथवा उपयुक्त श्रेणियों में वर्गीकृत करना।
(ग) जिन प्रशासकीय इकाइयों के आंकड़े एकत्रित किए गए हैं उन्हें दर्शाने वाले क्षेत्रों का एक सुस्पष्ट मानचित्र । प्राप्त करना। उदाहरण–तालिका 3.10 भारत में साक्षरता दर 2001

(vii) आंकड़ों को वृत्त आरेख की सहायता से प्रदर्शित करने के लिए महत्वपूर्ण चरणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: वृत्त आरेख आंकड़ों को प्रदर्शित करने की एक उपयोगी विधि है। इसमें दिए गए विभिन्न चरों आंकड़ों के कुल मूल्य को एक वृत्त जो कि 360° का होता है, के अंदर दर्शाया जाता है।
(i) एक चर के आंकड़े को 360° के परिप्रेक्ष्य में कितने अंश में प्रदर्शित करना है, इसको इस सूत्र द्वारा परिकलित

(ii) वृत में प्रत्येक चर का अंश भाग निर्धारित होने पर उन्हें विभिन्न आभाओं/छायाओं द्वारा अलग-अलग दर्शाते हैं।
(iii) किसी आभा/छाया से किस चर/लक्षण को प्रदर्शित किया गया है। इससे संबंधित एक संकेतक/सूचक बनाना आवश्यक है। उदाहरणभारत के भूमि उपयोग संबंधी आंकड़े तालिका में दर्शाए गए हैं

NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 2 Data Processing (Hindi Medium)

 


NCERT Solutions for Class 12 Geography Practical Work in Geography Chapter 2 Data Processing (Hindi Medium)

अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. निम्नांकित चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए
(i) केंद्रीय प्रवृत्ति का जो माप चरम मूल्यों से प्रभावित नहीं होता है वह है
(क) माध्य
(ख) माध्य तथा बहुलक
(ग) बहुलक
(घ) माध्यिका
(ii) केंद्रीय प्रवृत्ति का वह माप जो किसी वितरण के उभरे भाग से हमेशा संपाती होगा वह है
(क) माध्यिका
(ख) माध्य तथा बहुलक
(ग) माध्य
(घ) बहुलक
(iii) ऋणात्मक सहसंबंध वाले प्रकीर्ण अंकन में अंकित मानों के वितरण की दिशा होगी
(क) ऊपर बाएँ से नीचे दाएँ
(ख) नीचे बाएँ से ऊपर दाएँ
(ग) बाएँ से दाएँ
(घ) ऊपर से दाँए से नीचे बाएँ

उत्तर:
(i) (घ) माध्यिका
(ii) (ख) माध्य तथा बहुलक ।
(iii) (क) ऊपर बाएँ से नीचे दाएँ

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) माध्य को परिभाषित कीजिए?
उत्तर: किसी चर/मद के विभिन्न मूल्यों का साधारण अंकगणितीय औसत माध्य कहलाता हैं। यह अधिकतम व न्यूनतम मूल्यों/ मानों के बीच एक स्थिर मूल्य होता है।
(ii) बहुलक के उपयोग के क्या लाभ हैं?
उत्तर: किसी श्रेणी में जिस मान/मूल्य की सबसे अधिक पुनरावृत्ति होती है वह मान बहुलक कहलाता है। बहुलक में वे मान महत्वपूर्ण होते हैं जिनकी पुनरावृत्ति सर्वाधिक बार हुई है। ये मान प्रायः श्रेणी के मध्य में होते हैं। अतः बहुलक पर श्रेणी के चरम मूल्यों/मानों का प्रभाव नहीं पड़ता।
(iii) प्रकीर्णन किसे कहते हैं?
उत्तर: दो चरों के बीच विशिष्ट सह संबंध अथवा साहचर्य को दर्शाने के लिए बनाए गए रेखा-चित्रों को प्रकीर्ण आरेख अथवा प्रकीर्ण अंकन कहते हैं। इस रेखाचित्र पर X तथा Y मानों का बिखराव प्रकीर्णन कहलाता है।
(iv) सहसंबंध को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: कुछ भौगोलिक परिघटनाओं के परिणाम ज्ञात करने के लिए दो या अधिक चरों के बीच साहचर्य अथवा पारस्परिक निर्भरता, उनकी प्रकृति, दिशा व गहनता का अध्ययन ही सहसंबंध है।
(v) पूर्ण सहसंबंध किसे कहते हैं?
उत्तर: सहसंबंध की दिशा व गहनता का विस्तार किसी भी परिस्थिति में ± 1 से अधिक नहीं हो सकता। सहसंबंध पूरी 1 (एक) होने पर (चाहे धनात्मक हो या ऋणात्मक) इसे पूर्ण सहसंबंध कहा जाता है।
(vi) सहसंबंध की अधिकतम सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर: सहसंबंध की अधिकतम सीमाएँ -1 से लेकर +1 के बीच कुछ भी हो सकती है। यह जितना शून्य (0) के समीप होगी सहसंबंध उतना ही कमजोर होगा तथा जितना ± 1 के पास होगी सहसंबंध उतना ही प्रगाढ अथवा संघन होगा।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए|
(i) आरेखों की सहायता से सामान्य तथा विषम वितरणों में माध्य, माध्यिका तथा बहुलक की सापेक्षिक स्थितियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: सामान्य वितरण की विशेषता है कि इसमें माध्य, माध्यिका तथा बहुलक का मान समान होता है क्योंकि सामान्य वितरण सममित होता है। इसमें अधिकतम आवृत्ति का मान, वितरण के मध्य में होता है तथा इस बिंदू से आधी इकाईयाँ ऊपर व आधी नीचे होती हैं। अति उच्च तथा अति निम्न मूल्यों की बारंबारता बहुत ही कम होती हैं। देखें चित्र सामान्य वक्र आवृत्तियों को प्रदर्शित करने वाला रेखाचित्र घंटाकार वक्र कहलाता है। सामान्य वक्र में आंकड़ों की परिवर्तनशीलता कम अथवा अधिक हो सकती है। सामान्य वक्र का एक उदाहरण है-चित्र A में धनात्मक विषमता वाला वक्र दिखाया गया है जिसमें निम्न मूल्यों की आवृत्तियाँ अधिक तथा अधिक मूल्य की आवृत्तियाँ कम है। इस स्थिति में पहले बहुलक, फिर माध्यिका तथा अंत में माध्य आता है। जबकि चित्र B में ऋणात्मक विषमता वाला वक्र दिखाया गया है। इसमें कम मूल्य की आवृत्तियाँ कम तथा अधिक मूल्य की आवृत्तियाँ अधिक होती हैं। इस स्थिति में पहले माध्य, फिर माध्यिका तथा अंत में बहुलक आता है।

यदि आंकड़े विषम अथवा विकृत हों तो माध्य, माध्यिका तथा बहुलक संपाती नहीं होंगे। विषम आंकड़ों के प्रभाव को A तथा B के द्वारा स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

(ii) माध्य, माध्यिका तथा बहुलक की उपयोगिता का वर्णन उनके गुण व दोषों के आधार पर कीजिए।
उत्तर:

  1. सामान्य वितरण में माध्य, माध्यिका तथा बहुलक का मान समान होता है।
  2. अधिकतम आवृत्ति का मान वितरण के मध्य में होता है।
  3. मध्य बिंदू से आधी इकाइयाँ ऊपर तथा आधी नीचे होती हैं।
  4. अधिकतर इकाइयाँ वितरण के मध्य में अर्थात् माध्य के निकट होती हैं।
  5. अति उच्च तथा अति निम्न मूल्यों की बारंबारता का बंटन बहुत ही कम होता है।
  6. सामान्य वितरण वक्र की आकृति घंटाकार वक्र जैसी होती हैं क्योंकि यह वक्र सममित होती है।
  7. यदि आंकड़े विषम अथवा विकृत हों तो माध्य, माध्यिका तथा बहुलक संपाती नहीं होंगे।
  8. सामान्य वितरण वक्र की सहायता से केंद्रीय प्रवृत्ति के तीनों मापों की तुलना आसानी से की जा सकती है।

(iii) एक काल्पनिक उदाहरण की सहायता से मानक विचलन के गणना की प्रक्रिया समझाइए।
उत्तर: मानक विचलन, प्रकीर्णन का सर्वाधिक स्थिर भाप है। इसकी गणना हमेशा माध्य के परिपेक्ष्य में की जाती है। इसलिए इस वर्ग माध्यन्मूल विचलन भी कहते हैं। इसे ग्रीक अक्षर 6 से तथा अंग्रेजी अक्षर SD से अभिव्यक्त करते हैं।
इसका गणितीय सूत्र है-


(iv) प्रकीर्णन का कौन-सा माप सबसे अधिक अस्थिर है तथा क्यों?
उत्तर: प्रकीर्णन को मापने के लिए अनेक विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं। जैसे-विस्तार, चतुर्थक विचलन, माध्य विचलन, मानक विचलन, विचरण गुणांक तथा लॉरेंज वक्र आदि। इनमें से प्रत्येक विधि के अपने विशेष गुण तथा सीमाएँ हैं। किंतु विस्तार अथवा परिसर द्वारा परिकलित माप सबसे अधिक अस्थिर है। क्योंकि इसे श्रेणी के सबसे । उच्चतम मान में से-न्यूनतम मान को घटाकर प्राप्त किया जाता है। जैसे-निम्नलिखित अवर्गीकृत आंकड़ों के आधार पर दैनिक मजदूरी के वितरण के लिए विस्तार की गणना कीजिए – रु० 80, 85, 95, 100, 110, 120, 200 है। विस्तार/परिसर की गणना के लिए सूत्र है- R = L – S, R = परिसर (Range), L = उच्चतम मान (Largest Value) S = निम्नतम मान (Smallest Value) यहाँ L = 200, तथा S = 200 हैअतः R= L – S अर्थात् R = 200 – 80 = 120 यदि इस श्रेणी में से अंतिम माने = 200 को हटा दें तब R = 120 – 80 = 40 इस तरह केवल एक मान को हटाने पर R का मान घटकर केवल एक-तिहाई रह गया है।
अतः दो चरम मानों पर आधारित परिणाम भ्रामक, अवास्तविक व अविश्वसनीय होते हैं।
(v) सहसंबंध की गहनता पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: सहसंबंध की गहनता का मापन दोनों चरों में अनुरूपता या साहचर्य की मात्रा पर निर्भर करता है। इस अनुरूपता
अथवा साहचर्य की गहनता की मात्रा गणितीय दृष्टि से -1 से शून्य की ओर बढ़ते हुए +1 तक हो सकती है। अतः इसका मान किसी भी परिस्थिति में ± 1 से अधिक नहीं हो सकता।। सह संबंध पूरा 1 (एक) होने पर (चाहे वह धनात्मक हो या ऋणात्मक) इसे पूर्ण सहसंबंध क़हते हैं। गहनतम सहसंबंध के दो विपरीत सिरों ± 1 के ठीक मध्य में (शून्य) 0 सहसंबंध की स्थिति होती है। इस बिंदू पर या उसके समीप चरों की उपस्थिति सहसंबंध के अभाव को दर्शाती है।

दो चरों के मध्य विशिष्ट साहचर्य को दर्शाने के लिए बनाए गए आरेख को प्रकीर्ण आरेख अथवा प्रकीर्ण अंकन कहते हैं। रेखाचित्र पर X तथा Y मानों का बिखराव अथवा प्रकीर्णन सहसंबंध की गहनता को दर्शाते हैं। प्रकीर्ण आरेख पर जब एक सरल रेखा निचले बाँए से ऊपरी दाएँ भाग की ओर अग्रसर होती हैं तो यह पूर्ण धनात्मक सहसंबंध (1.00) को दर्शाती है। इसके विपरीत जब यह रेखा ऊपरी बाएँ से निचले दाएँ भाग की ओर जाती है। तब पूर्ण ऋणात्मक सहसंबंध (-1.00) को दर्शाती है। सहसंबंध का अभाव होने पर या शून्य सहसंबंध होने पर X तथा Y चरों में कोई परिवर्तन नहीं होता। प्रकीर्ण आरेख पर X तथा Y चरों का बिखराव X तथा Y अक्ष के समान्तर होता है और समांतर सरल रेखाएँ दिखाई देती हैं।


(vi) कोटि सहसंबंध की गणना के विभिन्न चरण कौन से हैं?
उत्तर: स्पीयर मैंन ने कोटियों के आधार पर सहसंबंध की गणना विधि प्रस्तुत की है। प्रचलित रूप में इसे स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध के नाम से जाना जाता है जिसे ग्रीक अक्षर P तथा उच्चारण रो (rho) से अभिव्यक्त किया जाता है। इसकी गणना के निम्न चरण हैं-
प्रथम चरण – दिए गए X तथा Y चरों के आंकड़ों को तालिका में क्रमशः प्रथम व द्वितीय स्तंभों में लिख दिया जाता है जै